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मालाड पुलिस स्टेशन की शर्मनाक कार्यशैली: भू-माफिया का ‘गुलाम’ बना सिस्टम? शिकायतकर्ता लहूलुहान, वर्दीधारी मेहरबान!

मुंबई (वशिष्ठ वाणी): मालाड के भदरण नगर में जो हुआ, उसने मुंबई पुलिस की ‘सक्षमता’ और ‘ईमानदारी’ के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। रेलवे ट्रैक के पास, रोड नंबर 1 (कोयला वाला गली) में धड़ल्ले से चल रहे अवैध निर्माण की शिकायत करना जिग्नेश परमार के लिए काल बन गया। भू-माफिया कर्सन और उसकी मंडली ने न केवल कानून को ठेंगा दिखाया, बल्कि शिकायतकर्ता पर जानलेवा हमला कर यह साबित कर दिया कि इलाके में ‘खाकी’ नहीं, बल्कि ‘माफिया’ का राज चलता है।


अवैध निर्माण के खिलाफ आवाज उठाने का अंजाम: माफिया कर्सन की मंडली के हमले में घायल जिग्नेश परमार। चेहरे और पीठ पर लगे चोट के निशान बताते हैं कि हमला कितना बर्बर और जानलेवा था।

वरिष्ठ अधिकारी की भूमिका: माफिया का ‘मैनेजर’ या रक्षक?

इस मामले में सबसे ज्यादा कलंकित करने वाली भूमिका मालाड पुलिस स्टेशन के वरिष्ठ अधिकारियों की रही है। पीड़ित जब खून से लथपथ होकर मदद की गुहार लगाने पहुंचा, तो न्याय देने के बजाय अधिकारी भू-माफिया को बचाने की ‘पटकथा’ लिखने में व्यस्त दिखे।

  • FIR में देरी: घटना के तुरंत बाद केस दर्ज करने के बजाय पुलिस ने पूरा एक दिन बर्बाद कर दिया। क्या यह समय भू-माफिया को साक्ष्य मिटाने या ‘सेटिंग’ करने के लिए दिया गया था?
  • धाराओं के साथ खेल: आरोप है कि पुलिस ने अपनी मर्जी और माफिया की सुविधा के अनुसार कमजोर धाराएं लगाईं, ताकि कर्सन जैसे अपराधी आसानी से बच सकें।

एक दिन के इंतज़ार के बाद दर्ज हुई FIR: आखिर इस रिपोर्ट को दर्ज करने
में पुलिस ने 24 घंटे क्यों लगाए? क्या यह समय माफिया को बचाने के लिए था?


पुलिस कमिश्नर से शिकायत: केवल समय की बर्बादी?

जनता के मन में अब यह कड़वा सच घर कर गया है कि अगर इन भ्रष्ट अधिकारियों की शिकायत मुंबई पुलिस कमिश्नर से की भी जाए, तो कुछ नहीं बदलता।

  1. जांच के नाम पर सालों का वक्त बर्बाद किया जाता है।
  2. जब तक कोई फैसला आता है, तब तक दोषी अधिकारी का या तो तबादला हो जाता है या उसे ‘इनाम’ के तौर पर प्रमोशन मिल जाता है।
  3. पीड़ित न्याय की आस में कचहरी और दफ्तरों की धूल फांकते हुए दम तोड़ देता है।

एक डरावना सवाल: क्या मालाड पुलिस माफिया की पॉकेट में है?

कर्सन का यह दावा कि ‘सभी अधिकारी मेरी जेब में हैं’, आज सच साबित होता दिख रहा है। अगर एक अपराधी खुलेआम किसी को मारने की हिम्मत रखता है और पुलिस उसे बचाने के लिए FIR में खेल करती है, तो यह मान लेना चाहिए कि मालाड पुलिस स्टेशन का इकबाल खत्म हो चुका है।

सावधान रहें! अगर आप मालाड में रहते हैं और किसी माफिया के खिलाफ आवाज उठाने की सोच रहे हैं, तो याद रखिए कि वहां की पुलिस आपकी रक्षा के लिए नहीं, बल्कि माफिया की ‘प्राइवेट सिक्योरिटी’ के रूप में काम कर रही है।

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