🚨 “नो रिफंड पॉलिसी” के नाम पर 6 लाख की बुकिंग राशि लौटाने से इनकार, RERA और सरकार पर उठे बड़े सवाल
मुंबई | वशिष्ठ वाणी | विशेष रिपोर्ट:
मलाड वेस्ट के जनकल्याण नगर में डोटोम ग्रुप (Dotom Group) की एक रियल एस्टेट परियोजना को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। आरोप है कि एक ग्राहक द्वारा फ्लैट बुकिंग के लिए जमा किए गए लगभग 6 लाख रुपये को कंपनी ने वापस करने से साफ इनकार कर दिया। कंपनी की ओर से कारण बताया गया—“नो रिफंड पॉलिसी”।
यह मामला अब केवल एक ग्राहक तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पूरे रियल एस्टेट सेक्टर में चल रही “नो रिफंड पॉलिसी” के दुरुपयोग पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
सूत्रों के अनुसार, संबंधित ग्राहक ने किसी निजी और आर्थिक कारणों के चलते अपनी फ्लैट बुकिंग को रद्द करने का निर्णय लिया और कंपनी से अपनी जमा राशि वापस मांगी। लेकिन कंपनी के सेल्स मैनेजर ने स्पष्ट रूप से यह कह दिया कि बुकिंग अमाउंट “नॉन-रिफंडेबल” है और किसी भी स्थिति में वापस नहीं किया जाएगा।
जब ग्राहक ने यह सवाल उठाया कि क्या वही फ्लैट किसी अन्य व्यक्ति को बेचा जाएगा, तो सेल्स मैनेजर का जवाब चौंकाने वाला था। उन्होंने कहा कि फ्लैट निश्चित रूप से किसी अन्य ग्राहक को बेचा जाएगा, और संभवतः बढ़ी हुई कीमत पर बेचा जाएगा।
यहीं से विवाद और गहरा हो जाता है। एक तरफ ग्राहक की पूरी राशि जब्त कर ली जाती है, वहीं दूसरी तरफ उसी फ्लैट को दोबारा बेचकर कंपनी लाभ कमाती है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह “डबल फायदा” नहीं है? और क्या यह पूरी प्रक्रिया कानून के अनुरूप है?
इस पूरे मामले को लेकर वशिष्ठ वाणी द्वारा पहले भी कई बार “नो रिफंड पॉलिसी” के खिलाफ आवाज उठाई जा चुकी है। लगातार रिपोर्टिंग के बावजूद न तो केंद्र सरकार की ओर से कोई ठोस प्रतिक्रिया सामने आई है और न ही राज्य सरकार की ओर से कोई सख्त कार्रवाई देखने को मिली है। इससे यह धारणा बन रही है कि क्या इस तरह के मामलों को नजरअंदाज किया जा रहा है, या फिर सिस्टम में ऐसी खामियां हैं जिनका फायदा बड़ी कंपनियां उठा रही हैं।
कानूनी दृष्टिकोण से देखें तो Real Estate (Regulation and Development) Act, 2016 (RERA) स्पष्ट रूप से यह कहता है कि बिल्डर और खरीदार दोनों के अधिकार और दायित्व संतुलित होने चाहिए। यदि खरीदार किसी कारणवश भुगतान करने में असमर्थ होता है, तो बिल्डर को “उचित कटौती” करने का अधिकार है, लेकिन पूरी राशि जब्त करना हर स्थिति में न्यायसंगत नहीं माना जाता।
इसके अलावा Consumer Protection Act, 2019 के तहत भी ऐसी शर्तों को चुनौती दी जा सकती है जो एकतरफा हों और उपभोक्ता के हितों के खिलाफ हों। “नो रिफंड पॉलिसी” यदि पूरी तरह से ग्राहक के अधिकारों को खत्म कर देती है, तो उसे “अनुचित अनुबंध शर्त” माना जा सकता है।
अब इस पूरे मामले में निगाहें Maharashtra Real Estate Regulatory Authority (महाराष्ट्र RERA) पर टिक गई हैं। सवाल उठ रहे हैं कि क्या RERA को इस घटना की जानकारी है? यदि है, तो अब तक क्या कार्रवाई की गई? और यदि नहीं, तो क्या ऐसे मामलों पर स्वतः संज्ञान लिया जाएगा?
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या कोई भी बिल्डर “नो रिफंड पॉलिसी” लागू कर के किसी भी ग्राहक की पूरी बुकिंग राशि जब्त कर सकता है? क्या इस तरह की नीति के जरिए कंपनियां खुद को कानून से ऊपर समझने लगी हैं?
सामाजिक और नैतिक दृष्टिकोण से भी यह मामला गंभीर है। जब कोई ग्राहक निर्माणाधीन परियोजना में अपनी मेहनत की कमाई निवेश करता है, तो वह कहीं न कहीं उस प्रोजेक्ट के विकास में योगदान देता है। ऐसे में यदि किसी मजबूरी के कारण वह आगे भुगतान नहीं कर पाता, तो उसकी पूरी राशि जब्त कर लेना न केवल आर्थिक रूप से बल्कि नैतिक रूप से भी सवालों के घेरे में आता है।
यह मामला सरकार की भूमिका पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। क्या केंद्र और राज्य सरकार को इस विषय पर सख्त कानून नहीं बनाना चाहिए? क्या यह जरूरी नहीं है कि स्पष्ट नियम बनाए जाएं कि यदि कोई ग्राहक सेवा या संपत्ति का लाभ नहीं ले पा रहा है, तो उसकी राशि निश्चित सीमा तक या पूरी तरह वापस की जाए? और यदि कोई कंपनी ऐसा नहीं करती है, तो उस पर भारी जुर्माना लगाया जाए?
आलोचकों का कहना है कि बड़े बिल्डर और कंपनियां आर्थिक रूप से मजबूत होती हैं और सिस्टम पर उनका प्रभाव भी अधिक होता है, जबकि आम जनता के पास न तो इतना समय होता है और न ही संसाधन कि वह लंबी कानूनी लड़ाई लड़ सके। यही कारण है कि कई लोग न्याय मिलने की उम्मीद छोड़ देते हैं और कंपनियां “नो रिफंड पॉलिसी” के नाम पर राशि जब्त करती रहती हैं।
जनकल्याण नगर का यह मामला अब एक मिसाल बन सकता है—या तो यह उपभोक्ता अधिकारों के लिए एक नई लड़ाई की शुरुआत करेगा, या फिर यह दिखाएगा कि कैसे “नो रिफंड पॉलिसी” के नाम पर आम लोगों की मेहनत की कमाई दांव पर लगती रहती है।
अब देखना यह होगा कि Maharashtra Real Estate Regulatory Authority, राज्य सरकार और केंद्र सरकार इस मामले पर क्या रुख अपनाते हैं। क्या पीड़ित ग्राहक को न्याय मिलेगा, या यह मामला भी कई अन्य मामलों की तरह समय के साथ ठंडा पड़ जाएगा—यह आने वाला वक्त तय करेगा।










