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क्या वैश्विक दबाव के आगे झुक रही है भारत की स्वतंत्र विदेश नीति?

भारत की पहचान हमेशा एक ऐसे राष्ट्र की रही है जो अपनी विदेश नीति स्वतंत्रता, संतुलन और राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय करता है। दुनिया में जब भी महाशक्तियों के बीच खींचतान हुई, तब भारत ने अक्सर एक ऐसी राह चुनी जो न तो पूरी तरह किसी के पक्ष में थी और न ही किसी के खिलाफ—बल्कि केवल भारत के हितों के पक्ष में थी।

लेकिन आज जो घटनाएँ सामने आ रही हैं, उन्होंने एक गंभीर बहस को जन्म दे दिया है। सवाल उठ रहा है कि क्या भारत की विदेश नीति अब वास्तव में स्वतंत्र है या उस पर अमेरिका का दबाव हावी होने लगा है

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जब पश्चिमी देशों ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाए, तब भारत ने साफ कहा था कि देश की ऊर्जा सुरक्षा सबसे पहले है और इसलिए भारत रूस से सस्ता तेल खरीदना जारी रखेगा। उस समय भारत के इस फैसले की दुनिया भर में चर्चा हुई। कई देशों ने इसे भारत की स्वतंत्र और साहसी विदेश नीति का उदाहरण बताया।

लेख: अभिषेक अनिल वशिष्ठ
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)


लेकिन धीरे-धीरे हालात बदलते दिख रहे हैं। जैसे ही अमेरिका की ओर से संकेत आया कि भारत को रूस से तेल खरीद कम करनी चाहिए, वैसे ही भारत की खरीद में गिरावट दिखाई देने लगी। फिर जब अमेरिका की ओर से अस्थायी राहत या सीमित अनुमति जैसी स्थिति बनी, तो भारत फिर से रूस से तेल खरीदने की दिशा में आगे बढ़ गया।

यहीं से सवाल खड़े होने लगे— क्या भारत अपनी ऊर्जा नीति खुद तय कर रहा है, या फिर वह किसी बड़े वैश्विक दबाव के अनुसार अपने फैसले बदल रहा है?

इस पूरे घटनाक्रम का एक और परिणाम सामने आया। रूस, जो भारत को लंबे समय से भारी छूट पर तेल दे रहा था, अब उस छूट को बंद करने की बात कर रहा है। अब यदि भारत रूस से तेल खरीदना चाहता है, तो उसे फिक्स अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर ही खरीदना पड़ सकता है।

यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि कूटनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। क्योंकि भारत और रूस के संबंध दशकों पुराने हैं। रक्षा, ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग में रूस भारत का सबसे बड़ा साझेदार रहा है। अगर भारत का रुख अस्थिर दिखाई देगा, तो यह स्वाभाविक है कि रूस भी अपने हितों को ध्यान में रखते हुए अपनी नीति बदलेगा।

इसी के साथ एक और सवाल उठता है— क्या भारत धीरे-धीरे अमेरिका के प्रभाव वाले खेमे में अधिक झुकता जा रहा है?

भारत की विदेश नीति की ताकत हमेशा यह रही कि उसने संतुलन बनाए रखा। एक ओर अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी, दूसरी ओर रूस के साथ रक्षा सहयोग और तीसरी ओर ईरान जैसे देशों के साथ ऊर्जा व क्षेत्रीय संबंध। यही संतुलन भारत को एक अलग पहचान देता था।

लेकिन आज कई विश्लेषक कह रहे हैं कि यह संतुलन कहीं न कहीं कमजोर पड़ता दिख रहा है।

ईरान का उदाहरण भी इसी चर्चा में सामने आता है। एक समय था जब ईरान भारत के लिए ऊर्जा और क्षेत्रीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण सहयोगी था। कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ईरान ने भारत के साथ सहयोग भी किया। लेकिन आज जब ईरान वैश्विक तनावों के केंद्र में है, तो भारत की ओर से बेहद सावधानी भरा और लगभग मौन रुख दिखाई देता है।

कई लोगों का मानना है कि इसका कारण अमेरिका के साथ बढ़ती रणनीतिक साझेदारी हो सकती है।

हालाँकि यह भी सच है कि आज की वैश्विक राजनीति बेहद जटिल हो चुकी है। हर देश को अपने आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक हितों को ध्यान में रखकर फैसले लेने पड़ते हैं। संभव है कि सरकार इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए ही अपनी रणनीति बना रही हो।

लेकिन लोकतंत्र में सवाल उठना स्वाभाविक है।

  • आज देश के कई वर्गों में यह चर्चा हो रही है कि क्या भारत की विदेश नीति अब भी उतनी ही स्वतंत्र है जितनी पहले मानी जाती थी।
  • क्या भारत वैश्विक दबावों से ऊपर उठकर अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार फैसले ले रहा है, या फिर अंतरराष्ट्रीय शक्तियों की रणनीति का प्रभाव उन निर्णयों पर दिखाई देने लगा है?
  • और एक लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन सवालों पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए। संसद और सार्वजनिक मंचों पर ऐसी बहसें ही किसी भी राष्ट्र की नीति को मजबूत बनाती हैं।
  • क्योंकि भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति है। दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और तेजी से बढ़ती रणनीतिक ताकत।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है— क्या भारत अपनी विदेश नीति पूरी तरह अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर चला रहा है, या वैश्विक शक्तियों के दबाव का असर उस पर दिखाई देने लगा है?

इस सवाल का स्पष्ट उत्तर शायद केवल सरकार ही दे सकती है।

लेकिन एक बात निश्चित है— मजबूत लोकतंत्र वही होता है जहाँ सरकार की शक्ति के साथ-साथ सवाल पूछने की आज़ादी भी उतनी ही मजबूत होती है।

और भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में विदेश नीति जैसे महत्वपूर्ण विषय पर खुली, ईमानदार और गंभीर बहस होना ही देशहित में है।

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