लेखक: अभिषेक अनिल वशिष्ठ
भारत की राजनीति ने पिछले एक दशक में कई अलग-अलग दौर देखे हैं। जब से Narendra Modi देश के प्रधानमंत्री बने, जनता ने उम्मीदें, वादे और विकास के सपने देखे। यह जीत केवल राजनीतिक बदलाव नहीं थी, बल्कि जनादेश के साथ जनता की अपेक्षाओं का परिणाम थी।
लेकिन समय बीतने के साथ यह सवाल लगातार उठता है: क्या सत्ता में आने वाले वादों का दस प्रतिशत भी पूरा हुआ? और क्या लोकतंत्र के चौथे स्तंभ — मीडिया — अपनी भूमिका निभा पा रहा है?

(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्रा. लि. के डायरेक्टर और ग्रुप के अखबारों के मालिक)
1. नोटबंदी और भ्रष्टाचार पर दावा, वास्तविक परिणाम क्या?
2016 में नोटबंदी एक बड़ा कदम था। देश को बताया गया कि:
- भ्रष्टाचार और काला धन कम होगा
- आतंकवाद और फंडिंग पर रोक लगेगी
- आर्थिक अनुशासन मजबूत होगा
लेकिन कई सालों के बाद भी जनता और विशेषज्ञ पूछते हैं: क्या यह कदम अपने मूल उद्देश्यों में सफल रहा? क्या वास्तव में भ्रष्टाचार और काला धन समाप्त हुए या केवल सिस्टम में बदलाव के आभास बने?
2. सवाल पूछने वाले नेताओं पर एजेंसियों का डर
बीते वर्षों में यह धारणा बनती गई कि:
- जो नेता सत्ता से सवाल उठाते हैं, उनके खिलाफ Enforcement Directorate और Income Tax Department जैसी एजेंसियों द्वारा कार्रवाई की जाती है।
- जबकि सत्ता पक्ष में शामिल नेताओं के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं दिखती।
इस प्रवृत्ति ने राजनीतिक गलियारों में डर पैदा किया और सवाल उठाए: क्या ये एजेंसियां पूरी तरह स्वतंत्र हैं या राजनीतिक नियंत्रण में काम कर रही हैं?
3. राजनीतिक केंद्रीकरण और विपक्ष का कमजोर होना
सत्ता पक्ष में शामिल होने वाले नेताओं की संख्या बढ़ी, और आलोचक मानते हैं कि यह केवल सत्ता का विस्तार नहीं, बल्कि राजनीतिक केंद्रीकरण का संकेत है।
सवाल यह उठता है:
- क्या लक्ष्य था “सबका साथ, सबका विकास”?
- या असल में विपक्ष को कमजोर कर सत्ता मजबूत करना?
4. मीडिया की भूमिका: सवाल पूछने की स्वतंत्रता पर प्रश्न
लोकतंत्र में मीडिया का काम केवल खबर दिखाना नहीं, बल्कि सवाल पूछना भी है।
लेकिन वर्तमान स्थिति यह है कि:
- सत्ता से कठोर सवाल कम पूछे जाते हैं
- कई स्वतंत्र पत्रकार अब डिजिटल प्लेटफॉर्म या यूट्यूब तक सीमित हो गए हैं
- टीवी चैनलों में बहसों का केंद्र धार्मिक और पहचान आधारित मुद्दे बन गया है
क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछना ही जवाबदेही और पारदर्शिता की नींव है, यह प्रवृत्ति चिंताजनक है।
5. धर्म आधारित राजनीतिक विमर्श और सामाजिक ध्रुवीकरण
सत्ता में आने के पीछे विकास एजेंडा प्रमुख था। लेकिन आज राजनीतिक मंचों और सार्वजनिक बहसों में:
- हिंदू-मुस्लिम विमर्श बढ़ा
- पहचान आधारित राजनीति तेज हुई
- मीडिया भी इस प्रवृत्ति से पूरी तरह अछूता नहीं रहा
यह प्रश्न उठता है कि क्या विकास एजेंडा पीछे छूट गया है और पहचान राजनीति प्रमुख हो रही है?
6. चुनाव आयोग और लोकतंत्र की निष्पक्षता
कई बार यह आरोप सामने आए कि Election Commission of India सत्तारूढ़ दल के पक्ष में निर्णय लेती है।
- विपक्ष पर त्वरित कार्रवाई
- सत्ता पक्ष पर अपेक्षाकृत धीमी कार्रवाई
इन सवालों ने लोकतंत्र की प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। जनता के भरोसे का यह मामला है कि चुनाव निष्पक्ष और स्वतंत्र हों।
7. मुख्य सवाल: लोकतंत्र की दिशा
आज देश में दो प्रमुख सवाल हैं:
सरकार से:
- चुनावी वादों की स्थिति क्या है?
- नोटबंदी और अन्य बड़े निर्णयों का वास्तविक असर क्या रहा?
- जांच एजेंसियों की निष्पक्षता सुनिश्चित कैसे होगी?
मीडिया से:
- क्या स्वतंत्र और आलोचनात्मक पत्रकारिता कायम रहेगी?
- क्या सत्ता से कठिन सवाल पूछे जाएंगे?
- क्या लोकतंत्र में असहमति सुरक्षित रहेगी?
निष्कर्ष
लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं बल्कि सवाल पूछने और जवाब देने की प्रक्रिया से मजबूत होता है।
- सरकार को जवाबदेही दिखानी होगी
- मीडिया को अपनी भूमिका निभानी होगी
- संस्थाओं को निष्पक्षता बनाए रखनी होगी
क्योंकि अंततः लोकतंत्र की दिशा तय होती है — जनता की जागरूकता और सक्रिय सहभागिता से।













