‘वशिष्ठ वाणी’ का एक्सक्लूसिव खुलासा: आरोपी की ही इमारत में किराएदार निकला एफआईआर फाड़ने का दावा करने वाला बड़बोला कार्यकर्ता; एडवोकेट की पोस्ट पर भड़के स्वयंभू नेता की ‘केस ठोकने’ की धमकी भी हुई फुसफुसाई!
मुंबई (वशिष्ठ वाणी ब्यूरो): मुंबई के मालवाणी स्थित स्वप्नपूर्ति कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी (इमारत 1D) में मासूम बच्ची के साथ हुए POCSO मामले में जहाँ पुलिस सख्त कानूनी कार्रवाई करते हुए आरोपी को सलाखों के पीछे भेज चुकी है, वहीं दूसरी तरफ इस गंभीर अपराध को दबाने और आरोपी बालासाहेब भगत को बचाने के लिए मैदान में उतरे बीजेपी के स्थानीय कार्यकर्ताओं (वार्ड स्तर के पदाधिकारियों) के पावर-प्ले का गुब्बारा पूरी तरह फूट चुका है।
पार्टी का झंडा और ‘वार्ड अध्यक्ष’ का छोटा-सा पद मिलते ही खुद को कानून, पुलिस और मीडिया से ऊपर समझने वाले इन निचले स्तर के कार्यकर्ताओं के इस गैर-जिम्मेदाराना रवैये की गूँज अब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व (आलाकमान) तक पहुँचने लगी है।
1. बड़ा खुलासा: एफआईआर फाड़ने का दावा करने वाला कार्यकर्ता आरोपी की ही इमारत का ‘किराएदार’!
सूत्रों से मिले बड़े और एक्सक्लूसिव खुलासे के अनुसार, एफआईआर दर्ज होने के बाद से ही जो स्थानीय बीजेपी कार्यकर्ता मालवाणी में खुद को सत्ता का नुमाइंदा बताकर घूम रहा था और एफआईआर की प्रति फाड़ने के दावे कर रहा था, वह कोई बड़ा जनाधार वाला नेता नहीं, बल्कि उसी इमारत (1D) में रहने वाला एक साधारण किराएदार (Tenant) है।
- अहंकार और धौंस की खुली पोल: एक तरफ जहाँ सोसाइटी के स्थायी निवासी और म्हाडा के सभी फ्लैट मालिक इस घिनौने अपराध के खिलाफ एकजुट हैं, वहीं उसी इमारत में किराए पर रहने वाले इस कार्यकर्ता द्वारा आरोपी चेयरमैन के संरक्षण में खड़े होकर सत्ता की धौंस दिखाना स्थानीय निवासियों के गले नहीं उतर रहा है।
- “एफआईआर की प्रति ही फाड़ देता…” — बड़बोलेपन का सच: सूत्रों के मुताबिक, इसी किराएदार कार्यकर्ता ने सत्ता के नशे में बड़बोलापन दिखाते हुए पीठ पीछे कहा था कि— “यदि मुझे थोड़ा पहले पता चलता तो मैं आकर एफआईआर की कॉपी ही फाड़ देता, मैंने पहले भी कई एफआईआर फाड़ी हैं।”
2. लीगल एडवाइज़र की आधिकारिक पोस्ट पर बौखलाहट: “मीडिया पर कर दूंगा एफआईआर”
मामले में जब ‘वशिष्ठ वाणी’ मीडिया हाउस को FIR No. 1556/2026 (धाराएँ: POCSO Act Sec 8, 12 व BNS Sec 74) की आधिकारिक प्रति प्राप्त हुई, तो संस्थान ने जिम्मेदार पत्रकारिता का परिचय देते हुए इसे जांच के लिए अपने कानूनी सलाहकार एडवोकेट ओमप्रकाश मिश्रा जी को भेजा।
तथ्यों के सत्यापन के बाद एडवोकेट ओमप्रकाश मिश्रा जी ने कानूनी प्रक्रिया के तहत आरोपी बालासाहेब भगत की तस्वीर के साथ एक संक्षिप्त थंबनेल तैयार कर फेसबुक व व्हाट्सएप पर साझा किया कि ‘मालवाणी स्वप्नपूर्ति सोसाइटी के अध्यक्ष बालासाहेब भगत पर POCSO के तहत मामला दर्ज व गिरफ्तारी’।
इस प्रामाणिक पोस्ट को देखते ही मालवाणी पुलिस चौकी में आरोपी के परिवार को सहानुभूति दिलाने और अपनी धौंस जमाने आए बीजेपी कार्यकर्ता का पारा चढ़ गया। अपनी नाकामयाबी से बौखलाकर उसने मीडिया पर केस करने की गीदड़ भभकी देते हुए कहा कि— “अभी अपराध साबित नहीं हुआ है, फिर मीडिया ने यह पब्लिश कैसे किया? मैं इस मीडिया हाउस पर एफआईआर दर्ज करवाऊंगा!”
‘वशिष्ठ वाणी’ का दोटूक और बेबाक जवाब:
जब ‘वशिष्ठ वाणी’ की टीम को इस धमकी की जानकारी मिली, तो मीडिया हाउस ने बिना किसी डर के तीखा जवाब दिया:
“कानूनी दस्तावेजों और पुलिस रिकॉर्ड के आधार पर खबर साझा की गई है। जिन्हें एफआईआर कराने का शौक है, वे शौक से जाकर मीडिया पर एफआईआर कराएं, हमारी लीगल टीम कोर्ट और कानून के सामने इसका मुंहतोड़ जवाब देगी।”
इस करारे जवाब के बाद एफआईआर फाड़ने और कानूनी कार्रवाई की धमकियाँ देने वाले इस किराएदार कार्यकर्ता की पूरी अकड़ पस्त हो गई।
3. ’13 साल की पहचान’ का ढोंग रचने आया दूसरा बीजेपी कार्यकर्ता भी बेनकाब
आरोपी को बचाने के इस खेल में केवल एक ही नहीं, बल्कि बीजेपी का एक अन्य स्थानीय कार्यकर्ता भी लगातार सक्रिय था। यह दूसरा कार्यकर्ता जनता और पुलिस के सामने यह ढोल पीट रहा था कि— “हम आरोपी को 13 सालों से जानते हैं, वह ऐसा नहीं कर सकता, उसे फंसाया जा रहा है।”
लेकिन जब मामला एक मासूम बच्ची के सम्मान और गैर-जमानती धाराओं से जुड़ा था, तब इस दूसरे कार्यकर्ता की यह 13 साल के ‘चरित्र प्रमाण पत्र’ वाली दलील और राजनीतिक सिफारिश पूरी तरह ध्वस्त हो गई।
जब मीडिया टीम ने मामले की गंभीरता को देखते हुए बोरीवली जोन के डीसीपी (DCP) से सीधा संपर्क साधा, तो पुलिस प्रशासन ने भी पूरी तरह निष्पक्ष जांच का भरोसा दिया और स्पष्ट किया कि कानून के सामने किसी का भी राजनीतिक दबाव काम नहीं करेगा।
4. बीजेपी आलाकमान के लिए बड़ा सवाल: “कार्यकर्ता या कानून से ऊपर ‘राजा’?”
राजनीतिक विश्लेषकों और स्थानीय निवासियों का कहना है कि बीजेपी का केंद्रीय व राज्य नेतृत्व (प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और मुख्यमंत्री/प्रदेश अध्यक्ष) जहाँ एक तरफ सुशासन और ‘बेटी बचाओ’ का संदेश देता है, वहीं मालवाणी जैसे इलाकों में वार्ड अध्यक्ष या कार्यकर्ता का छोटा-सा पद पाते ही ये लोग खुद को क्षेत्र का ‘राजा’ समझ बैठने की भूल कर रहे हैं।
एक तरफ किराएदार कार्यकर्ता एफआईआर फाड़ने और मीडिया पर केस ठोकने की धमकियाँ देता है, तो दूसरी तरफ दूसरा कार्यकर्ता 13 साल के परिचय का हवाला देकर POCSO के आरोपी का ढाल बनने की कोशिश करता है। ऐसे बड़बोले और बेलगाम कार्यकर्ताओं की वजह से पार्टी की साख को भारी नुकसान पहुँच रहा है। अब देखने वाली बात यह होगी कि बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व अपने ऐसे कार्यकर्ताओं पर क्या अनुशासनात्मक कार्रवाई करता है।











