मुंबई (विशेष संवाददाता): मासूम बच्चियों की सुरक्षा को लेकर एक तरफ जहाँ सरकार और प्रशासन द्वारा ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ और त्वरित न्याय के दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ ज़मीनी हकीकत आज भी बेहद चिंताजनक और प्रशासनिक सुस्ती से भरी हुई है। मालवाणी क्षेत्र में सामने आए एक नाबालिग पीड़िता से जुड़े गंभीर POCSO मामले ने स्थानीय पुलिस प्रशासन, कांदिवली स्थित शताब्दी अस्पताल और निचले स्तर के पुलिसकर्मियों की संवेदनहीन कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
1. 2 से 3 अक्टूबर की पूरी टाइमलाइन: 12 घंटे का घटनाक्रम
प्राप्त जानकारी के अनुसार, मामला 2 अक्टूबर 2026 की शाम का है जब पीड़ित परिवार न्याय की गुहार लेकर मालवाणी पुलिस स्टेशन पहुँचा:
- 2 अक्टूबर, शाम 6:00 बजे: पीड़ित परिवार और मासूम बच्ची पुलिस स्टेशन पहुँचे।
- शाम 6:30 से 7:30 बजे: बच्ची और परिजनों का आधिकारिक बयान (Statement) दर्ज किया गया।
- रात 8:54 बजे: थाने में एफआईआर (FIR No. 1556) दर्ज हुई। मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 74 तथा POCSO अधिनियम की धारा 8 और 12 के तहत आरोपी बालासाहेब भगत पर मामला दर्ज किया गया।
- रात 1:28 बजे (लगभग 5 घंटे का विलंब): कागज़ी औपचारिकताओं के नाम पर घंटों बैठाने के बाद पीड़िता को कांदिवली स्थित शताब्दी अस्पताल ले जाया गया।
- 3 अक्टूबर, सुबह 5:30 बजे: अस्पताल में लंबी प्रतीक्षा के बाद सुबह 5:30 बजे जाकर प्राथमिक मेडिकल जांच पूरी हो सकी।
शाम 6 बजे से शुरू हुआ यह सिलसिला 3 अक्टूबर की सुबह 5:30 बजे तक खिंचता रहा। एक मासूम बच्ची, जो पहले से ही गहरे मानसिक ट्रॉमा में थी, उसे पूरी रात थाने और अस्पताल के चक्कर काटने पड़े।
2. वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक रानी पूरी का सहयोगात्मक रुख, लेकिन निचले स्तर पर लापरवाही
मामले में एक तरफ जहाँ मालवाणी पुलिस स्टेशन की वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक (Sr. PI) रानी पूरी पीड़ित परिवार को पूरा सहयोग देने, ढांढस बंधाने और त्वरित न्याय दिलाने में प्रयासरत दिखें, वहीं दूसरी तरफ उनकी ही मातहत महिला कांस्टेबल खांडेकर का रवैया पूरी तरह इसके विपरीत रहा। जहाँ वरिष्ठ अधिकारी संवेदनशीलता दिखा रही थीं, वहीं निचले स्तर की कांस्टेबल अपनी अलग ही मनमानी चला रही थीं।
3. मालवाणी पुलिस चौकी में सुलह और दबाव का खेल
गंभीर और चिंताजनक बात यह रही कि जब तक पुलिस पीड़िता को मेडिकल जांच के लिए अस्पताल नहीं ले गई, तब तक मालवाणी पुलिस चौकी परिसर के आसपास आरोपी पक्ष के लोग मंडराते रहे। परिजनों का आरोप है कि इस दौरान पीड़ित परिवार पर मामला रफा-दफा करने, डराने, समझाने और सुलह (समझौता) करने का दबाव बनाया जाता रहा। सवाल यह उठता है कि वरिष्ठ अधिकारियों की संवेदनशीलता के बावजूद निचले स्तर के कर्मचारियों ने ऐसी ढिलाई क्यों बरती जिससे आरोपी पक्ष को दबाव बनाने का मौका मिला?
4. महिला कांस्टेबल खांडेकर की संवेदनहीनता, मीडिया का हस्तक्षेप और बदसलूकी
इस पूरे मामले में ड्यूटी पर तैनात महिला कांस्टेबल खांडेकर की भूमिका बेहद गैर-जिम्मेदाराना रही:
- पीड़िता को छोड़कर अकेले जाने की कोशिश: 3 अक्टूबर की सुबह 5:30 बजे अस्पताल में मेडिकल जांच पूरी होने के बाद महिला कांस्टेबल खांडेकर पीड़ित मासूम और परिजनों को वहीं छोड़कर खुद गाड़ी में बैठकर मालवाणी थाने रवाना होने लगीं।
- मीडिया के हस्तक्षेप पर मजबूरी में बैठाया: मौके पर मौजूद मीडिया कर्मियों ने जब इस रवैये को देखा और सवाल पूछे, तो दबाव में आकर मजबूरी में उन्होंने पीड़िता को गाड़ी में बैठाया। इस बात से नाराज होकर वे काफी खफा नजर आईं।
- जवाब देने से इनकार: थाने पहुँचने पर जब उनसे प्रक्रिया को लेकर सवाल किया गया, तो उन्होंने तीखे लहजे में कहा— “मुझसे कोई सवाल-जवाब मत करो तुम लोग!”
- गलत जानकारी देकर अकेले भेजा: अगले दिन पीड़िता के ब्लड टेस्ट की प्रक्रिया होनी थी। नियम अनुसार कानूनी मामलों (MLC) में पुलिसकर्मी का साथ होना अनिवार्य है, लेकिन खांडेकर ने परिजनों को यह कहकर गुमराह किया— “कल तुम लोग खुद डायरेक्ट अस्पताल पहुंच जाना, हमारी (पुलिस की) कोई जरूरत नहीं है।”
- 3 अक्टूबर सुबह फिर भटके परिजन: महिला कांस्टेबल खांडेकर की बात मानकर जब पीड़ित परिवार 3 अक्टूबर को सुबह 10:00 बजे कांदिवली के शताब्दी अस्पताल पहुँचा, तो डॉक्टरों ने साफ मना कर दिया कि “बिना पुलिस अधिकारी/कांस्टेबल की मौजूदगी के जांच नहीं की जा सकती।”
5. कांदिवली के शताब्दी अस्पताल और मालवाणी थाने में तत्काल सुधार की मांग
यह घटना सीधे तौर पर प्रशासनिक व्यवस्था और प्राथमिक सुविधाओं की पोल खोलती है:
- मालवाणी पुलिस स्टेशन: वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों का पालन निचले स्तर के कर्मचारी ईमानदारी से करें और पीड़िता को गुमराह करने वालों पर सख्त कार्रवाई हो।
- कांदिवली शताब्दी अस्पताल: रात के समय ऐसे मामलों के लिए 24 घंटे समर्पित महिला डॉक्टरों और फ़ास्ट-ट्रैक MLC मेडिकल प्रक्रिया का न होना एक बड़ी समस्या बना हुआ है।
6. मुख्यमंत्री और गृह विभाग से सीधा सवाल
जहाँ एक तरफ वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक रानी पूरी जैसी अधिकारी मदद का हाथ बढ़ा रही हैं, वहीं महिला कांस्टेबल खांडेकर जैसी कर्मचारियों की गैर-जिम्मेदाराना हरकतें पूरी पुलिस व्यवस्था की साख पर सवाल खड़े करती हैं।
जनता और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री एवं गृह मंत्रालय से मांग की है कि:
- पीड़ित परिवार को गुमराह करने वाली महिला कांस्टेबल खांडेकर और संबंधित लापरवाह पुलिस कर्मचारियों पर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
- मालवाणी थाने और कांदिवली शताब्दी अस्पताल में POCSO मामलों की त्वरित जांच के लिए एसओपी (SOP) का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए।









