मुंबई (विशेष ब्यूरो): सोशल मीडिया को जनता और सरकार के बीच का पुल बताया गया था, लेकिन आज यह पुल पूरी तरह टूट चुका है। जनता अपनी बुनियादी समस्याओं के लिए दिन-रात मुख्यमंत्री कार्यालय के आधिकारिक हैंडल @CMOMaharashtra को टैग करती है, लेकिन वहां से सिर्फ़ ‘सन्नाटा’ मिलता है। ‘वशिष्ठ वाणी’ आज इस डिजिटल उदासीनता और मंत्रियों के संरक्षण में फल-फूल रहे भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र पर सीधा प्रहार कर रही है।
@CMOMaharashtra पर टैग की गई शिकायतें ‘डस्टबिन’ में क्यों?
आज महाराष्ट्र का आम नागरिक हो या सजग मीडिया, हर कोई समाज की समस्याओं को सीधे राज्य के मुखिया तक पहुँचाने के लिए @CMOMaharashtra को टैग करता है। लोग सबूत, तस्वीरें और वीडियो तक साझा करते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि इन टैग्स और शिकायतों पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता।
सवाल यह है कि अगर जनता की शिकायतों को सुनना ही नहीं है, तो यह ट्विटर (X) अकाउंट किसलिए बनाया गया है? क्या यह सिर्फ़ सरकार के विज्ञापनों और राजनीतिक प्रचार की नुमाइश के लिए है? चुनाव के समय वोट मांगने के लिए डिजिटल होने वाले नेताओं के पास चुनाव जीतते ही जनता की फ़रियादें देखने का वक़्त क्यों नहीं बचता?
मंत्रियों का ‘सुरक्षा कवच’ और अधिकारियों की तानाशाही
‘वशिष्ठ वाणी’ ने हमेशा ज़मीनी स्तर पर उतरकर अवैध निर्माणों, फुटपाथों पर कब्ज़े और प्रशासनिक लापरवाही के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई है। हमारे पास हर भ्रष्टाचार के पक्के सबूत हैं। लेकिन इसके बावजूद भ्रष्ट अधिकारी अपनी कुर्सी छोड़ने या कार्रवाई करने को तैयार नहीं हैं।
इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इन अधिकारियों को अच्छी तरह मालूम है कि उनके आका— यानी सरकार के रसूखदार मंत्री— उनके पीछे ढाल बनकर खड़े हैं। जब रक्षक ही भ्रष्टाचार को संरक्षण देने लगे, तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ (मीडिया) चाहे जितने सबूत दे दे, ये अधिकारी टस से मस नहीं होते। अधिकारियों के मन से जनता और क़ानून का ख़ौफ़ पूरी तरह ख़त्म हो चुका है।
मुख्यमंत्री जी, कम से कम मीडिया की शिकायतों पर तो हंटर चलाइए!
राजनीति का यह नया ढर्रा बेहद खतरनाक है। ‘वशिष्ठ वाणी’ सीधे मुख्यमंत्री से मांग करती है कि आम जनता द्वारा @CMOMaharashtra पर किए जा रहे टैग्स को गंभीरता से लिया जाए। अगर सरकार आम नागरिकों की आवाज़ को अनसुना कर भी रही है, तो कम से कम मीडिया द्वारा पुख्ता सबूतों के साथ की जा रही शिकायतों पर तो तत्काल संज्ञान लें!
‘वशिष्ठ वाणी’ की दोटूक: सरकारें यह न भूलें कि जनता की आँखों पर हमेशा पट्टी नहीं बंधी रहती। मंत्रियों की सरपरस्ती में चल रही अधिकारियों की यह मनमानी और डिजिटल शिकायतों की यह अनदेखी आने वाले समय में सरकार को भारी पड़ेगी। जनता अब केवल ‘ट्वीट’ नहीं, बल्कि ग्राउंड पर ‘एक्शन’ देखना चाहती है।













