किसी भी सभ्य समाज में प्रशासन और मीडिया के बीच संवाद का उद्देश्य जनहित होता है। लेकिन जब सरकारी अधिकारी संवैधानिक जवाबदेही को भूलकर व्यक्तिगत अहंकार और ‘माफिया तंत्र’ के प्रवक्ता बन जाएं, तो समझ लीजिए कि व्यवस्था के गलियारे में भ्रष्टाचार की दीमक लग चुकी है। मालवणी के समाना नगर (गेट नंबर 8) में म्हाडा अधिकारी संतोष कांबले का हालिया व्यवहार इसी प्रशासनिक पतन की एक कड़वी मिसाल है।
सुरक्षा से खिलवाड़ और म्हाडा की चुप्पी:



मालवणी में आपातकालीन रास्तों (Emergency Exits) पर सालों से चल रही अवैध पार्किंग कोई साधारण अतिक्रमण नहीं है। यह सीधे तौर पर हजारों जिंदगियों के साथ किया जा रहा एक आपराधिक खिलवाड़ है। आश्चर्य इस बात पर है कि म्हाडा प्रशासन ने खुद नोटिस जारी किए, कांदिवली RTO को पत्र लिखे, यहाँ तक कि 1.08 लाख रुपये का जुर्माना भी ठोका, लेकिन ठोस कार्रवाई के नाम पर हाथ पीछे खींच लिए। आखिर वह कौन सी अदृश्य शक्ति है जो एक ‘फेडरेशन’ के अध्यक्ष को इतना रसूख देती है कि वह RTO की कार्रवाई रुकवा देता है और म्हाडा अधिकारी उसके बचाव में खड़े हो जाते हैं?

लेख: अभिषेक अनिल वशिष्ठ
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)
ब्लूप्रिंट बनाम जमीनी हकीकत:

ॐ सिद्धिविनायक सोसाइटी का मामला तो और भी चौंकाने वाला है। सरकारी ब्लूप्रिंट में जिस वॉटर टैंक पर कोई निर्माण वर्जित है, वहां आज एक आलीशान ‘इवेंट स्पॉट’ खड़ा है। 15 साल पुराने जर्जर ढांचे पर भारी निर्माण करना किसी बड़े हादसे को न्योता देना है।

जब मीडिया ने सबूतों के साथ अधिकारी संतोष कांबले से सवाल किया, तो उनका जवाब था— “मीडिया के कहने पर कुछ नहीं करेंगे।” यह अहंकार उस कुर्सी का अपमान है जिस पर वे बैठे हैं। अधिकारी भूल रहे हैं कि वे जनता के नौकर हैं, किसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के मालिक नहीं।
फायर ब्रिगेड की चेतावनी की अनदेखी:

बोरीवली फायर ब्रिगेड ने लिखित में शिकायत दी है कि ये अवैध कब्जे किसी भी आगजनी की स्थिति में मौत का जाल बन सकते हैं। इसके बावजूद म्हाडा अधिकारी का यह कहना कि “यह सोसाइटी का काम है”, उनकी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। क्या म्हाडा प्रशासन किसी ‘कमला मिल्स’ जैसे भीषण अग्निकांड का इंतजार कर रहा है? क्या फाइलों में दबी फायर ब्रिगेड की चेतावनी तभी बाहर आएगी जब मासूमों की जान चली जाएगी?
निष्कर्ष:
अभिषेक अनिल वशिष्ठ का सीधा सवाल म्हाडा के वरिष्ठ अधिकारियों और राज्य सरकार से है— क्या संतोष कांबले जैसे अधिकारी नियमों से ऊपर हैं? क्या ब्लूप्रिंट की कोई कीमत नहीं रह गई है? मीडिया का काम आईना दिखाना है, और यदि आईना धुंधला दिखे तो उसे साफ़ करना प्रशासन का दायित्व है। वशिष्ठ वाणी इस मुद्दे को तब तक उठाती रहेगी जब तक कि दोषियों पर FIR दर्ज नहीं होती और आपातकालीन रास्तों को माफियाओं से मुक्त नहीं करा लिया जाता।












