विशेष राजनीतिक व प्रशासनिक विश्लेषण | वशिष्ठ वाणी
मुंबई: महाराष्ट्र में सत्ता के गलियारों से जब ‘सुशासन’, ‘अपराधमुक्त महाराष्ट्र’ और ‘महिला सुरक्षा’ के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, तो आम जनता को लगता है कि कानून का राज स्थापित हो चुका है। लेकिन मुंबई के मालवणी पुलिस स्टेशन से आ रही ज़मीनी तस्वीरें और पीड़ितों की चीखें मुख्यमंत्री व गृह मंत्री देवेंद्र फडणवीस के प्रशासनिक इकबाल की पोल खोल रही हैं।
जब एक असहाय महिला का खून से लथपथ और सूजा हुआ चेहरा भी खाकी वर्दी को पिघला न सके, और जब गैर-जमानती धारा के तहत FIR दर्ज होने के बावजूद आरोपी खुलेआम घूमकर जश्न मनाएं, तो यह सवाल उठना लाज़मी है कि— क्या महाराष्ट्र में कानून का शासन चल रहा है या मालवणी पुलिस का ‘सेटलमेंट सिंडिकेट’?
1. पीड़ित महिला का बहता खून और मालवणी पुलिस की ‘सौदेबाजी’
गेट नंबर 07 में घटी घटना में जिस तरह एक महिला पर हमला हुआ, उसकी तस्वीरें देखकर किसी का भी दिल दहल जाए। महिला जब इंसाफ की उम्मीद लेकर मालवणी पुलिस चौकी पहुँची, तो वहाँ कानून का पालन कराने के बजाय ‘समझौते’ का पाठ पढ़ाया जाने लगा।
- पीड़िता के लिए प्रताड़ना: गंभीर रूप से घायल महिला को राहत और इलाज का आश्वासन देने के बजाय तड़के 4:00 बजे तक थाने में बिठाकर मानसिक रूप से तोड़ा गया।
- आरोपियों को ‘VIP संरक्षण’: घटना की रात जो आरोपी खुद पुलिस स्टेशन में खड़े थे, जिन पर BNS 118(1) (खतरनाक हथियारों से हमला – गैर-जमानती अपराध) जैसी संगीन धाराएं लगी थीं, उन्हें मालवणी पुलिस ने हिरासत में लेने के बजाय आराम से घर जाने दिया!
2. ‘नोटिस’ का बहाना और गृह मंत्रालय की विफलता
जब मीडिया और जनता ने सवाल उठाया कि गैर-जमानती अपराध में अब तक गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई, तो मालवणी पुलिस ने सोशल मीडिया पर जवाब चिपका दिया कि— “हमने BNSS 35(3) के तहत नोटिस भेज दिया है।”
यह केवल एक विधिक धारा का सहारा नहीं, बल्कि अपनी नाकामी और साठगांठ को छुपाने का ‘पुलिसिया एक्सक्यूज’ है।
- सवाल सीधा है: जब गैर-जमानती धारा के आरोपी खुद थाने में उपस्थित थे, तो उन्हें मौके पर गिरफ्तार करने के बजाय ‘नोटिस’ देकर जाने की छूट क्यों दी गई?
- इसका नतीजा यह हुआ कि बाहर निकलते ही आरोपियों ने पीड़ित परिवार पर केस वापस लेने का दबाव बनाया और इनकार करने पर पीड़िता के पति पर ही फर्जी ‘काउंटर-केस’ ठोक दिया!
क्या मालवणी पुलिस चौकी का काम आम नागरिकों को सुरक्षा देना है या अपराधियों को ‘काउंटर-केस’ के जरिए कानूनी ढाल मुहैया कराना?
3. गृह मंत्री देवेंद्र फडणवीस से सीधे तीखे सवाल!
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और गृह मंत्री देवेंद्र फडणवीस अक्सर यह दावा करते हैं कि उनके कार्यकाल में अपराधियों के मन में खौफ है। लेकिन मालवणी पुलिस की यह कार्यशैली उनके इन दावों को पूरी तरह खारिज करती दिखती है।
‘वशिष्ठ वाणी’ सीधे गृह मंत्री से पूछती है:
- क्या यही है आपका ‘कानून का राज’? BNS 118(1) जैसी गंभीर धाराओं के आरोपी बाहर घूमकर मस्ती कर रहे हैं और पीड़िता न्याय के लिए दर-दर भटक रही है, क्या इसे ही आपकी पुलिस का ‘त्वरित न्याय’ कहा जाए?
- जवाबदेही किसकी? जब मालवणी पुलिस चौकी निष्पक्ष जांच करने के बजाय सिर्फ ‘जहाँ दबाव, वहाँ झुकाव’ की नीति पर काम कर रही है, तो ऐसे अधिकारियों पर आपकी ओर से कड़ी दंडात्मक कार्रवाई कब होगी?
- कागजी तबादले या असली सुधार? मालवणी पुलिस स्टेशन में अधिकारियों के चेहरे और तबादले तो बदल जाते हैं, लेकिन कार्यशैली क्यों नहीं बदलती? क्या गृह विभाग में ऐसे भ्रष्ट सिस्टम को सुधारने की इच्छाशक्ति खत्म हो चुकी है?
निष्कर्ष: दावों से नहीं, कार्रवाई से बनेगी बात!
‘सज्जन रक्षक, दुर्जन भक्षक’ का नारा अब मालवणी पुलिस स्टेशन के दरवाजे पर लिखा एक कड़वा मजाक बनकर रह गया है। अगर मुख्यमंत्री व गृह मंत्री देवेंद्र फडणवीस सचमुच राज्य में कानून-व्यवस्था का इकबाल कायम रखना चाहते हैं, तो उन्हें तुरंत मालवणी पुलिस स्टेशन की इस ढिलाई पर कड़ा संज्ञान लेना होगा।
जनता अब खोखले आश्वासनों और कागजी नोटिसों से थक चुकी है। इस मामले में आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी और पीड़िता पर दबाव बनाने वाले दोषी पुलिसकर्मियों के निलंबन (Suspension) से कम कुछ भी स्वीकार्य नहीं होगा!













