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डिजिटल दुनिया का कड़वा सच: अनुराग कश्यप की ‘बंदर’ – दिल्लगी या दलदल?

वशिष्ठ वाणी विशेष: आज के दौर में डेटिंग ऐप्स पर एक ‘राइट स्वाइप’ करना कितना आसान हो गया है, ये हर कोई जानता है। लेकिन मैसेजिंग से डेटिंग तक का यह शॉर्टकट कब आपके गले का फंदा बन जाए, यह किसी को पता नहीं चलता। कब कोई इस सहज-से लगने वाले रिश्ते को महज दिल्लगी नहीं, बल्कि जुनून का मामला बना ले, कहना मुश्किल है। इसी अंधेरे सच की पड़ताल करती है निर्देशक अनुराग कश्यप की नई नियो-नॉयर थ्रिलर—‘बंदर’

क्या है फिल्म की कहानी?

फिल्म एक उदास नोट पर शुरू होती है। समर मेहरा (बॉबी देओल), जो कभी टीवी जगत का चमकता सितारा था, आज अभिनय की जमीन पर टिके रहने के लिए जद्दोजहद कर रहा है। पचास की दहलीज पार कर चुका समर अपनी कम उम्र की गर्लफ्रेंड खुशी (सबा आजाद) को बड़े सपनों के सपने दिखाता है, जबकि असल में वह आर्थिक तंगी और गंभीर बीमारियों से जूझ रहा है। उसकी जिंदगी में भूचाल तब आता है जब पुलिस उसे एक गंभीर मामले में गिरफ्तार कर लेती है।

फिल्म बखूबी दिखाती है कि कैसे समाज किसी अभियुक्त को सच्चाई सामने आने से पहले ही अपराधी घोषित कर देता है, और यह बदनामी उस इंसान की जिंदगी में ‘कीचड़’ की तरह चिपक जाती है, जिसमें वह ताउम्र धंसता रहता है।

वशिष्ठ वाणी का निष्कर्ष:

अनुराग कश्यप की ‘बंदर’ डिजिटल युग के उन अंधेरों को कुरेदती है जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। फिल्म का विषय दमदार है, लेकिन पटकथा में थोड़ी और कसावट इसे ‘मास्टरपीस’ बना सकती थी। यह फिल्म उन लोगों के लिए जरूर है जो एक गंभीर और सोचने पर मजबूर कर देने वाली थ्रिलर देखना पसंद करते हैं।

पैरामीटररेटिंग
निर्देशन (Direction)⭐⭐⭐⭐
अभिनय (Acting)⭐⭐⭐
पटकथा (Screenplay)⭐⭐
संगीत/बीजीएम (Music/BGM)⭐⭐⭐
वशिष्ठ वाणी ओवरऑल स्कोर3/5

क्या आपको लगता है कि डिजिटल दौर में हमारी प्राइवेसी और सुरक्षा महज़ एक स्वाइप की मोहताज होकर रह गई है? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।

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