12A, 80G और ‘दर्पण’ प्रमाणित ‘वशिष्ठ समाज सेवा संस्था’ को चक्कर कटवा रहे बैंक अधिकारी; क्या अपने घर से एनजीओ चलाना गुनाह हो गया?
मुंबई (विशेष जांच रिपोर्ट): एक तरफ केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) देश के कोने-कोने तक डिजिटल लेनदेन पहुंचाने का दावा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ धरातल पर निजी बैंकों का गैर-जिम्मेदाराना रवैया और प्रशासनिक उत्पीड़न सामाजिक संस्थाओं का दम घोंट रहा है। ताज़ा मामला मुंबई के मलाड वेस्ट स्थित कल्पतरु बिल्डिंग (पद्म नगर, एवरशाइन नगर, पिन कोड- 400064) की एक्सिस बैंक शाखा का है, जहाँ ग्राहकों और समाज सेवियों को मदद के बजाय केवल परेशान करने का काम किया जा रहा है। अपनी जेब से पैसे खर्च कर समाज सेवा में जुटी एक मान्यता प्राप्त संस्था के साथ यहाँ के अधिकारियों ने जो बर्ताव किया है, उसने पूरे बैंकिंग सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या अपने घर से NGO चलाना कोई गुनाह है?
आयकर विभाग की धारा 12A, 80G और भारत सरकार के नीति आयोग (दर्पण पोर्टल) से विधिवत पंजीकृत संस्था ‘वशिष्ठ समाज सेवा संस्था’ (Vashishtha Samaj Seva Sanstha) पिछले दो वर्षों से एक्सिस बैंक में अपना चालू खाता (Current Account) सफलतापूर्वक संचालित कर रही है। भारत में नियम के मुताबिक हज़ारों सामाजिक संगठन अपने संस्थापकों के पंजीकृत आवासीय पते (Residential Address) से ही संचालित होते हैं।
ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या देश में कानूनी रूप से पंजीकृत घर से एनजीओ चलाना कोई अपराध हो गया है? जब संस्था का आधिकारिक खाता उसी पते पर चल रहा है, तो फिर ऑनलाइन दान प्राप्त करने के लिए उसी बैंक से QR कोड मांगना इतना बड़ा गुनाह कैसे बन गया?
घर आकर कराए दस्तखत, फिर खड़े किए हाथ
मामले की जमीनी हकीकत और भी चौंकाने वाली है। संस्था ने जब जनसेवा के कार्यों के लिए डिजिटल QR कोड की मांग की, तो एक्सिस बैंक के प्रतिनिधि संदीप रामजी मोकल खुद संस्था के पंजीकृत पते पर पहुंचे और सभी आवश्यक फॉर्मों पर हस्ताक्षर (Signature) करवाए।
लेकिन हफ्तों बीत जाने के बाद भी जब QR कोड चालू नहीं हुआ और संस्था ने स्टेटस पूछा, तो बैंक प्रतिनिधि संदीप मोकल ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि “आपका पता रेजिडेंशियल है, इसलिए काम पेंडिंग है।” उन्होंने यह भी दावा किया कि इस संबंध में अपने वरिष्ठ अधिकारी ‘आकाश सर’ से बात हुई है।
जवाब मांगने पर संपर्क तोड़ा: ग्राहक सेवा का खुला मज़ाक
हद तो तब हो गई जब संस्था ने बैंक प्रतिनिधियों से पुनः संपर्क कर पूछा कि “आकाश सर से बात होने के बाद मामले में क्या अपडेट है?” तो बैंक कर्मियों ने जवाब देना ही पूरी तरह बंद कर दिया।
ग्राहक के वैध सवालों और संदेशों को नजरअंदाज करना एक्सिस बैंक की उस सामंती और मनमानी मानसिकता को दर्शाता है, जहाँ बैंक केवल चार्जेबल प्रोडक्ट्स (जैसे महंगे साउंड बॉक्स) बेचने के लिए ग्राहकों पर दबाव बनाते हैं। वहीं, जब खाताधारक उसी बैंक में अपने वैध खाते से लिंक साधारण QR कोड मांगता है, तो उसे महीनों तक टरकाया जाता है।
कठघरे में RBI का निगरानी तंत्र: क्या सिर्फ विज्ञापन देने तक सीमित है रिजर्व बैंक?
यह पूरा प्रकरण सीधे तौर पर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के उपभोक्ता संरक्षण (Consumer Protection) दावों की पोल खोलता है:
- आवासीय पते पर दोहरा मापदंड क्यों? RBI यह स्पष्ट करे कि जिस आवासीय पते पर 2 साल पहले चालू खाता खोलने की अनुमति दी गई, उसी पते पर QR कोड देने से रोकने का अधिकार बैंक को किस नियम के तहत मिला?
- बैंकों की मनमानी पर नकेल कौन कसेगा? ग्राहकों के फोन का जवाब न देना और सेवा रोककर बैठ जाना बैंकिंग सेवा मानकों (Deficiency in Service) का स्पष्ट उल्लंघन है। क्या RBI ऐसे निजी बैंकों और उनके लापरवाह कर्मचारियों पर कोई कड़ा संज्ञान लेगा या कागजी गाइडलाइंस जारी करके अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेगा?
आर-पार के मूड में संस्था
बैंक कर्मचारियों की इस हीलाहवाली और जवाब न देने के रवैये के खिलाफ ‘वशिष्ठ समाज सेवा संस्था’ अब इस पूरे मामले को RBI के केंद्रीय बैंकिंग लोकपाल (Banking Ombudsman) और वित्त मंत्रालय के समक्ष औपचारिक रूप से उठाने की तैयारी में है, ताकि डिजिटल इंडिया के नाम पर चल रहे इस उत्पीड़न पर रोक लग सके।














