इस्तीफों का खेल: ६ जुलाई की बैठक के बाद राम मंदिर ट्रस्ट में बड़ा भूचाल, सवालों के घेरे में अफ़सरशाही और ट्रस्टियों की नीयत।
ब्यूरो, अयोध्या (वशिष्ठ वाणी): अयोध्या के भव्य राम मंदिर में श्रद्धालुओं के चढ़ावे की महा-चोरी के मामले ने अब एक ऐसा विकराल रूप ले लिया है, जिससे श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की बुनियाद पूरी तरह हिल गई है। ६ जुलाई को हुई ट्रस्ट की अति-महत्वपूर्ण बैठक में आखिरकार चौतरफा दबाव के बाद महामंत्री चंपत राय और डॉ. अनिल मिश्रा का इस्तीफा मंजूर कर लिया गया है। लेकिन इस इस्तीफे के बाद ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी द्वारा जारी किए गए एक पत्र और उनके बयानों ने इस पूरे मामले की प्रशासनिक विफलता और राजनीतिक फिक्सिंग को सरेआम चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है।
‘नाम के कोषाध्यक्ष’ तो इतने सालों तक पद पर क्यों बैठे रहे गोविंद देव गिरी?
कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी ने एक पत्र जारी कर अपनी सफाई में कहा है कि वे सिर्फ ‘नाम के कोषाध्यक्ष’ थे। उनके पास न तो ट्रस्ट की चेक बुक थी, न ही उनके हस्ताक्षरों से किसी को सैलरी दी जाती थी। वे ज्यादातर व्यस्त रहते थे, इसलिए अपने सीए को भेजकर केवल ऑडिट की जानकारी लेते थे।
‘वशिष्ठ वाणी’ आज कोषाध्यक्ष जी की इस ‘लेटर पॉलिटिक्स’ और ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर १० सीधे और तीखे सवाल उठाती है, जिनका जवाब देश का हर राम भक्त जानना चाहता है:
- सवाल: अगर आपके पास कोई वित्तीय शक्ति नहीं थी और आपके हाथ में चेक बुक भी नहीं थी, तो आप इतने सालों तक इस अति-महत्वपूर्ण और गरिमामय पद पर आखिर क्यों आसीन रहे?
- सवाल: जब आपको भली-भांति ज्ञात था कि आप व्यस्तता के कारण इस बड़े दायित्व को नहीं संभाल पा रहे हैं, तो आपने इस महा-चोरी के उजागर होने से पहले इस्तीफा क्यों नहीं दिया?
- सवाल: आज जब करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और चढ़ावे की चोरी का भंडाफोड़ हो गया, तब आपको अचानक अपनी बेगुनाही का पत्र जारी करने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
- सवाल: पूर्व महामंत्री चंपत राय के पास जब इस चोरी की शिकायतें कई बार पहले भेजी गई थीं, तब उन्होंने शुरुआती स्तर पर ही तत्काल कड़ी कानूनी और दंडात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की?
- सवाल: चोरी का मामला सामने आने के बाद भी संदिग्धों को हफ़्तों तक खुला क्यों छोड़ा गया? क्या इससे सुबूतों को रफा-दफा करने का वक्त नहीं मिला?
- सवाल: राम मंदिर के संवेदनशील सुरक्षा, आईटी और वित्तीय तंत्र में हर महत्वपूर्ण जगह पर नियमों को ताक पर रखकर मनचाहे लोगों को क्यों बैठाया गया?
- सवाल: कानून और पारदर्शिता को दरकिनार कर, शुरुआत से ही इस पूरे चढ़ावे और वित्तीय प्रबंधन की रीयल-टाइम मॉनिटरिंग क्यों नहीं की गई?
- सवाल: विशेष जांच दल ने अपनी गोपनीय रिपोर्ट को किसी निष्पक्ष न्यायालय या राज्य के गृह मंत्री को सौंपने के बजाय सीधे ‘दागी प्रबंधन’ की मेज पर क्यों परोसा?
- सवाल: जब घर में चोरी होती है तो चाबी रखने वाले और मुखिया से जवाब मांगा जाता है; फिर ट्रस्ट के अध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष के खिलाफ ने जांच की सुई क्यों नहीं घुमाई?
- सवाल: अपनी प्रशासनिक विफलता को स्वीकार करने और दोषियों को कड़ी सजा दिलाने के बजाय, हर बार ‘विपक्ष’ का नाम लेकर करोड़ों राम भक्तों की भावनाओं को गुमराह करने का प्रयास क्यों किया जा रहा है?
इस्तीफे पर ‘महानता’ का पर्दा और चंपत राय का बचाव: यह कैसी क्रोनोलॉजी?
कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी ने चंपत राय और अनिल मिश्रा के त्याग पत्र को लेकर कहा कि—“वातावरण ऐसा बन गया था जिससे महामंत्री चंपत राय को बड़ी वेदना हुई। उनका कहना था कि जब तक सारा न्याय ठीक से नहीं हो जाता और अपराधी पकड़े नहीं जाते, उनका पद पर बने रहना ठीक नहीं।” कमाल की बात है कि जिसके नाक के नीचे करोड़ों की चोरी हो गई, उसे आज भी ‘महान’ साबित करने की होड़ मची है। अगर चंपत राय और आंतरिक प्रबंधन इतने ही बेदाग थे, तो समय रहते कदम क्यों नहीं उठाए गए? इन सवालों का जवाब न तो चंपत राय के पास है और न ही कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी के पास।
चोरी पर कार्रवाई के बजाय ‘विपक्ष’ को कोसना: हिंदुओं को बेवकूफ बनाना बंद करें!
अपनी विफलता छुपाने के लिए कोषाध्यक्ष ने इस मुद्दे पर वही पुराना राजनीतिक कार्ड खेलते हुए कहा कि—“हो-हल्ला मचाने वालों के इरादे साफ नहीं हैं। जो राम भर्ती का पाठ पढ़ा रहे हैं, उन्होंने कभी राम भक्तों पर गोलियां चलाई थीं। यह हिंदुओं को बांटने की कोशिश है।”
‘वशिष्ठ वाणी’ आज स्पष्ट कर देना चाहती है कि यह जो राम मंदिर में चढ़ावे की लूट हुई है, उससे दुनिया भर के साधु-संत, राम भक्त और पूरा हिंदू समाज आहत है, यहाँ बात किसी राजनीतिक दल की नहीं है। आप लोगों की प्रशासनिक लापरवाही के कारण पूरे विश्व में हिंदू समाज की बदनामी हुई है। अपनी गलती मानने के बजाय हर बार ध्यान भटकाना बंद होना चाहिए। जब आप कोषाध्यक्ष के पद पर बैठकर कुछ नहीं कर पाए, तो गोविंद देव गिरी जी, आपको भी तुरंत अपने पद से हट जाना चाहिए।
‘वशिष्ठ वाणी’ का संदेश: ज़मीर बचा होता तो यह कलंक न लगता
इस पूरे घटनाक्रम से यह साफ है कि जिन लोगों ने राम मंदिर के चढ़ावे को चुराया या अपनी रहस्यमयी चुप्पी से इसे होने दिया, उन्हें अपने किए पर कोई पछतावा नहीं है। अगर इस व्यवस्था और ट्रस्ट में बैठे लोगों के अंदर थोड़ी भी नैतिक जिम्मेदारी बची होती, तो आज मर्यादा पुरुषोत्तम के पावन धाम पर महा-चोरी का यह काला कलंक कभी नहीं लगता। ‘वशिष्ठ वाणी’ इस मुद्दे को अंतिम अंजाम तक पहुंचाएगी और जब तक इस घोटाले के असली चेहरे पूरी तरह बेनकाब नहीं हो जाते, हमारी पैनी नज़र इस तंत्र पर बनी रहेगी।
डिस्क्लेमर (Disclaimer): यह रिपोर्ट सार्वजनिक बयानों, पत्रों और कानूनी प्रक्रियाओं के आधार पर तंत्र की जवाबदेही तय करने के लिए एक निष्पक्ष खोजी विश्लेषण है। ‘वशिष्ठ वाणी’ किसी भी संवैधानिक पद और धार्मिक संस्था की गरिमा का पूरा सम्मान करता है। यहाँ उठाए गए सवाल जनहित और प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से प्रेरित हैं।












