कानून का सरेआम मज़ाक: जिस ट्रस्ट पर चोरी का आरोप, उसी की मेज पर SIT ने परोसी अपनी जांच रिपोर्ट!
ब्यूरो, अयोध्या (वशिष्ठ वाणी):
जब समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव सहित कई प्रमुख चेहरों ने अयोध्या के भव्य राम मंदिर में श्रद्धालुओं के चढ़ावे की चोरी का मुद्दा सोशल मीडिया पर उठाया, तो पूरे देश के राम भक्तों में हड़कंप मच गया। चौतरफा दबाव में आकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने आनन-फानन में एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन तो कर दिया, लेकिन आज ‘वशिष्ठ वाणी’ इस तथाकथित जांच के पीछे छिपे उस कड़वे प्रशासनिक सच को बेनकाब करने जा रही है, जिसे जानकर हर सनातनी का खून खौल उठेगा।
यह जांच असल में न्याय की स्थापना के लिए नहीं, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की आंखों में धूल झोंकने और इस महा-चोरी के असली मास्टरमाइंड्स और रसूखदार चेहरों को सेफ पैसेज (सुरक्षित रास्ता) देने का एक सुनियोजित राजनीतिक खेल बन चुकी है।
मुख्यमंत्री का आधा-अधूरा दायित्व और PMO का रहस्यमयी मौन
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे पहला सवाल देश और प्रदेश के शीर्ष नेतृत्व पर उठता है। राम मंदिर का यह पूरा ट्रस्ट सीधे तौर पर केंद्र सरकार के फैसले और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) की देखरेख में बना है। जब वैश्विक आस्था के इस सबसे बड़े केंद्र पर करोड़ों की डकैती का आरोप लगा, तो पीएमओ को इसमें तुरंत हस्तक्षेप (Intervene) करना चाहिए था। मुख्यमंत्री का दायित्व था कि वे इस संवेदनशील मामले को किसी निष्पक्ष केंद्रीय एजेंसी या न्यायिक आयोग को सौंपते। लेकिन उन्होंने जल्दबाजी में राज्य पुलिस के तहत SIT बना दी। नतीजा क्या हुआ? आज रक्षक और भक्षक एक ही थाली के चट्टे-बट्टे नजर आ रहे हैं।
हफ़्तों की रहस्यमयी देरी के बाद छोटी मछलियों पर कार्रवाई, मगरमच्छों को अभयदान!
कानून की किताबों और प्रशासनिक नियमावली (Administrative Code) के अनुसार, SIT के पास किसी भी सामान्य पुलिस अधिकारी से ज्यादा शक्तियां होती हैं। जब राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला सामने आया, तो SIT का कर्तव्य था कि वह चौबीस घंटे के भीतर संदेहास्पद लोगों को गिरफ्तार करती। लेकिन आप यह जानकर हैरान हो जाएंगे कि इस महा-चोरी के खुलासे के कई हफ़्तों बाद तक SIT हाथ पर हाथ धरे बैठी रही ताकि सुबूतों को रफा-दफा किया जा सके।
काफी समय बीत जाने और मीडिया के तीखे सवालों के बाद, इस मामले में पहली गिरफ्तारी मंदिर के ही सहायक सुरक्षा प्रभारी (Assistant Security Incharge) कृष्ण कुमार वर्मा और एक कंप्यूटर ऑपरेटर अनिल कुमार की की गई। सवाल यह उठता है कि क्या बिना किसी बड़े रसूखदार के संरक्षण के, ये छोटे कर्मचारी करोड़ों के चढ़ावे की चोरी को अंजाम दे सकते थे?
ट्रस्ट के अध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष पर जांच क्यों नहीं? ‘वशिष्ठ वाणी’ का सीधा सवाल
‘वशिष्ठ वाणी’ आज सीधे तौर पर SIT और सरकार की नीयत पर सवाल उठाती है। जो लोग दिन-रात मंदिर की निगरानी का दम भरते हैं, जिनके इशारे पर सारा सिस्टम और वित्तीय लेनदेन चलता है—उन कथित रूप से संदेहास्पद ट्रस्ट के अध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष (खजांची) के खिलाफ SIT ने एक बार भी जांच की सुई क्यों नहीं घुमाई? कानून की नजर में जब एक घर में चोरी होती है, तो सबसे पहले मुखिया और चाबी रखने वाले से पूछताछ होती है। लेकिन यहाँ राम मंदिर ट्रस्ट के इन शीर्ष कर्णधारों के खिलाफ न तो कोई जांच बैठाई गई, न ही उनकी जवाबदेही तय की गई। आखिर अफ़सरशाही और सत्ता इन बड़े मगरमच्छों को किसके इशारे पर बचा रही है?
इतिहास का सबसे बड़ा कानूनी मज़ाक: आरोपी की मेज पर ही सौंप दी रिपोर्ट!
न्यायशास्त्र (Jurisprudence) का एक बुनियादी नियम है कि “कोई भी आरोपी खुद अपने ही मामले में जज नहीं हो सकता।” लेकिन अयोध्या में एसआईटी ने इस कानून की धंज्जियां उड़ा दीं। नियम के मुताबिक, SIT को अपनी अंतिम जांच रिपोर्ट सीधे संबंधित न्यायालय (Court) को सौंपनी चाहिए थी और उसकी एक प्रति मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) या गृह सचिव को जानी चाहिए थी।
परंतु, आप यह जानकर दंग रह जाएंगे कि SIT ने अपनी पूरी छानबीन और गोपनीय रिपोर्ट ले जाकर सीधे उसी ‘राम मंदिर ट्रस्ट’ के अधिकारियों और पदाधिकारियों को सौंप दी, जिनकी नाक के नीचे यह चोरी हुई और जिनके प्रबंधन पर खुद लापरवाही व संलिप्तता के गंभीर आरोप हैं! यह सीधे तौर पर कानून का मज़ाक है। चोर को ही तिजोरी की चाबी और तफ्तीश की फाइल सौंपकर पूछा जा रहा है कि बताइए न्याय कैसे करें?
जागो जनता जागो: यह सिर्फ एक ‘पॉलिटिकल फिक्सिंग’ है
‘वशिष्ठ वाणी’ आज भारत की और विशेषकर अयोध्या की जनता को सचेत करना चाहती है—यह जो कुछ भी चल रहा है, वह सिर्फ एक गंदा राजनीतिक खेल है। “तुम मेरी कुर्सी बचाओ, मैं तुम्हारा दाग छुपाऊंगा”—इसी नीति पर पूरा तंत्र काम कर रहा है। वे जानते हैं कि हिंदू समाज भावुक है, उसे धर्म के नाम पर कभी भी गुमराह किया जा सकता है। उन्हें पूरा भरोसा है कि अभी जनता चिल्ला रही है, कुछ दिन बाद सब भूल जाएगी।
परंतु ऐ राम भक्तों, अपनी वैचारिक नींद से जागो! आज जो नेता और अफ़सर करोड़ों श्रद्धालुओं की गाढ़ी कमाई के चढ़ावे को नहीं बचा सके, जो भगवान के घर में हुई चोरी पर पर्दा डाल रहे हैं, वे कल तुम्हारे अधिकारों और तुम्हारी सुरक्षा की रक्षा क्या करेंगे? यह पूरे हिंदू समाज की आस्था का सरेआम अपमान है। ‘वशिष्ठ वाणी’ इस भ्रष्टाचार और अफ़सरशाही के नेक्सस के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखेगी, जब तक कि इस महा-पाप का दूध का दूध और पानी का पानी नहीं हो जाता।
डिस्क्लेमर (Disclaimer): यह रिपोर्ट मीडिया और कानूनी इनपुट्स के आधार पर तंत्र की जवाबदेही तय करने के लिए एक खोजी विश्लेषण है। ‘वशिष्ठ वाणी’ किसी भी संवैधानिक पद और न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा का पूरा सम्मान करता है।












