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‘वशिष्ठ वाणी’ तीखा प्रहार: राम मंदिर महा-चोरी पर सवाल का जवाब ‘विपक्ष’ नहीं; राम भक्तों के स्वाभिमान से खिलवाड़ बंद करे सत्ता, जवाब दो या गद्दी छोड़ो!

सवालों से भागती सरकार: चढ़ावे की चोरी पर ठोस कार्रवाई करने के बजाय विपक्ष के बहाने ध्यान भटकाने की गंदी राजनीति।

ब्यूरो, अयोध्या (वशिष्ठ वाणी): “जो राम को लाए हैं, हम उनको लाएंगे”—इस नारे के दम पर सनातनी हिंदुओं का शत-प्रतिशत भरोसा जीतकर सत्ता के शीर्ष सिंहासन पर बैठने वाली भाजपा सरकार आज देश के सबसे बड़े वैचारिक और कानूनी कटघरे में खड़ी है। अयोध्या के भव्य राम मंदिर में श्रद्धालुओं के चढ़ावे की महा-चोरी पर जब ‘वशिष्ठ वाणी’ ने तंत्र की जवाबदेही तय करने की मुहिम शुरू की, तो सत्ताधारी दल के प्रवक्ताओं और नेताओं द्वारा एक नया और बेहद शर्मनाक राग अलापा जाने लगा। अब सरकार और उनके सिपहसालार कह रहे हैं कि—“जो विपक्ष के लोग आज आवाज उठा रहे हैं, उन्होंने तो प्राण-प्रतिष्ठा का बायकॉट किया था, वे तो कभी राम को मानते ही नहीं थे, फिर आज क्यों चिल्ला रहे हैं?”

‘वशिष्ठ वाणी’ आज सत्ता में बैठे हुक्मरानों से सीधा और दो-टूक सवाल पूछती है—यह देश की आस्था का मामला है या आपकी राजनीतिक नूरा-कुश्ती का? बात यहाँ विपक्ष की है ही नहीं, और न ही बात विपक्ष की आवाज की है। विपक्ष का काम सवाल उठाना है और सत्ता पाने के लिए वह हर मौके का इस्तेमाल करेगा, लेकिन सवाल यह है कि आपने उसे यह मौका दिया ही क्यों?

क्या राम मंदिर इसलिए बना था कि वहां आस्था की खुली लूट हो?

इस देश का आम राम भक्त, देश के साधु-संत और खुद को गर्व से हिंदू कहने वाला समाज आज सत्ता की इस ढीली और संवेदनहीन कार्यप्रणाली के कारण पूरी दुनिया के सामने शर्मिंदा है। जिस राम मंदिर के निर्माण के लिए पीढ़ियों ने संघर्ष किया, कारसेवकों ने अपने लहू की आहुति दी और अपना सर्वोच्च बलिदान दिया—क्या उनका वह बलिदान इसलिए था कि वहां अफ़सरशाही और रसूखदार लोग मिलकर श्रद्धालुओं की गाढ़ी कमाई के चढ़ावे को लूट सकें?

चुनावों में चिल्ला-चिल्लाकर दावा किया जाता था कि “मोदी हैं तो हिंदू सुरक्षित हैं, बीजेपी है तो राम मंदिर सुरक्षित है।” लेकिन आज धरातल की हकीकत यह पूछ रही है कि क्या सचमुच इस सत्ता में हिंदू सुरक्षित हैं? क्या रामलला का चढ़ावा सुरक्षित है? या फिर रक्षक ही भक्षक बनकर डकैती डालने वालों को संरक्षण दे रहे हैं?

विपक्ष का मुंह बंद कराने के बजाय एसआईटी (SIT) का तमाशा क्यों?

यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नीयत साफ थी, तो उन्हें इस महा-चोरी पर कड़ा रुख अख्तियार करना चाहिए था। सरकार को चाहिए था कि एक झटके में निष्पक्ष जांच कराकर, ट्रस्ट के बड़े से बड़े पदाधिकारी से लेकर दोषी अधिकारियों तक को जेल की सलाखों के पीछे ठूंस देती! ऐसा करने से विपक्ष का मुंह अपने आप बंद हो जाता और पूरे देश में यह संदेश जाता कि ‘प्रधान चौकीदार’ के राज में भगवान के घर में भी चोरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

लेकिन इसके विपरीत क्या हुआ? न्याय और कानून का सरेआम मज़ाक उड़ाया गया। दबाव में आकर एक SIT बनाई गई, जिसने हफ़्तों तक कोई कार्रवाई नहीं की। बाद में कृष्ण कुमार वर्मा और अनिल कुमार जैसे छोटे कर्मचारियों को मोहरा बनाकर गिरफ्तार कर लिया गया, ताकि जनता का गुस्सा शांत हो सके। सबसे बड़ा मज़ाक तो यह हुआ कि एसआईटी ने अपनी जांच रिपोर्ट न्यायालय (Court) या राज्य के गृह मंत्री को सौंपने के बजाय, सीधे उन्हीं ट्रस्टियों और पदाधिकारियों की मेज पर परोस दी जिन पर खुद लापरवाही और संलिप्तता के गंभीर आरोप हैं!

‘ओ माय गॉड’ का वही घमंड: जनता को मूर्ख समझने की भूल न करे सत्ता

प्रधानमंत्री का इस पूरे संवेदनशील मुद्दे पर मौन व्रत धारण कर लेना और विदेशों की यात्राओं में व्यस्त रहना यह साफ दिखाता है कि उन्हें अब राम भक्तों के दर्द से कोई सरोकार नहीं रह गया है। सत्ता को यह मुगालता हो चुका है कि फिल्म ‘ओ माय गॉड’ (OMG) के उस संवाद की तरह जनता मूर्ख है, जो आज चिल्लाएगी, दो-चार महीने आक्रोश दिखाएगी और चुनाव आते-आते सब भूलकर फिर से धर्म के नाम पर उसी चौखट पर लाइन में लग जाएगी और चढ़ावा देना शुरू कर देगी।

लेकिन सत्ताधारी दल यह बात कान खोलकर सुन ले—हिंदू समाज ने आप पर अंधा भरोसा इसलिए किया था क्योंकि आपने खुद को ‘धर्म का रक्षक’ बताया था। आज जब रामलला के दरबार में हुई चोरी पर आप मौन हैं और सिर्फ ‘विपक्ष-विपक्ष’ की राजनीति चमका रहे हैं, तो जनता आपकी इस गंदी क्रोनोलॉजी को अच्छे से समझ चुकी है। ‘वशिष्ठ वाणी’ देश के करोड़ों राम भक्तों का आह्वान करती है—जागो जनता जागो! अपनी अंधभक्ति की पट्टी उतारो और इस निरंकुश तंत्र से रामलला के सम्मान और अपने स्वाभिमान का सीधा हिसाब मांगो।

डिस्क्लेमर (Disclaimer): यह रिपोर्ट देश के नागरिकों की आस्था और कानूनी प्रक्रियाओं के आधार पर तंत्र की जवाबदेही तय करने के लिए एक निष्पक्ष खोजी विश्लेषण है। ‘वशिष्ठ वाणी’ किसी भी संवैधानिक पद और राजनीतिक व्यवस्था की गरिमा का पूरा सम्मान करता है।

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