सवालों के घेरे में व्यवस्था: डिजिटल इंडिया और पारदर्शी प्रशासन के दावों के बीच मीडिया की खबरों को कूड़ेदान में डालती मुंबई की अफ़सरशाही।
ब्यूरो, मुंबई (वशिष्ठ वाणी): “लोकतंत्र का चौथा स्तंभ—मीडिया”—यह शब्द आज केवल किताबों और भाषणों तक सीमित रह गया है। जमीनी हकीकत यह है कि देश की प्रशासनिक व्यवस्था और अफ़सरशाही इस चौथे स्तंभ को पूरी तरह पंगु बनाने पर तुली हुई है। मुंबई के अलग-अलग विभागों (बीएमसी, आरटीओ, मुंबई पुलिस) में एक नया और बेहद खतरनाक प्रशासनिक ढर्रा देखने को मिल रहा है। जब भी ‘वशिष्ठ वाणी’ जैसा कोई खोजी मीडिया हाउस जनता की सुरक्षा, अवैध निर्माण या पार्किंग माफियाओं के खिलाफ पुख्ता सबूतों के साथ खबरें छापता है, तो अधिकारियों का एक ही रटा-रटाया जवाब आता है—“न्यूज़ में पब्लिश होने से कुछ नहीं होता, हमें लिखित शिकायत लाकर दो!”
यह रवैया न सिर्फ पत्रकारिता के कर्तव्य पर प्रहार है, बल्कि देश की न्यायपालिका के उन सिद्धांतों का भी उल्लंघन है जो कहते हैं कि मीडिया में छपी खबर अपने आप में एक ‘आधिकारिक सूचना’ (Official Notice) है।
‘वशिष्ठ वाणी’ का दोहरा प्रहार: खबर भी, लीगल नोटिस भी, फिर भी मौन क्यों?
अधिकारियों की इस बहानेबाजी का तोड़ निकालते हुए ‘वशिष्ठ वाणी’ और ‘वशिष्ठ मीडिया हाउस’ ने केवल खबरें पब्लिश नहीं कीं, बल्कि अपनी लीगल टीम के माध्यम से बकायदा न्यूज़पेपर की कटिंग, डिजिटल लिंक और अपने आधिकारिक लेटरहेड पर लिखित शिकायतें भी दर्ज कराईं। लेकिन नतीजा क्या निकला? ढाक के तीन पात!
अधिकारी इन लिखित शिकायतों को भी ठंडे बस्ते में डाल देते हैं। इससे यह साफ हो जाता है कि दिक्कत ‘लिखित शिकायत’ की नहीं है, बल्कि दिक्कत उस ‘मानसिकता’ की है जो आम जनता और मीडिया को कीड़ा-मकौड़ा समझती है।
मंत्रियों के इशारे पर ‘जी हुज़ूरी’, मीडिया की खबरों से दूरी: आखिर क्यों?
आज प्रशासनिक गलियारों में एक कड़वा सच हर कोई जानता है। यदि कोई स्थानीय रसूखदार नेता या मंत्री किसी अधिकारी को फोन कर दे, तो नियम-कानूनों को ताक पर रखकर चंद मिनटों में कार्रवाई शुरू हो जाती है। ऐसा क्यों होता है? क्योंकि अधिकारियों को पता है कि उनकी मलाईदार पोस्टिंग, ट्रांसफर और प्रमोशन की चाबी जनता या मीडिया के पास नहीं, बल्कि इन नेताओं के पास है।
मीडिया किसी अधिकारी को प्रमोशन नहीं दे सकता, न ही उसकी ट्रांसफर रुकवा सकता है। मीडिया सिर्फ जनता के हक की बात कर सकता है। और चूंकि जनहित से अधिकारियों की जेब और कुर्सी को कोई सीधा लाभ नहीं होता, इसलिए मीडिया की खबरों को ‘दरकिनार’ करना मुंबई की अफ़सरशाही की आदत बन चुकी है। ९९% अधिकारी आज लोकसेवक (Public Servant) नहीं, बल्कि राजनीतिक आकाओं के ‘निजी सेवक’ बनकर रह गए हैं।
समय की मांग: ‘मीडिया रिपोर्ट संज्ञान कानून’ (Media Reports Cognizance Act) क्यों है जरूरी?
जब कानून के रखवाले ही रसूखदारों के दबाव में आकर मीडिया के साक्ष्यों को नजरअंदाज करने लगें, तो क्या देश में एक नए और सख्त कानून की जरूरत नहीं है? आज ‘वशिष्ठ वाणी’ इस मंच से एक बड़ी बहस की शुरुआत कर रही है: क्या मीडिया के खुलासों को कानूनी रूप से बाध्यकारी (Binding) नहीं बनाया जाना चाहिए?
देश में एक ऐसा सख्त कानून बनना ही चाहिए जिसके तहत:
- अनिवार्य संज्ञान: यदि किसी मान्यता प्राप्त मीडिया हाउस ने साक्ष्यों के साथ कोई खोजी रिपोर्ट छापी है, तो संबंधित विभाग के अधिकारी को ७ कार्यदिवसों के भीतर उसपर की गई कार्रवाई की प्राथमिक रिपोर्ट (Action Taken Report) जारी करनी होगी।
- तत्काल निलंबन (Suspension): यदि मीडिया की खबर सही पाई जाती है और यह साबित होता है कि अधिकारियों ने खबर छपने के बाद भी जानबूझकर लापरवाही बरती या राजनीतिक दबाव में आकर कार्रवाई रोकी, तो दोषी अधिकारी को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाए और उसकी विभागीय जांच (Inquiry) शुरू हो।
‘वशिष्ठ वाणी’ का संकल्प: बहरी व्यवस्था को सुनाकर रहेंगे जनता की आवाज
जब तक ऐसा कानून नहीं बनता, तब तक क्या मीडिया घुटने टेक देगा? बिल्कुल नहीं। ‘वशिष्ठ वाणी’ अपनी निष्ठा और कर्तव्य से पीछे हटने वाला नहीं है। अगर अधिकारी न्यूज़पेपर की कटिंग और लीगल नोटिस से नहीं जागेंगे, तो हमारी लीगल टीम इन अधिकारियों की ‘लापरवाही के सबूतों’ को सीधे लोकायुक्त, परिवहन आयुक्त और बॉम्बे हाई कोर्ट के समक्ष ‘अदालत की अवमानना’ (Contempt of Court) और ‘स्वतः संज्ञान’ (Suo Motu) के आधार के रूप में पेश करेगी।
लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है, और जो अधिकारी नेताओं की चाटुकारिता में जनता का रास्ता रोक रहे हैं, उन्हें एक न एक दिन कानून के कटघरे में खड़ा होना ही पड़ेगा।











