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‘फोटो’ देख कर कांपते हैं बीएमसी के हाथ? मीठ चौकी ब्रिज पर कानून का नहीं, ‘विधायक’ का राज!

मुंबई: क्या मुंबई में कानून की किताब अब नेताओं की तस्वीरों के वजन के हिसाब से बदलती है? यह सवाल मलाड की जनता पूछ रही है। मीठ चौकी सिग्नल पर निर्माणाधीन ब्रिज, जो जनता की सुविधा के लिए था, अब अवैध राजनीतिक विज्ञापनों का अड्डा बन चुका है। लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि विधायक असलम शेख के इन विशालकाय बैनरों के सामने बीएमसी (BMC) का ‘हथौड़ा’ बेअसर साबित हो रहा है।

सिस्टम का डर या मिलीभगत?
सूत्रों के मुताबिक, बीएमसी के अधिकारियों और कर्मचारियों में इस कदर खौफ है कि वे बैनर उतारने की हिम्मत तक नहीं जुटा पा रहे हैं। एक कर्मचारी ने दबी आवाज में स्वीकार किया, “अगर हम विधायक के खिलाफ गए, तो यह उनके ‘इगो’ की लड़ाई बन जाती है। हमें अपनी नौकरी और शांति प्यारी है।” यह बयान साफ करता है कि शहर का प्रशासन हाई कोर्ट के आदेशों से नहीं, बल्कि नेताओं की नाराजगी से चलता है।

२०१४ के बाद क्या बदल गया?
चर्चा आम है कि २०१४ के बाद से प्रशासनिक मर्यादाएं ताक पर रख दी गई हैं। आज कार्रवाई करने से पहले बैनर की गुणवत्ता नहीं, बल्कि उसमें लगे ‘नेता के चेहरे’ का कद नापा जाता है। सिग्नल पर लगे ये बैनर न केवल अवैध हैं, बल्कि वाहन चालकों का ध्यान भटकाकर दुर्घटनाओं को न्योता दे रहे हैं।

जनता का सवाल:
क्या मुंबई नगर निगम सिर्फ आम जनता का चालान काटने और फेरीवालों को हटाने के लिए बना है? क्या असलम शेख जैसे प्रभावशाली नेताओं के लिए बीएमसी के नियम लागू नहीं होते? अगर बीएमसी इन अवैध होर्डिंग्स को नहीं हटा सकती, तो उसे यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि शहर में संविधान नहीं, बल्कि ‘बाहुबल’ का कानून चलता है।

अब देखना यह है कि इस खबर के बाद प्रशासन अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी करता है या ‘फोटो’ देखकर सर झुकाना ही जारी रखता है।

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