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विशेष: न्याय की आस और पीड़ितों की ढाल: एडवोकेट ओम प्रकाश मिश्रा ने पेश की वकालत के परम धर्म की मिसाल

विशेष रिपोर्ट
न्याय • कर्तव्य • जनसेवा
कमज़ोरों और बेसहारा लोगों के लिए न्याय की आवाज़ बने वरिष्ठ अधिवक्ता ओम प्रकाश मिश्रा

कमज़ोरों और बेसहारा लोगों के लिए मसीहा बने वरिष्ठ अधिवक्ता ओम प्रकाश मिश्रा

मलाड के बहुचर्चित पॉक्सो मामले में आरोपी की ज़मानत याचिका खारिज

एनएसएसीबी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में भ्रष्टाचार और अपराध के खिलाफ भी मुखर हैं एडवोकेट मिश्रा

एडवोकेट ओम प्रकाश मिश्रा
वरिष्ठ अधिवक्ता ओम प्रकाश मिश्रा
एडवोकेट कल्पना मिश्रा
एडवोकेट कल्पना मिश्रा

मुंबई: मायानगरी मुंबई की इस भागदौड़ भरी और चकाचौंध से भरी दुनिया में जहाँ हर चीज़ का पैमाना पैसा और मुनाफा बन चुका है, वहीं कानून की देहरी पर आज भी कुछ ऐसे प्रहरी मौजूद हैं जो न्याय को बिकने नहीं देते। बॉम्बे हाईकोर्ट के जाने-माने वरिष्ठ अधिवक्ता ओम प्रकाश मिश्रा और एडवोकेट कल्पना मिश्रा आज इसी न्याय-कर्म के मजबूत स्तंभ बनकर उभरे हैं। इन दोनों की जोड़ी ने यह साबित कर दिया है कि अदालत के कटघरे में ताकतवर का पैसा नहीं, बल्कि पीड़ित की सच्चाई और मज़बूत कानूनी पैरवी ही सबसे बड़ी ताकत होती है।

पैसों से नहीं, पीड़ित के दर्द से तय होती है प्राथमिकता

आम तौर पर वकालत के पेशे को भारी-भरकम फीस और महंगे वकीलों के चश्मे से देखा जाता है, लेकिन एडवोकेट ओम प्रकाश मिश्रा इस सोच से बिल्कुल इत्तेफाक नहीं रखते। उनके पास जब भी कोई आर्थिक रूप से कमज़ोर या असहाय व्यक्ति न्याय की गुहार लेकर पहुँचता है, तो वे कभी अपने कदम पीछे नहीं खींचते। वे मुकदमे के कागज़ों से ज़्यादा सामने वाले के आँसू, उसका दर्द और मामले की सच्चाई को परखते हैं। यदि फरियादी सच्चा है, तो वे बिना किसी स्वार्थ के मामले के आखिरी छोर तक उस मज़लूम की ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं, क्योंकि उनके लिए वकालत कोई पेशा नहीं, बल्कि पीड़ित को न्याय दिलाने का कर्तव्य है।

कोर्ट-कचहरी की चारदीवारी से बाहर निकलकर वे समाज सुधार के कार्यों में भी अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। देश की जानी-मानी संस्था एनएसएसीबी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में वे समाज में फैल रहे भ्रष्टाचार, कुरीतियों और अपराध के खिलाफ खुलकर आवाज़ उठाते हैं और अपराधियों के चेहरे बेनकाब करते हैं।

मलाड पॉक्सो केस: जब नामी वकीलों की फौज को खानी पड़ी मात

हाल ही में मलाड (मुंबई) क्षेत्र का एक गंभीर पॉक्सो (POCSO) मामला शहर भर में चर्चा का विषय बना, जिसमें एडवोकेट ओम प्रकाश मिश्रा और एडवोकेट कल्पना मिश्रा की कानूनी कुशलता का लोहा सबने माना।

मामला मलाड स्थित ‘स्वप्नपूर्ति सोसाइटी’ के चेयरमैन से जुड़ा था, जिस पर पॉक्सो एक्ट जैसी बेहद गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज हुआ था। रसूखदार आरोपी पक्ष ने अपनी तरफ से शहर के कई महँगे और नामी वकीलों की भारी-भरकम फौज खड़ी कर दी थी। यहाँ तक कि चार्जशीट दाखिल होने से पहले ही आरोपी पक्ष ने ज़मानत के लिए याचिका भी लगा दी थी। इस परिस्थिति में पीड़िता और उसका पूरा परिवार गहरे खौफ और मानसिक दबाव में था, क्योंकि आरोपी उसी सोसाइटी का चेयरमैन था जहाँ वे रहते थे। पीड़िता और उसके परिजनों के मन में यह डर था कि यदि आरोपी छूट गया, तो उनका वहां जीना मुहाल हो जाएगा।

झूठे दिलासे नहीं, अकाट्य कानूनी रणनीति पर किया काम

संकट की इस घड़ी में पीड़िता ने जब एडवोकेट ओम प्रकाश मिश्रा का दामन थामा, तो उन्होंने बिना किसी खोखले आश्वासन या सियासी ड्रामेबाजी के बेहद परिपक्वता से पीड़ित परिवार को ढांढस बंधाया। उन्होंने स्पष्ट और दो टूक शब्दों में कहा—

“धीरज रखिए, हमने ज़मानत के विरोध में कानूनी रूप से पूरी तैयारी कर ली है। कोर्ट के सामने ठोस आधार रखे गए हैं, फैसला अदालत का होगा।”

सुनवाई के दौरान एडवोकेट ओम प्रकाश मिश्रा ने इतने मज़बूत, अकाट्य और तथ्यपरक तर्क रखे कि अदालत को आरोपी की ज़मानत याचिका सिरे से खारिज करनी पड़ी। जब न्याय की मुहर लगी, तो पीड़िता और उसके परिजनों की आँखें राहत के आँसुओं से भर गईं।

ईमानदार पत्रकारिता और निष्ठावान वकीलों का संगम

मलाड से लेकर पूरे मुंबई महानगर में इस कानूनी संघर्ष और जीत की गूंज है। आज एडवोकेट ओम प्रकाश मिश्रा और एडवोकेट कल्पना मिश्रा केवल वकीलों के बीच ही नहीं, बल्कि आम जनता के बीच भी ‘न्याय के पहरेदार’ के रूप में अपनी जगह बना चुके हैं।

‘वशिष्ठ वाणी’ ऐसे निष्ठावान, साहसी और न्याय योद्धाओं को बार-बार सलाम करती है, जो अंधेरे से घिरे पीड़ितों की ज़िंदगी में उम्मीद की किरण बनकर रोशनी बिखेर रहे हैं।

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