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जब खाकी ने चुप्पी नहीं, संवाद चुना! वरिष्ठ अधिकारी रानीपुरी के संज्ञान के बाद मुंबई भर में सराहना

मुंबई विशेष रिपोर्ट | वशिष्ठ वाणी

पत्रकारिता का मूल उद्देश्य केवल व्यवस्था की कमियों को उजागर करना नहीं, बल्कि जनहित में प्रशासनिक जवाबदेही तय करना और सुधार की राह दिखाना भी है। 15 वर्षों से अधिक के पत्रकारिता के सफर में अक्सर यह देखा जाता है कि पुलिस विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठने के बाद संबंधित अधिकारी चुप्पी साध लेते हैं, संवाद से बचते हैं या शिकायतों को ठंडे बस्ते में डाल देते हैं।

लेकिन मुंबई के मालवणी पुलिस स्टेशन से आई यह खबर पूरी मुंबई पुलिस और प्रशासनिक महकमे के लिए एक अनुकरणीय मिसाल बन गई है। मालवणी पुलिस स्टेशन की वरिष्ठ अधिकारी रानीपुरी जी ने आलोचना से भागने के बजाय पारदर्शी संवाद का रास्ता चुना और यह साबित कर दिया कि जब प्रशासनिक कुर्सी पर बैठा अधिकारी संवेदनशील हो, तो पुलिस व्यवस्था पर आम जनता का डिगा हुआ भरोसा फिर से बहाल हो सकता है।

‘वशिष्ठ वाणी’ की खबर का सीधा असर: जब अधिकारी ने संवाद को प्राथमिकता दी

मालवणी गेट नंबर 07 क्षेत्र में घटी घटना (FIR No. 1584/2026) में दर्ज BNS 118(1) (खतरनाक हथियारों से हमला – गैर-जमानती धारा) और पुलिसिया कार्यशैली पर ‘वशिष्ठ वाणी’ द्वारा उठाए गए सवालों का वरिष्ठ अधिकारियों ने तत्काल संज्ञान लिया।

खबर के प्रसारित होते ही वरिष्ठ अधिकारी रानीपुरी जी ने प्रशासनिक संवेदनशीलता दिखाते हुए सीधे वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं ‘वशिष्ठ वाणी’ के स्वामी व प्रकाशक अभिषेक अनिल वशिष्ठ से फोन पर वार्ता की। उन्होंने न केवल पूरे विषय को गंभीरता से समझा, बल्कि पीड़िता को सीधे अपने पास बुलाकर पूरी सुरक्षा, पारदर्शी जांच और न्याय का ठोस भरोसा दिया।

वशिष्ठ मीडिया हाउस के चेयरमैन अभिषेक अनिल वशिष्ठ ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा:

“पत्रकारिता के 15 सालों के सफर में कई बार अधिकारियों की ओर से संवादहीनता का सामना करना पड़ा। लेकिन मैडम रानीपुरी जी का व्यवहार एक सकारात्मक और सुखद अनुभव रहा। उन्होंने चुप्पी के बजाय संवाद को चुना। हमारी पत्रकारिता किसी व्यक्ति विशेष के विरोध में नहीं, बल्कि जनहित और प्रशासनिक जवाबदेही के पक्ष में है। ऐसे अधिकारियों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए जो खबर को केवल आलोचना नहीं, बल्कि जनता की आवाज समझकर सुनते हैं। मैडम रानीपुरी जी को मेरा सलाम!”

विधिक पहलू: BNS 118(1) गैर-जमानती अपराध, कानूनी प्रक्रिया और निष्पक्ष जांच का भरोसा

इस मामले के कानूनी पहलुओं पर वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के लीगल एडवाइजर एवं वरिष्ठ अधिवक्ता ओम प्रकाश मिश्रा ने स्थिति स्पष्ट की।

अधिवक्ता ओम प्रकाश मिश्रा के अनुसार:

  1. गैर-जमानती धारा का सच: “भारतीय न्याय संहिता की धारा 118(1) एक गंभीर और गैर-जमानती अपराध है, इसलिए पीड़िता की सुरक्षा और उसका कानून पर विश्वास कायम रखना मालवणी पुलिस के लिए सर्वोपरि है। यद्यपि नियम तत्काल गिरफ्तारी की ओर इशारा करते हैं, लेकिन यदि पुलिस ने BNSS धारा 35 के तहत नोटिस दिया है, तो यह निर्णय पुलिस ने अपने ‘पर्सनल रिस्क’ पर जांच को आगे बढ़ाने के लिए लिया है।”
  2. थाने में समझौते कराने की प्रथा पर कड़ा ऐतराज: “पुलिस का काम कानून लागू करना और एफआईआर/एनसी दर्ज कर जांच करना है, न कि बिचौलिया बनकर समझौते कराना। थाने में समझौते कराने का रिवाज पूरी तरह गलत है और इस व्यवस्था में सुधार जरूरी है।”
  3. वरिष्ठ अधिकारी का रुख सराहनीय: “ऐसे माहौल में वरिष्ठ अधिकारी रानीपुरी जी का स्वयं आगे आकर निष्पक्ष जांच और थाने के माहौल पर संज्ञान लेना अत्यंत सराहनीय कदम है।”

मुंबई के हर पुलिस स्टेशन में लागू हो ‘रानीपुरी मॉडल’

आज मुंबई में आम नागरिकों का एक बड़ा वर्ग थाने जाने से हिचकिचाता है, क्योंकि कई स्थानों पर निष्पक्ष कार्रवाई की जगह प्राथमिक स्तर पर मामला टालने या समझौते का दबाव बनाने की कोशिश होती है। यदि रानीपुरी जी की तरह मुंबई के हर क्षेत्र और विभाग में ऐसे संवेदनशील अधिकारी तैनात होने लगें जो:

  • मीडिया और जनता द्वारा उठाए गए मुद्दों पर तत्काल निष्पक्ष संज्ञान लें,
  • पीड़िता से सीधे संवाद स्थापित कर सुरक्षा और न्याय का भरोसा दें,
  • और जो भी अधिकारी थाने में अनैतिक रूप से ‘समझौता’ करते या ढिलाई बरतते पाए जाएं, उन पर कड़ी से कड़ी दंडात्मक कार्रवाई करें,

…तो मुंबई में किसी भी असहाय नागरिक या परिवार को न्याय के लिए दर-दर भटकना नहीं पड़ेगा।

‘वशिष्ठ वाणी’ राज्य सरकार, गृह मंत्रालय और मुंबई पुलिस कमिश्नरेट से अपील करती है कि ऐसे कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों की हर जगह नियुक्ति की जाए, ताकि खाकी की साख मजबूत हो और आम जनता का पुलिस व्यवस्था पर टूटा हुआ भरोसा पूरी तरह बहाल हो सके।

— वशिष्ठ वाणी न्यूज़ डेस्क

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