विशेष विधिक रिपोर्ट | वशिष्ठ वाणी
मुंबई: मालवणी गेट नंबर 07 क्षेत्र में महिला पर हुए हमले (FIR No. 1584/2026) के बाद पुलिस की कानूनी प्रक्रिया और गिरफ्तारी को लेकर उठ रहे सवालों के बीच ‘वशिष्ठ वाणी’ की टीम ने वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के लीगल एडवाइजर एवं वरिष्ठ अधिवक्ता श्री ओम प्रकाश मिश्रा जी से विस्तृत बातचीत की और इस पूरे मामले के कानूनी पहलुओं को समझा।
“वैसे तो तत्काल गिरफ्तारी होनी चाहिए, लेकिन पुलिस अपने जोखिम अथवा विवेक पर दे सकती है नोटिस” — एडवोकेट ओम प्रकाश मिश्रा
मामले में दर्ज भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धाराओं पर कानूनी राय देते हुए एडवोकेट ओम प्रकाश मिश्रा जी ने स्पष्ट किया:
“मामले में दर्ज भारतीय न्याय संहिता की धारा 118(1) गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में आता है, इसलिए पीड़ित महिला की सुरक्षा और उसका कानून पर विश्वास कायम रखना मालवणी पुलिस के लिए बेहद जरूरी है। नियम और सामान्य प्रक्रिया तो यही कहती है कि ऐसे मामलों में आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी होनी चाहिए। लेकिन यदि पुलिस ने BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) की धारा 35(3) के तहत आरोपियों को नोटिस भेजा है, तो यह कदम मालवणी पुलिस चौकी ने अपने ‘पर्सनल रिस्क’ (अपने जोखिम अथवा विवेक) पर उठाया है।”
अधिवक्ता मिश्रा जी ने आगे समझाया कि कई बार पुलिस मामले की संवेदनशीलता, प्राथमिक तथ्यों और परिस्थितियों को गहराई से समझने के लिए अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए पहले नोटिस जारी करती है, ताकि जांच को सही दिशा में आगे बढ़ाया जा सके। हालांकि, ऐसा निर्णय पूरी तरह पुलिस अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही और जोखिम पर निर्भर करता है।
“थाने में समझौते कराने का रिवाज बेहद गलत, इसमें सुधार जरूरी” — एडवोकेट मिश्रा
जब ‘वशिष्ठ वाणी’ की टीम ने एडवोकेट ओम प्रकाश मिश्रा जी को मालवणी पुलिस चौकी में पीड़िता पर समझौते का दबाव बनाए जाने की जानकारी दी, तो उन्होंने पुलिसिया तंत्र की इस प्रवृत्ति पर सख्त ऐतराज जताया।
अधिवक्ता ओम प्रकाश मिश्रा जी ने कहा:
“पुलिस का काम कानून लागू करना, एफआईआर (FIR) या एनसी (NC) दर्ज कर जांच करना है, न कि बिचौलिया बनकर समझौते कराना। यह समस्या केवल मालवणी पुलिस चौकी तक सीमित नहीं है, बल्कि लगभग हर जगह पुलिस की यह कार्यशैली बन चुकी है कि वे मामला दर्ज करने से पहले समझौते का दबाव बनाती हैं, जो कि पूरी तरह गैर-कानूनी और गलत है। पुलिस का इसमें कोई रोल नहीं होना चाहिए और इस व्यवस्था को सुधारने की सख्त जरूरत है।”
“वरिष्ठ अधिकारी रानीपुरी जी का तुरंत संज्ञान लेना अत्यंत सराहनीय”
कानूनी प्रक्रिया की व्याख्या और पुलिसिया ढिलाई पर सवाल उठाने के साथ-साथ एडवोकेट ओम प्रकाश मिश्रा जी ने इस मामले में मालवणी पुलिस चौकी की वरिष्ठ पुलिस अधिकारी रानीपुरी जी की भूमिका की खुलकर सराहना की।
उन्होंने कहा:
“आमतौर पर देखा जाता है कि जब पुलिस की कार्यशैली या निचले कर्मचारियों पर सवाल उठते हैं, तो अधिकारी चुप्पी साध लेते हैं या केवल कागजी खानापूर्ति करते हैं। ऐसे में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी रानीपुरी जी का तत्काल इस मामले का संज्ञान लेना, खुद आगे बढ़कर सवालों के जवाब देना और पीड़िता को निष्पक्ष न्याय व सुरक्षा का आश्वासन देना बेहद सराहनीय कार्य है। बहुत कम वरिष्ठ अधिकारी ऐसे होते हैं जो प्रशासनिक संवेदनशीलता दिखाते हुए इतनी त्वरित तत्परता से काम करते हैं।”
कानूनी निष्कर्ष और आगे का रास्ता
वशिष्ठ मीडिया हाउस के विधिक सलाहकार एडवोकेट ओम प्रकाश मिश्रा जी के अनुसार, भले ही शुरुआत में प्रक्रियात्मक स्तर पर सवाल उठे हों, लेकिन अब जब वरिष्ठ अधिकारी खुद इस पूरे मामले की निगरानी कर रही हैं, तो यह उम्मीद की जानी चाहिए कि जांच पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष होगी। BNS 118(1), 115(2), 352 और 3(5) जैसी धाराओं के तहत पुलिस तथ्यों की निष्पक्ष जांच कर न्यायसंगत कार्रवाई करेगी।














