विशेष खोजी रिपोर्ट (मुंबई) | 01 अगस्त 2026
अगर आपको लगता है कि सूचना का अधिकार (RTI) देश के आम नागरिक का सबसे बड़ा हथियार है, तो मुंबई पुलिस का यह कारनामा आपकी आँखें खोल देगा। मालवणी पुलिस स्टेशन का एक ऐसा मामला सामने आया है जहाँ पर्यावरण के दुश्मनों को बचाने के लिए पुलिस अधिकारियों ने न केवल कानून की धज्जियाँ उड़ाईं, बल्कि RTI जैसे संवैधानिक अधिकार का भी मज़ाक बनाकर रख दिया।
🌳 समाजसेवियों की पहल, बीएमसी की पुष्टि… फिर भी पुलिस की ढिलाई!
मामला मालवणी (सामना नगर, गेट नंबर 08) का है। पाँच सोसायटियों को मिलाकर ‘डॉ. अब्दुल कलाम’ के नाम से एक संस्था (फेडरेशन) बनाई गई है। इस फेडरेशन के चेयरमैन और सेक्रेटरी द्वारा अवैध रूप से दीवार खड़ी करने का काम करवाया जा रहा था। दीवार निर्माण के दौरान वहाँ काम कर रहे कर्मचारियों ने कई हरे-भरे पेड़ों की जड़ों को बेरहमी से काट दिया।
जब पेड़ों से प्रेम करने वाली एक स्थानीय सामाजिक संस्था ने यह देखा, तो उन्होंने तुरंत इसकी लिखित शिकायत बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) के उद्यान विभाग से की।

बीएमसी के अधिकारियों ने जब मौके पर जाकर जांच की, तो पेड़ों की जड़ें काटने का अपराध 100% सच पाया गया। इसके बाद बीएमसी ने कानूनी कार्रवाई शुरू की:
- 11 जनवरी 2025: बीएमसी ने मालवणी पुलिस स्टेशन के तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक (Senior PI) शैलेंद्र नागरकर को लिखित शिकायत भेजकर संस्था के जिम्मेदार पदाधिकारियों पर मामला दर्ज करने का निर्देश दिया।
- 28 मार्च 2025: बीएमसी जैसी सरकारी संस्था की रिपोर्ट मिलने के बावजूद मालवणी पुलिस की जाँच अधिकारी (PSI) अमृता देशमुख को केवल एक NC दर्ज करने में पूरे 3 महीने लग गए! (NC No. 1907/2025).
आज 01 अगस्त 2026 हो चुकी है—यानी बीएमसी की रिपोर्ट और सामाजिक संस्था के संघर्ष के डेढ़ साल से अधिक (18 महीने) बीत जाने के बाद भी इस मामले में दोषियों पर FIR दर्ज नहीं हुई है।
❓ RTI का ड्रामा: सवालों से भागती मुंबई पुलिस
जब नागरिक ने RTI के ज़रिए मालवणी पुलिस से सीधे सवाल पूछे कि:
- बीएमसी के पत्र पर NC दर्ज करने में 3 महीने की देरी क्यों हुई? इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है?
- क्या पुलिस ने धारा 155 CrPC (BNSS 174) के तहत कोर्ट में अर्जी देकर इस NC को FIR में बदलने की अनुमति माँगी?

तो जवाब देने के बजाय सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) कार्यालय ने बेशर्मी से लिख दिया: “NC दर्ज कर ली गई है, आवेदक कोर्ट जाकर राहत ले।”
सवाल यह है: जब पर्यावरण प्रेमियों की शिकायत पर बीएमसी ने खुद सरकारी स्तर पर जांच करके पुलिस को लिखकर दिया, तो पुलिस खुद कोर्ट जाकर अनुमति माँगने के बजाय जनता को कोर्ट के धक्के खाने की “सलाह” कैसे दे सकती है?
🔄 ट्रांसफर हो गया… तो क्या पाप धुल गए?
अब खबर है कि तत्कालीन सीनियर PI शैलेंद्र नागरकर और जाँच अधिकारी अमृता देशमुख दोनों का ट्रांसफर मालवणी पुलिस स्टेशन से हो चुका है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या ट्रांसफर होते ही अधिकारियों की जवाबदेही खत्म हो जाती है?
- कानून क्या कहता है? महाराष्ट्र पुलिस सेवा नियमों (Police Rules) के तहत, पद पर रहते हुए कर्तव्य में घोर लापरवाही (Dereliction of Duty) और सरकारी फाइलों को दबाकर रखने के लिए तबादले के बाद भी अधिकारियों पर विभागीय जाँच (Departmental Enquiry) बैठ सकती है।
- क्या पुलिस कमिश्नर इन दोनों अधिकारियों पर BNS की धारा 198/199 (कानून की अवहेलना करना) के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई का आदेश देंगे?
⚖️ क्या मामला दब जाएगा या होगी कार्रवाई?
पर्यावरण की रक्षा के लिए जब नागरिक और बीएमसी दोनों आगे आए, तब भी कानून के रखवालों ने 18 महीने तक फाइल को ठंडे बस्ते में डालकर रखा। RTI कानून को ठेंगा दिखाने वाली मालवणी पुलिस ने यह साबित कर दिया है कि उनके लिए नियम-कानून सिर्फ कागज़ों तक सीमित हैं।
अब देखना यह होगा कि मुंबई पुलिस आयुक्त (Commissioner of Police) और DCP (Zone 11) इस पर क्या संज्ञान लेते हैं:
- क्या 18 महीने से धूल फाँक रही बीएमसी की शिकायत पर कोर्ट से अनुमति लेकर तुरंत FIR दर्ज की जाएगी?
- क्या 3 महीने तक फाइल दबाकर रखने वाली अमृता देशमुख और तत्कालीन सीनियर PI शैलेंद्र नागरकर पर कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) जारी होगा?
- या फिर जनता यही मान ले कि मुंबई पुलिस का ज़मीर पूरी तरह मर चुका है?











