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वर्दी की आड़ में ‘छिपकर चालान काटने’ का यह कौन सा ड्रामा है? बड़े शोरूम और बसों के अवैध कब्जों पर आंखें मूंदकर सिर्फ हेलमेट पर डंडे चलाने वाले इस सिस्टम का काला चिट्ठा!

लिंक रोड पर मारुति, टीवीएस, एमजी शोरूम और इनॉर्बिट मॉल के पीछे खड़ी करोड़ों की बसें नजर नहीं आतीं, पर कोने में छिपकर आम जनता की जेब काटने में माहिर है यह पुलिस महकमा! वशिष्ठ वाणी की तीखी पड़ताल।

मुंबई: मुंबई की सड़कों पर इन दिनों ट्रैफिक पुलिस और प्रशासन का एक ऐसा लचर और हास्यास्पद खेल चल रहा है, जिसे देखकर हंसी भी आती है और सिस्टम की लाचारी पर गुस्सा भी आता है। ‘वशिष्ठ वाणी’ की ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान जो दृश्य कैमरे में कैद हुआ, उसने इन खाकी वर्दी वालों के काले कारनामों की पोल खोलकर रख दी है।

पुलिस की गश्त या छिपकर वसूली का खेल?

जरा इस नजारे को गौर से देखिए:

  • पुलिस की गाड़ियां पेट्रोलिंग के नाम पर निकलती हैं, लेकिन उनका मकसद ट्रैफिक सुधारना नहीं, बल्कि अपना ‘कोटा पूरा’ करना होता है।
  • इन साहबों को मलाड लिंक रोड पर सरेआम नियमों की धज्जियां उड़ा रहे टीवीएस शोरूम, मारुति कार शोरूम, एमजी कार शोरूम, ग्रीन्स रेस्टोरेंट या फिर इनॉर्बिट मॉल के पीछे रोड पर लाइन से कब्जा जमाकर खड़ी करोड़ों रुपए की बड़ी-बड़ी बसें बिल्कुल नजर नहीं आतीं!
  • ये तमाम बड़े शोरूम और बस मालिक सड़क को अपना निजी पार्किंग लॉट बनाए बैठे हैं, लेकिन मजाल है कि पुलिस की इन गाड़ियों ने उधर एक बार भी नजर उठाई हो।

इसके बजाय, ये बहादुर अधिकारी जाकर इन्फिनिटी मॉल के बैक रोड पर किसी कोने में छिप जाते हैं, ताकि वहां से गुजरने वाले उन बेकसूर लोगों को पकड़ सकें जिन्होंने शायद हेलमेट नहीं पहना है। हेलमेट न पहनने वालों को पकड़ो, चालान काटो, अपनी वसूली का कोटा पूरा करो और हो गई दिनभर की ‘कमाई’!

शिकायतों का इंतजार क्यों? क्या अधिकारियों की आंखें अंधी हैं?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ट्रैफिक विभाग और पुलिस के इन अधिकारियों को अपनी ड्यूटी निभाने के लिए किसी की ‘शिकायत’ का इंतजार करना पड़ता है?

  • क्या एक निष्पक्ष और ईमानदार अधिकारी को यह खुला सच दिखाई नहीं देता कि पूरा मलाड लिंक रोड अवैध पार्किंग से घुट रहा है?
  • जिनके पास खुद की पार्किंग की जगह नहीं है, वे पूरे के पूरे रोड को ही अपनी दुकान और पार्किंग बना चुके हैं।
  • लेकिन जब ये अधिकारी मौके पर कार्रवाई करने पहुंचते भी हैं, तो इनका नाटक देखिए—ये ऐसा दिखाते हैं जैसे इन्हें कोई शौक नहीं था, बल्कि किसी ने शिकायत कर दी इसलिए मजबूरी में आना पड़ा! ताकि शोरूम के मालिकों और रसूखदारों के साथ इनका गुप्त समझौता सुरक्षित बना रहे।

ईमानदारी का नाटक और मिलीभगत की हकीकत

यदि पुलिस और ट्रैफिक विभाग के अधिकारी सचमुच ईमानदारी से अपनी कुर्सी पर बैठे होते, तो उन्हें किसी शिकायत की जरूरत नहीं पड़ती। उन्हें पता है कि अगर वे मारुति, टीवीएस, एमजी शोरूम या अवैध बस पार्किंग पर डंडा चला दें, तो उनका ‘ऊपरी सिस्टम’ हिल जाएगा। इसलिए बड़े लोगों को छोड़कर, सारा रोब सिर्फ आम जनता और बिना हेलमेट वाले चालकों पर झाड़ा जाता है।

गोरेगांव ट्रैफिक विभाग और स्थानीय पुलिस महकमे के नए नुमाइंदों ने शायद यही ट्रेनिंग ली है कि सिस्टम को सुधारने के बजाय, इस भ्रष्टाचार की मलाई में कैसे हिस्सा लेना है।

‘वशिष्ठ वाणी’ की दो टूक चेतावनी:

यह छिपकर चालान काटने और बड़े रसूखदारों के सामने दुम हिलाने का खेल अब और नहीं चलेगा। जनता सब देख रही है और समझ रही है कि किस तरह वर्दी की आड़ में यह वसूली का धंधा चलाया जा रहा है। अगर इन अवैध शोरूमों और सड़कों पर कब्जा जमाने वाली बसों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह अखबार इन छिपे हुए चेहरों को बेनकाब करने के लिए और भी कड़े खुलासे करेगा!

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