मुंबई/वशिष्ठ वाणी: क्या सरकारी कुर्सियों पर बैठे अधिकारी अब जनता के प्रति जवाबदेह नहीं रहे? म्हाडा (MHADA) गोरेगांव क्षेत्र के अधिकारी संतोष कांबले के हालिया व्यवहार ने तो यही साबित किया है। वशिष्ठ मीडिया हाउस के चेयरमैन अभिषेक वशिष्ठ द्वारा जनहित के मुद्दों पर सवाल पूछने पर अधिकारी ने जिस तरह की ‘बदतमीजी’ की और फोन काटा, वह न केवल पत्रकारिता का अपमान है, बल्कि यह उन हजारों निवासियों के साथ धोखा है जो अवैध निर्माण की मार झेल रहे हैं।
“म्हाडा द्वारा जारी वह नोटिस जो अधिकारी संतोष कांबले के दावों की पोल खोलता है।”



क्या है पूरा मामला?
मामला मालवणी, समाना नगर (गेट नंबर 8) का है, जो लंबे समय से विवादों में घिरा है। स्थानीय निवासियों और मीडिया के अनुसार, यहाँ के आपातकालीन रास्ते (Emergency Exit) पर एक तथाकथित फेडरेशन बनाकर सालों तक अवैध पार्किंग चलाई गई। मामले ने तब और भी तूल पकड़ लिया जब बोरीवली फायर ब्रिगेड के अधिकारियों ने इस अवैध कब्जे को लेकर म्हाडा क्षेत्र निर्माण (गोरेगांव) और कांदिवली ट्रैफिक विभाग को लिखित शिकायत भेजकर आगाह किया। फायर ब्रिगेड ने स्पष्ट किया है कि आपातकालीन रास्तों (Emergency Exits) पर अवैध पार्किंग किसी भी बड़ी दुर्घटना के समय राहत कार्यों में बड़ी बाधा बन सकती है।
- RTO की कार्रवाई और मिलीभगत का खेल: पूर्व में म्हाडा के गोरेगांव विभाग ने नोटिस जारी कर इस पार्किंग को बंद करवाया था और कांदिवली RTO को पत्र लिखकर कार्रवाई का अनुरोध किया था। इसके बाद कई महीनों तक कार्रवाई हुई भी, लेकिन आरोप है कि जिस फेडरेशन अध्यक्ष ने यह अवैध पार्किंग शुरू करवाई थी, उसने RTO अधिकारियों से साठगांठ कर कार्रवाई को रुकवा दिया। आश्चर्य की बात यह है कि म्हाडा ने सब जानते हुए भी उस फेडरेशन अध्यक्ष पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।
- जान से खिलवाड़: आपातकालीन रास्तों को बाधित करना किसी भी दुर्घटना या आग लगने की स्थिति में सैकड़ों लोगों की जान को सीधे तौर पर जोखिम में डालना है।
- अवैध वसूली: आरोप है कि यहाँ फ्लैट मालिकों को धोखे में रखकर सालों तक पार्किंग के नाम पर मोटी रकम वसूली गई।
- जुर्माना लगा पर FIR क्यों नहीं?: म्हाडा प्रशासन ने इस मामले में 1 लाख 8 हजार रुपये का जुर्माना तो लगाया, लेकिन अब तक कोई FIR दर्ज नहीं की गई है, जो सीधे तौर पर भ्रष्टाचार और मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
“म्हाडा का ब्लूप्रिंट चीख-चीख कर कह रहा है ‘यहाँ निर्माण मना है’,
लेकिन हकीकत में अधिकारी संतोष कांबले के संरक्षण में जर्जर वॉटर टैंक पर सोसाइटी ने तान दिया ‘मौत का शेड’।”


वॉटर टैंक पर ‘मस्ती’ का अड्डा: ब्लूप्रिंट की उड़ी धज्जियां
अभिषेक वशिष्ठ ने अधिकारी का ध्यान ओम सिद्धिविनायक सोसाइटी की ओर भी दिलाया। यहाँ के चेयरमैन और सचिव (फैयाज शेख) पर आरोप है कि उन्होंने 15 साल पुराने जर्जर वॉटर टैंक पर अवैध रूप से ‘ओपन शेड’ बनाकर उसे एक ‘इवेंट स्पॉट’ में तब्दील कर दिया है। सरकारी ब्लूप्रिंट के अनुसार उस जगह पर किसी भी प्रकार का निर्माण वर्जित है, फिर भी म्हाडा की नाक के नीचे यह निर्माण सीना तानकर खड़ा है।
- ब्लूप्रिंट में इस निर्माण का कोई नामो-निशां नहीं है।
- अगर कल को कोई हादसा हुआ, तो क्या संतोष कांबले इसकी जिम्मेदारी लेंगे? या तब भी यही कहेंगे कि “यह हमारा काम नहीं है?”

लेकिन म्हाडा अधिकारी संतोष कांबले ने जनसुरक्षा के इस गंभीर दस्तावेज को रद्दी की टोकरी में डाल दिया है।”
अधिकारी का गैर-जिम्मेदाराना रवैया
जब इन अवैध गतिविधियों पर संतोष कांबले से जवाब मांगा गया, तो उनके तर्क हैरान करने वाले थे:
- पल्ला झाड़ना: अधिकारी ने कहा कि “जगह सोसाइटी को दे दी गई है, अब यह देखना हमारा काम नहीं है कि वहां क्या हो रहा है।” जबकि हकीकत यह है कि म्हाडा लेआउट में नियमों का उल्लंघन रोकना विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
- मीडिया का अपमान: जब उन्हें वस्तुस्थिति और ब्लूप्रिंट के उल्लंघन के बारे में बताया गया, तो अधिकारी का अहंकार सामने आ गया। उन्होंने कहा— “तुम्हारे मीडिया के कहने पर हम कुछ नहीं करेंगे, फोन रखो।” और इसके तुरंत बाद कॉल काट दिया गया।
प्रशासनिक मिलीभगत पर सवाल
यह घटना साफ दर्शाती है कि जब तक म्हाडा में संतोष कांबले जैसे अधिकारी तैनात रहेंगे, तब तक पार्किंग माफिया और अवैध निर्माण करने वालों के हौसले बुलंद रहेंगे। सवाल यह उठता है कि क्या म्हाडा के वरिष्ठ अधिकारी अपने मातहतों की इस कार्यशैली और माफियाओं के साथ उनकी कथित सांठगांठ पर संज्ञान लेंगे?
निष्कर्ष: कार्रवाई नहीं तो आंदोलन!
यह खबर केवल एक सूचना नहीं, बल्कि म्हाडा के वरिष्ठ अधिकारियों के लिए एक चेतावनी है। अगर संतोष कांबले जैसे अधिकारियों पर लगाम नहीं कसी गई और मालवणी के पार्किंग माफिया व अवैध निर्माण (वॉटर टैंक कांड) पर FIR दर्ज नहीं हुई, तो यह समझा जाएगा कि ऊपर से नीचे तक सब मिले हुए हैं।
“कुर्सी किसी की जागीर नहीं होती। जब अधिकारी माफिया के ‘प्रवक्ता’ बन जाएं, तो समझ लीजिए कि व्यवस्था सड़ चुकी है।”
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