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करोड़ों की लग्जरी बसें खरीदीं, लेकिन पार्किंग के लिए ‘सरकारी सड़क’ घेरी! उमांग टॉवर की सड़क बनी प्राइवेट बस डिपो, क्या गोरेगांव ट्रैफिक विभाग से है साठगांठ?

मुंबई/वशिष्ठ वाणी: अगर आपके पास करोड़ों रुपये की लग्जरी और प्राइवेट बसें खरीदने का बजट है, लेकिन उन्हें खड़ा करने के लिए एक स्क्वायर फीट ज़मीन नहीं है, तो घबराने की ज़रूरत नहीं है! मलाड वेस्ट के माइंडस्पेस क्षेत्र में, इनऑर्बिट मॉल के पीछे ‘उमांग टॉवर’ (Umang Tower, Mindspace, Malad West) की सड़क पर चले आइए। यहाँ सड़क पर बिना किसी डर के बसों का पूरा ‘प्राइवेट डिपो’ बना दिया गया है।

इलाके में चर्चा यहाँ तक है कि “अगर गोरेगांव ट्रैफिक विभाग के किसी बड़े अधिकारी से जान-पहचान या अच्छी सांठगांठ हो, तो मलाड की किसी भी सड़क को अपनी ‘अवैध पार्किंग’ बनाया जा सकता है।”

इस रसूख और प्रशासनिक शह के खेल पर ‘वशिष्ठ वाणी’ लगातार शिकायतें दर्ज करा रही है, लेकिन नतीजा वही—सड़क आज भी बसों के कब्जे में है और कार्रवाई सिफर!

1. करोड़ों की बसें, पर पार्किंग का एक रुपया नहीं!

निजी बस संचालकों का गणित भी गजब है—बसों के काफिले पर करोड़ों रुपये फूंक दिए गए, लेकिन जब बात पार्किंग की आई तो उमांग टॉवर के बाहर की आम जनता की सरकारी सड़क पर ही कब्जा जमा लिया गया।

  • एक-एक करके दर्जनों लग्जरी बसें सड़क के दोनों किनारों को घेरकर खड़ी कर दी जाती हैं।
  • इन बसों के कारण माइंडस्पेस जैसे मुख्य आईटी और कमर्शियल हब में दिनभर जाम की स्थिति बनी रहती है।

2. ‘अधिकारियों से पहचान’ का रौब या ट्रैफिक पुलिस का सरेंडर?

उमांग टॉवर रोड पर जिस बेफिक्री से बसें पार्क की जा रही हैं, वह साफ़ इशारा करता है कि बस मालिकों को गोरेगांव ट्रैफिक विभाग की किसी क्रेन या चालान का रत्ती भर भी खौफ नहीं है।

‘वशिष्ठ वाणी’ का सीधा सवाल:

क्या सच में गोरेगांव ट्रैफिक विभाग में बैठे बड़े अधिकारियों के रसूख और जान-पहचान के दम पर ही यह डिपो चलाया जा रहा है? अगर ऐसा नहीं है, तो बार-बार लिखित और ऑन-ग्राउंड शिकायतों के बावजूद गोरेगांव ट्रैफिक पुलिस की टीमें इन भारी-भरकम बसों को उठाकर कपाउंड में बंद क्यों नहीं करतीं?

3. ‘वशिष्ठ वाणी’ की लगातार शिकायतों पर भी रोड खाली क्यों नहीं हुआ?

‘वशिष्ठ वाणी’ पिछले कई दिनों से उमांग टॉवर के बाहर बन चुके इस ‘प्राइवेट बस डिपो’ की ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रही है और आरटीओ तथा गोरेगांव ट्रैफिक विभाग को शिकायतें भेज रही है।

  • क्या ट्रैफिक विभाग यह मान चुका है कि आम जनता सड़क पर चलने के लिए नहीं, बल्कि जाम में पिसने के लिए बनी है?
  • अगर एक छोटी गाड़ी खड़ी होने पर तुरंत टोइंग क्रेन आ जाती है, तो करोड़ों की इन विशालकाय बसों के सामने ट्रैफिक अमला असहाय क्यों हो जाता है?

प्रशासन को सीधी चेतावनी:

“उमांग टॉवर रोड को बस डिपो बनाने वाले रसूखदारों को ‘वशिष्ठ वाणी’ का स्पष्ट संदेश है—चाहे अधिकारियों से कितनी भी साठगांठ हो, कानून के ऊपर कोई नहीं है। गोरेगांव ट्रैफिक विभाग और BMC यदि इस सड़क को तुरंत खाली नहीं कराते हैं, तो ‘वशिष्ठ वाणी’ इस साठगांठ की पूरी फाइल लेकर उच्च अधिकारियों और अदालत का रुख करेगी!”

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