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चुनाव खत्म, संवाद खत्म? मुख्यमंत्री जी, सोशल मीडिया सिर्फ ‘वोट’ मांगने के लिए है या ‘जवाबदेही’ के लिए भी? ‘वशिष्ठ वाणी’ का कड़ा प्रहार

मुंबई (विशेष ब्यूरो): “जनता जनार्दन है, जनता ही हमारी मालिक है…”— यह वो लोक-लुभावन नारे हैं जो चुनाव के समय महाराष्ट्र के कोने-कोने में गूंजते हैं। चुनाव के दौरान बड़े-बड़े राजनेता जनता से जुड़ने के लिए डिजिटल मीडिया से लेकर जमीनी रैलियों तक दिन-रात एक कर देते हैं। लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म होते हैं और सत्ता की कुर्सी मिल जाती है, वैसे ही जनता के लिए समय खत्म हो जाता है। ‘वशिष्ठ वाणी’ आज एक बार फिर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से वही चुभता हुआ सवाल पूछ रही है, जिससे राज्य का शीर्ष नेतृत्व लगातार कतरा रहा है।

क्या सिर्फ चुनाव जीतने के लिए है सोशल मीडिया का इस्तेमाल?

डिजिटल इंडिया के इस दौर में ट्विटर (X) जैसा प्लेटफॉर्म जनता और सरकार के बीच की दूरी को मिटाने का सबसे बेहतरीन माध्यम बन सकता था। उम्मीद थी कि त्रस्त जनता जब सीधे मुख्यमंत्री को टैग करेगी, तो त्वरित कार्रवाई होगी। लेकिन आज की राजनीति और प्रशासनिक उदासीनता को देखकर साफ हो चुका है कि यह सिर्फ एकतरफा संवाद का जरिया बनकर रह गया है।

मुख्यमंत्री जी, आखिर चुनाव जीतने के बाद जनता की शिकायतों पर यह रहस्यमयी चुप्पी क्यों? क्या सोशल मीडिया हैंडल्स का उपयोग सिर्फ अपनी राजनीतिक ब्रांडिंग, रैलियों की तस्वीरें पोस्ट करने और प्रचार के लिए ही बचा है? आम जनता की शिकायतों को सुनकर उन्हें हल करने का समय अब सरकार के पास क्यों नहीं है?

अधिकारियों को ‘मंत्रियों’ का वरदहस्त: कुर्सी से हिलने को तैयार नहीं भ्रष्ट तंत्र!

‘वशिष्ठ वाणी’ पिछले लंबे समय से ग्राउंड जीरो पर उतरकर जनता के मुद्दों, अवैध निर्माणों, प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार के खिलाफ लगातार मुहिम चला रही है। हमारे खोजी पत्रकारों ने सबूतों के साथ अधिकारियों की पोल खोली है। लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था में रत्ती भर का सुधार नहीं दिख रहा है।

इसकी सबसे बड़ी और कड़वी वजह यह है कि आज ज्यादातर भ्रष्ट अधिकारियों को अच्छी तरह पता है कि ऊपर बैठे मंत्रियों का हाथ उनके सिर पर है। जब रक्षक ही भक्षक के साथ खड़ा हो, तो कार्रवाई की उम्मीद किससे की जाए? अधिकारियों के मन से कानून और जनता का डर पूरी तरह खत्म हो चुका है। उन्हें मालूम है कि मीडिया चाहे जितने सबूत सामने रख दे, सरकार उनके खिलाफ कोई कदम नहीं उठाएगी। यही कारण है कि अपनी कुर्सी पर कुंडली मारकर बैठे ये अधिकारी आम जनता की फरियाद सुनना तो दूर, उनकी तरफ देखना भी ग्वारा नहीं करते।

‘वशिष्ठ वाणी’ की मुख्यमंत्री को दोटूक चेतावनी

मुख्यमंत्री जी, अगर आप आम जनता की आवाज को अनसुना कर रहे हैं, तो कम से कम चौथे स्तंभ (मीडिया) द्वारा उजागर की जा रही गंभीर शिकायतों और सबूतों पर तो संज्ञान लीजिए। खोजी पत्रकारिता के जरिए जो मुद्दे प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करते हैं, उन पर तुरंत एक्शन होना चाहिए न कि उन्हें फाइलों में दबाया जाना चाहिए।

आज की राजनीति का कड़वा सच: सरकारें यह न भूलें कि जनता की याददाश्त कमजोर नहीं होती। अगर आज अधिकारियों को खुली छूट देकर जनता को प्रताड़ित होने के लिए छोड़ दिया गया है, तो आने वाले समय में यही त्रस्त जनता ईवीएम (EVM) के जरिए अपना जवाब देना भी जानती है। मंत्रियों की सरपरस्ती में फल-फूल रहे इस भ्रष्ट तंत्र पर मुख्यमंत्री कब हंटर चलाएंगे, अब पूरी जनता की नजर इस बात पर टिकी है।

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