मुंबई: पत्रकारिता का काम सोए हुए प्रशासन को जगाना होता है, लेकिन मालवानी में म्हाडा (मुंबई क्षेत्र गृहनिर्माण व क्षेत्रविकास मंडळ, गोरेगांव) के अधिकारियों का हाल देखकर लगता है कि ये सिर्फ सोए नहीं हैं, बल्कि कुंभकर्णी नींद के साथ बेशर्मी का घूंट पीकर बैठ चुके हैं। खबरों के पब्लिश होने, जनता के रोष और कोर्ट के समन के बावजूद गोरेगांव म्हाडा के अधिकारी संतोष कांबले और रोहित शिंदे के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही।
यह अधिकारी मीडिया और जनता को खुलेआम अपनी ढिठाई से चुनौती दे रहे हैं कि “तुम चाहे जितनी खबरें छापो, हम न तो आपातकालीन रास्ता खाली कराएंगे, न मालवानी पुलिस चौकी को लेटर भेजेंगे और न अपनी कुर्सी से हिलेंगे!”
1. 8 महीने से एक दस्तखत का नाटक: क्या म्हाडा में कलम चलाना मना है?
एक साधारण सा सरकारी लेटर मालवानी पुलिस चौकी और कांदिवली ट्रैफिक विभाग को भेजा जाना था ताकि आपातकालीन रास्ते (Emergency Exit) को घेरकर खड़े अवैध ऑटो स्टैंड और गाड़ियों को हटाया जा सके।
रोहित शिंदे 8 महीने से एक ही रटा-रटाया झूंठ बोल रहे हैं कि “सीनियर आएंगे और साइन करेंगे।”
- अब सवाल यह उठता है कि क्या सीनियर संतोष कांबले की उंगलियों में दस्तखत करने की ताकत नहीं बची?
- या फिर इस अवैध पार्किंग और कब्जे से म्हाडा के अफसरों को कोई ‘अदृश्य मलाई’ मिल रही है?
- क्या महाराष्ट्र सरकार और म्हाडा के वरिष्ठ अधिकारियों ने इन अफसरों को बेशरमी की खुली छूट दे रखी है?
2. जर्जर वॉटर टैंक पर अवैध कब्जा और 1 लाख 8 हजार की पेनल्टी का ड्रामा

15 साल पुराने खंडहर वॉटर टैंक पर ओम सिद्धि विनायक सोसाइटी द्वारा किए गए अवैध निर्माण पर म्हाडा का मौन साधाना यह साफ दिखाता है कि ये अधिकारी स्थानीय नेताओं (MLA) के खौफ से थर-थर कांपते हैं।
‘डॉक्टर अब्दुल कलाम फेडरेशन’ पर 1 लाख 8 हजार रुपये का जुर्माना सिर्फ कागजी लीपापोती के लिए ठोका गया, लेकिन अध्यक्ष पर एफआईआर (FIR) दर्ज कराने की हिम्मत इन अफसरों में आज तक नहीं हुई।

जनता सवाल पूछ रही है कि अगर कल को किसी बिल्डिंग में आग लग गई और दमकल की गाड़ी रास्ता बंद होने के कारण नहीं पहुंच पाई, तो जो लाशें बिछेंगी, क्या उनकी जिम्मेदारी संतोष कांबले और रोहित शिंदे अपने सिर लेंगे?
3. जनता मान चुकी है—’म्हाडा यानी सिर्फ बेशर्मी और लाचारी!’
इलाके के बेबस लोग दिन-रात ‘वशिष्ठ वाणी’ को फोटो और वीडियो भेजकर पूछ रहे हैं कि इन ढीठ अफसरों से छुटकारा कब मिलेगा। फेडरेशन बंद हो चुका है, पदाधिकारी भाग चुके हैं, लेकिन म्हाडा के अधिकारी दफ्तर में बैठकर जनता के टैक्स के पैसे पर अपनी ‘मोटी चमड़ी’ सेक रहे हैं।
खबरों का असर न होना और कोर्ट के नोटिस को भी ठेंगा दिखाना यह साबित करता है कि म्हाडा गोरेगांव का पूरा सिस्टम अब संवेदनहीनता का पर्याय बन चुका है।














