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पीएम मोदी के तीसरे वीडियो संदेश के बाद नए सवाल, क्या युवाओं की भाषा पर ही होगी चर्चा या मूल मुद्दों पर भी होगा संवाद?

नई दिल्ली | विशेष संवाददाता

जंतर-मंतर पर परीक्षा पेपर लीक के विरोध में हुए प्रदर्शन के दौरान कुछ युवाओं द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी दिवंगत माता के लिए अभद्र भाषा के प्रयोग के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीसरी बार वीडियो संदेश जारी किया। अपने संदेश में उन्होंने कहा कि गालियां किसी समस्या का समाधान नहीं हैं और समाज से अपील की कि भटके हुए युवाओं को दंडित करने के बजाय उन्हें सही मार्गदर्शन दिया जाए तथा उन्हें देश निर्माण में सहभागी बनाया जाए।

प्रधानमंत्री के इस संदेश को जहां कई लोगों ने सकारात्मक और संयमित पहल बताया, वहीं इसके बाद कई नए सवाल भी सामने आने लगे हैं।

सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और विभिन्न वर्गों के लोगों का कहना है कि प्रधानमंत्री ने जंतर-मंतर आंदोलन को लेकर लगातार तीन वीडियो संदेश जारी किए, लेकिन इन संदेशों में युवाओं की मूल चिंताओं—जैसे बेरोज़गारी, परीक्षा पेपर लीक, भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार—पर विस्तार से कोई टिप्पणी नहीं की। उनका कहना है कि आंदोलन की जड़ में मौजूद इन मुद्दों पर भी सरकार की स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने आनी चाहिए।

इसी के साथ कुछ लोगों ने यह भी सवाल उठाया कि यदि प्रधानमंत्री ने युवाओं द्वारा की गई अभद्र भाषा पर सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया दी और उन्हें क्षमा करने की बात कही, तो क्या वे अपनी ही पार्टी के उन नेताओं और जनप्रतिनिधियों की विवादित टिप्पणियों पर भी कोई संदेश देंगे, जिन्होंने आंदोलनकारी युवाओं के लिए कठोर और विवादित शब्दों का प्रयोग किया था। इस संदर्भ में भाजपा सांसद कंगना रनौत के पुराने विवादित बयानों का भी उल्लेख सोशल मीडिया पर किया जा रहा है।

प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी बहस जारी है। सोशल मीडिया पर वायरल कई वीडियो में प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग, लाठीचार्ज तथा महिलाओं के साथ कथित दुर्व्यवहार के आरोप लगाए गए हैं। इन घटनाओं की परिस्थितियों और वीडियो की सत्यता की जांच संबंधित एजेंसियों का विषय है, लेकिन विपक्षी दलों और कई सामाजिक संगठनों ने निष्पक्ष जांच की मांग की है। बिहार सहित अन्य राज्यों में भी प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर अलग-अलग दावे और आरोप सामने आए हैं, जिन पर राजनीतिक बयानबाजी जारी है।

इसी बीच कुछ नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने यह भी प्रश्न उठाया है कि जिन विषयों पर लंबे समय से सार्वजनिक बहस चल रही है—जैसे बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार तथा राम मंदिर के चढ़ावे के कथित दुरुपयोग से जुड़े आरोप—उन पर भी प्रधानमंत्री को खुलकर अपनी बात रखनी चाहिए। उनका तर्क है कि यदि सरकार जनता की भावनाओं और चिंताओं पर भी उसी गंभीरता से संवाद करे, जिस गंभीरता से वह अभद्र भाषा की निंदा करती है, तो लोकतांत्रिक विश्वास और अधिक मजबूत होगा। इन आरोपों और प्रश्नों पर संबंधित पक्षों की अपनी-अपनी स्थिति है तथा विभिन्न मामलों में अलग-अलग स्तर पर प्रक्रियाएं और जांच जारी हैं।

वशिष्ठ वाणी का मानना है कि किसी भी लोकतंत्र में प्रधानमंत्री या किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के प्रति अभद्र और अशोभनीय भाषा का प्रयोग उचित नहीं कहा जा सकता। विरोध करना, सवाल पूछना और सरकार की आलोचना करना प्रत्येक नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन वह मर्यादा और संवैधानिक सीमाओं के भीतर होना चाहिए।

साथ ही लोकतंत्र की यही भावना यह भी अपेक्षा करती है कि सत्ता पक्ष, उसके जनप्रतिनिधि और प्रशासन भी समान रूप से जवाबदेह हों। यदि युवाओं की भाषा पर सार्वजनिक संदेश दिया जा सकता है, तो युवाओं की समस्याओं, नेताओं की भाषा, पुलिस कार्रवाई और जनता से जुड़े गंभीर मुद्दों पर भी खुला संवाद होना चाहिए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकतंत्र की मजबूती केवल विरोध की भाषा पर नहीं, बल्कि जनता के मूल प्रश्नों के निष्पक्ष और पारदर्शी उत्तर देने पर भी निर्भर करती है।

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