क्या सचिन पायलट जनाधार वाली छवी दिखाने में सफल होगें?

क्या सचिन पायलट जनाधार वाली छवी दिखाने में सफल होगें?

Ramsawaroop Rawatsare

राजस्थान में इन दिनों महत्वाकांक्षा भरी सियासी उठक बैठक ज्यादा हो रही है। अब तक सचिन पायलट तथा उनके समर्थकों को मंत्री पद की बात की जा रही थी लेकिन अब 13 निर्दलीयों और बहुजन समाज पार्टी के 6 विधायकों ने भी बगावत का बिगुल फूंक दिया है। ये सभी 19 विधायक सरकार में अपनी हिस्सेदारी का हक जताने के लिए खुलकर मैदान में हैं। पायलट व उनके समर्थकों को पार्टी विरोधी व गद्दार तक बता रहे हैं। इनका कहना है कि सरकार में खाली पदों पर पहला हक उन्हीं का है, क्योंकि उन्हीं के समर्थन से सरकार की स्थिरता बढ़ी है।

जानकारी के अनुसार कांग्रेस आलाकमान भी मान रहा है कि इनकी अवहेलना उचित नहीं है, क्योंकि इन्हीं बाहरी विधायकों के समर्थन से राजस्थान में कांग्रेस स्थिर सरकार देने में सफल रही। कांग्रेस की मुश्किल यह है कि बसपाइयों व निर्दलीयों के बजाय पायलट समर्थकों को अगर तवज्जो दे दी, तो उनकी नाराजगी से मुश्किलें बढ़ सकती है। यह भी सामने आ रहा है कि गहलोत समर्थक विधायक राजनीतिक लाभ पर पहला हक अपना मानते है। उनका कहना है कि संकट में साथ हमने दिया तो लाभ भी हमें ही मिलना चाहिए। राजस्थान में कांग्रेस के सामने जिस प्रकार के हालता बने है। उसके अनुसार लगता है आगामी ढाई साल का समय आसानी से निकालना मुशिकल रहेगा है। वैसे भी पिछला समय बिता है उसमें लगभग समय तो समझाने बुझाने तथा कोविड में चला गया है। सरकार अपने एजेण्डे के अनुसार काम नहीं कर पाई है। अब सचिन पायलट पंजाब का आधार मान कर राजस्थान में भी निर्णय कराना चाहते हैं। लेकिन गहलोत गुट और पायलट गुट में जिस प्रकार की मुखरता सामने आ रही है। उससे आग लगाने और उसे बुझाने का ही काम होगा।

इधर राजस्थान में करीब 15 नेताओं द्वारा पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक चिट्ठी लिखकर प्रदेश के सियासी हालातों से अवगत कराने की बात सामने आ रही है। पत्र लिखने वाले इन 15 नेताओं में चुनाव हारे पार्टी प्रत्याशियों के साथ ही दूसरे कद्दावर नेता भी शामिल हैं। पत्र में लिखा गया है कि साल 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने महज 21 सीट से प्रदेश नेतृत्व और कार्यकर्ताओं की कड़ी मेहनत से 101 सीटें प्राप्त की और राजस्थान में सरकार बनाई।

निर्दलीय और बसपा विधायकों ने कांग्रेस सरकार को समर्थन दिया। लेकिन हमारे क्षेत्रों में कांग्रेस सरकार के ढाई वर्ष के कार्यकाल में अधिकारियों की नियुक्ति से लेकर नगरपालिका में पार्षदों के मनोनयन तक इन्हीं निर्दलीय और बसपा विधायकों की भागीदारी रही, जबकि हम कांग्रेस प्रत्याशियों को पूछा तक नहीं गया।

चिट्ठी में लिखा गया है कि कांग्रेस के मतदाताओं पर इन निर्दलीय और बसपा विधायकों द्वारा भेदभावपूर्ण और दमनात्मक रवैया अपनाया जाता रहा है। प्रदेश में सरकार चलाने के लिये स्पष्ट बहुमत है और कांग्रेस को निर्दलीय और बसपा विधायकों की बैशाखी की जरूरत नहीं है। बाजवूद इसके प्रदेश में इन विधानसभा क्षेत्रों के हम कांग्रेस कार्यकर्ताओं को और पार्टी संगठन के ढांचे को खत्म करने का काम किया जा रहा है। इससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि इन निर्दलीय और बसपा विधायकों की मनमानी के चलते प्रदेश कांग्रेस संगठन भी इनके आगे झुक चुका है। पिछले दिनों हुए नगरपालिका और पंचायत चुनावों में टिकट वितरण में इनकी शत-प्रतिशत भागीदारी रही जबकि कांग्रेस पार्टी से चुनाव लड़ने के बावजूद हमारी भागीदारी शून्य रही। ऐसी परिस्थितियों में हमारे कार्यकत्र्ता और मतदाता अपने आपको ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। इस पत्र ने भी गहलोत सरकार के कामकाज को लेकर उन्हीं बातों को उठाया है जो पायलट गुट भी कहता रहा है।

जानकार लोगों का कहना है कि केन्द्रीय संगठन यदि पायलट को तवज्जों देता है तो गहलोत के साथ वाले विधायक विरोध की हुंकार भरते है। जिनकी संख्यां भी अधिक है, ऐसे में उनके सामने एक ही लाभ पूर्ण विकल्प है कि पायलट के प्रशन का कोई समाधान नहीं किया जाकर समय को निकलने दिया जाय। अभी राजस्थान में पंचायत समिति चुनाव है। कई प्रकार की राजनीतिक नियुक्तियां होनी है। गहलोत गुट विशेष के विरोध की आड़ लेकर राजनीतिक नियुक्तियों में अपने लोगों को भरें जिससे अब तक चला आ रहा साथ आगे भी यथावत बना रहे। साथ ही पायलट और उनकी टीम को दूर रखा जा सके। यही होता लग रहा है।

राजनीति के जानकारों का कहना है कि सचिन पायलट को भी यह लगता है कि उनकी सुनवाई नहीं होगी और यह भी सम्भव है कि वे जो चाहते हैं वह इस काल में कभी पूरा नहीं होगा। इसलिए सचिन पायलट ने सत्ता-संगठन में अपनी भागीदारी के लिए दबाब का प्लान बदल लिया है। अब पायलट अपनी जमीनी ताकत का इस्तेमाल मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और कांग्रेस आलाकमान पर दबाब बनाने के लिए करेंगे। राजस्थान में कोरोना से जिनकी मौतें हुई हैं, पायलट उन परिवारों को सांत्वना देने उनके घर जाएंगे। पहले चरण में वह कांग्रेस पार्टी के उन विधायकों के घर जा रहे हैं जिन्होंने अपनों को खोया है। मिलने के बहाने से उनके मन को टटोला जा सके। पायलट गुट के अलावा भी कई विधायक हैं जो सरकार के काम काज से संतुष्ट नहीं है और सत्ता पक्ष के होते हुए भी उपेक्षित हैं।

यही नहीं इन दौरों के पीछे कार्यकर्ताओं में भी अपनी उपस्थिति को बरकरार रखने की योजना है। जिससे भविष्य में उसे इस्तेमाल किया जा सके। अब आने वाले दिनों में पायलट लाव लश्कर के साथ धुआंधार दौरे करते दिखेंगे. पायलट ये जानते हैं कि मौजूदा हालात में सिर्फ पार्टी हाईकमान को दस महीने पूर्व किया वादा याद दिलाकर समर्थकों को सरकार-संगठन में जगह नहीं दिला पाएंगे। यदि वे जनाधार वाले लोकप्रिय नेता की छवि के साथ आगे बढते हैं तो, दबाब ज्यादा कारगर हो सकता है। ऐसा राजनीतिक गुणा भाग करने वालों का मानना है।

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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