हमें कर्मयोगी बन कर ही जीना होगा

हमें कर्मयोगी बन कर ही जीना होगा

Ramsawaroop Rawatsare 1

पूर्व जन्मों के कर्मों से ही हमें इस जन्म में माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नि, प्रेमी-प्रेमिका, मित्र-शत्रु, सगे-सम्बन्धी इत्यादि संसार के जितने भी रिश्ते नाते हैं, सब मिलते हैं। क्योंकि इन सबको हमें या तो कुछ देना होता है या इनसे कुछ लेना होता है। शास्त्र कहते है कि सन्तान के रुप में हमारा कोई पूर्वजन्म का सम्बन्धी ही आकर जन्म लेता है। जिसको चार प्रकार से बताया गया है।

ऋणानुबन्ध – पूर्व जन्म का कोई ऐसा जीव जिससे आपने ऋण लिया हो या उसका किसी भी प्रकार से धन नष्ट किया हो, वह आपके घर में सन्तान बनकर जन्म लेगा और आपका धन बीमारी में या व्यर्थ के कार्यों में तब तक नष्ट करेगा, जब तक उसका हिसाब पूरा ना हो जाये।

शत्रु पुत्र – पूर्व जन्म का कोई दुश्मन आपसे बदला लेने के लिये आपके घर में सन्तान बनकर आयेगा और बड़ा होने पर माता-पिता से मारपीट, झगड़ा या उन्हें सारी जिन्दगी किसी ना किसी प्रकार से सताता ही रहेगा। हमेशा कड़वा बोलकर उनकी बेइज्जती करेगा व उन्हें दुःखी रखकर खुश होगा।

उदासीन पुत्र – इस प्रकार की सन्तान ना तो माता-पिता की सेवा करती है और ना ही कोई सुख देती है। बस, उनको उनके हाल पर जीने मरने के लिए छोड़ देती है। विवाह होने पर यह माता-पिता से अलग हो जाते हैं।

सेवक पुत्र – पूर्व जन्म में यदि आपने किसी की खूब सेवा की है तो वह अपनी कराई हुई सेवा का ऋण उतारने के लिए आपका पुत्र या पुत्री बनकर आता है और आपकी सेवा करता है। जो बोया है, वही तो काटोगे। अपने माँ-बाप की सेवा की है तो ही आपकी औलाद बुढ़ापे में आपकी सेवा करेगी , वर्ना कोई पानी पिलाने वाला भी पास नहीं होगा।

आप यह ना समझें कि यह सब बातें केवल मनुष्य पर ही लागू होती हैं। इन चार प्रकार में कोई सा भी जीव आ सकता है। जैसे आपने किसी गाय कि निःस्वार्थ भाव से सेवा की है तो वह भी पुत्र या पुत्री बनकर आ सकती है। यदि आपने गाय को स्वार्थ वश पालकर उसको दूध देना बन्द करने के पश्चात घर से निकाल दिया तो वह ऋणानुबन्ध पुत्र या पुत्री बनकर जन्म लेगी। यदि आपने किसी निरपराध जीव को सताया है तो वह आपके जीवन में शत्रु बनकर आयेगा और आपसे बदला लेगा। ऐसा शास्त्रों में बताया गया है।

इसलिये जीवन में कभी किसी का बुरा ना करें। क्योंकि प्रकृति का नियम है कि आप जो भी करोगे, उसे वह आपको इस जन्म में या अगले जन्म में सौ गुना बढाकर वापिस करेगी। यदि आपने किसी को निस्वार्थ भाव से एक रुपया दिया है तो समझो आपके खाते में सौ रुपये जमा हो गये हैं। यदि आपने किसी का स्वार्थवश एक रुपया छीना है तो समझो आपकी जमा राशि से सौ रुपये निकलने का रास्ता बन गया है।

ज़रा सोचिये, आप कौन सा धन साथ लेकर आये थे और कितना साथ लेकर जाओगे ? जो चले गये, वो कितना सोना-चाँदी साथ ले गये? मरने पर जो सोना-चाँदी, धन-दौलत बैंक में पड़ा रह गया, समझो वो व्यर्थ ही कमाया। औलाद अगर अच्छी और लायक है तो उसके लिए कुछ भी छोड़कर जाने की जरुरत नहीं है। खुद ही खा-कमा लेगी और औलाद अगर बिगड़ी या नालायक है तो उसके लिए जितना मर्ज़ी धन छोड़कर जाओ, वह चंद दिनों में सब बरबाद करके ही चैन लेगी।

मैं, मेरा, तेरा और सारा धन यहीं का यहीं धरा रह जायेगा, कुछ भी साथ नहीं जायेगा। साथ यदि कुछ जायेगा भी तो सिर्फ नेकियाँ ही साथ जायेंगी। इसलिए जितना हो सके नेकी करो सतकर्म करो। अपने माता पिता की सेवा करो उनकी हर एक बातों को ध्यान से सुनो और उनकी सभी बातों को अपने जीवन से जोड़ो। आज जिस प्रकार की हवा बह रही है उसके अनुसार प्रत्येक प्राणी सभी प्रकार के सुख चाहते है लेकिन उनमें देने का भाव नहीं होता। यह भी निश्चित है कि जहां सिर्फ लेने का भाव ही रहता है वहां साधन और सुविधाऐ तो बहुत होती है लेकिन मानसिक शान्ति नहीं होती।

मानसिक शान्ति लेने के भाव से नहीं देने के भाव से ही आती है। देना धन का ही नहीं होता, मन का भी होता है। मन से सेवा करना, किसी की बात को मन से सुनना, मन से सहयोग करना, हर किसी के बारे में सकारात्मक सोचना। सभी को श्रेष्ठ भाव से देखना, यह तभी होता है जब हमारे मन में सेवा भाव सभी के लिये समान हो।

इसलिये जितना हो सके अपने कर्मो को श्रेष्ठ बनाने की ओर बढते रहिये। आषाओं और अपेक्षाओं के जंजाल में ना फसते हुए, अपनी आवश्यकताओं को जितना हो सके सीमित रखने का प्रयास करें। जीवन सुखमय रहेगा। जिसे हमें चुकाना है वह चुकेगा, इस जन्म में नही तो अगले जन्म में, इसलिये हमारा प्रयास हो कि उसका हिसाब इसी जन्म में पूरा हो। जो बातें हमारे साथ जुड़ी है उन्हें हम अपना दायित्व मानते हुए पूरा करें, दुःख नहीं सुकून मिलेगा। संसार के रिश्ते नाते इस शरीर से जुड़े है। जिस दिन यह प्रकृति में विलीन होगा, उसी दिन यहां के सारे सम्बन्ध खत्म हो जायेगें। हम यहां अपने कर्म फल को पूरा करने के लिये आये है। कर्मयोगी बन कर ही जीवन को जीयें।

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