यह समय सहयोग करने एवं अपनी जिम्मेदारी निभाने का है

यह समय सहयोग करने एवं अपनी जिम्मेदारी निभाने का है

Ramswaroop Rawatsare
लेखक
रामस्वरूप रावतसरे

क रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली सरकार ने पिछले कुछ महीनों में प्रिंट, टेलीविजन और ऑनलाइन मीडिया के विज्ञापनों पर करोड़ों खर्च किए हैं। केवल 2021 में विज्ञापनों पर 150 करोड़ रुपए खर्च किए गए, जो दिखाते हैं कि दिल्ली सरकार की प्राथमिकताएँ क्या हैं। अकेले मार्च में, सरकार ने विज्ञापनों पर 92.48 करोड़ रुपए खर्च किए। सिर्फ यह बताने के लिए कि कोरोना फैल रहा है। हमारे पास ऑक्सीजन की कमी है। हाॅस्पिटलों में बैड नहीं है। जिससे दिल्ली वासियों में भय की आशंका के चलते जनता सड़कों पर आ जाय। ऐसा हुआ भी। केजरीवाल जी राज्यों को पत्र लिखकर मदद मांग रहे है। उघोगपतियों से कह रहे हैं कि इस आपदा काल में उनकी मदद की जाए। यह राजनीतिक परिपक्वता एवं प्रशासनिक कौशलता का कौनसा पक्ष है।

अपने प्रशासन को चुस्त दुरूस्त करने के बजाय टीवी पर चेहरा दिखाने का काम किया जा रहा है। यह छाती पीट विलाप क्यों? दूसरी बार सत्ता में आने के बाद केजरीवाल ने कहा था कि दिल्ली में विश्व स्तर के चिकित्सा संसाधनों को विकसित किया जाएगा। एक आटीआई के तहत जानकारी में आया है कि केजरीवाल ने सत्ता में आने के बाद एक भी हाॅस्पिटल का निमार्ण नहीं कराया। इन्होंने मुहल्ला क्लिनिक खोले थे। वे भी विज्ञापन की तरह एक बार झलक दिखा कर बन्द हो गए, बताऐ जा रहे है। 

  लोगों का तो यह भी आरोप है कि शाहिनबाग आन्दोलन की जड़ों में खाद और पानी केजरीवाल ग्रुप ने ही डाला था। जिसने दिल्ली वासियों के सीने में ऐसे जख्म छोड़े है जो बरसों तक रिस्ते रहेगें। केन्द्र की भाजपा सरकार के विरोध में चल रहा किसान आन्दोलन 26 जनवरी  के बाद उठ जाने की तैयारी में था। लेकिन दिल्ली की आप सरकार ने उन्हें मुफ्त में बिजली, पानी, वाई फाई एवं अन्य सभी प्रकार की सुविधाएं देकर फिर बैठा दिया, जो आज भी चल रहा है। 

 जानकार लोगों का कहना है कि इस आन्दोलन के चलते देश को तो नुकसान हुआ ही। दिल्ली को भी अब तक अरबों का नुकसान हो चुका है। जनता को तो भारी मुसिबतों का सामना करना पड़ रहा है। यह केजड़ीवाल की तरफ से जनता को सुविधाओं के नाम पर परेशानियों का बोनस है। क्योंकि यह तथाकथित आन्दोलन केन्द्र की भाजपा सरकार के कृषि कानूनों के विरोध को लेकर है। जहां भाजपा का विरोध हो वहां केजरीवाल कैसे पीछे रह सकते हैं। इस विरोध में चाहे सम्पूर्ण दिल्ली की सांसे ही क्यों ना फूल जाए। इस समय यही हो रहा है। 

यह सब करने के पीछे केजरीवाल ग्रुप का असली उदेश्य क्या है! इस सम्बन्ध में जानकार लोगों का कहना है कि केजरीवाल और उनका ग्रुप ऐसा माहोल बनाना चाहते है। जिससे जनता मोदी के खिलाफ खड़ी हो। जितना ज्यादा हल्ला मचेगा, उतनी ही मोदी की ओर अंगुली उठेगी। इससे जनता में मोदी के खिलाफ संदेश जायेगा। साथ ही मोदी जो पांच राज्यों के विधान सभा चुनावों में रैलियां करने में लगे है। उस पर भी विराम लगेगा। यह तो राजनीति करने वालों की फितरत में होता है कि खुद सम्भले या नहीं पर बराबर वाले की फटी में पैर जरूर उलझाना।

जनता द्वारा निर्वाचित सरकार के लिए क्या संविधान यही कहता है कि किसी प्रकार लालच से, द्वेश से, बरगला कर सत्ता हासिल कर लो। उसके बाद संविधान को अच्छे से चमकदार कपड़े में लपेटकर उस आलमारी में रख दो जिसका ताला पांच वर्ष बाद ही खोलना पड़े। इस समय जिस प्रकार के समाचार आ रहे है। और सोसल मिडिया पर जो कुछ प्रबुद्ध लोगों द्वारा लिखा जा रहा है। उसके अनुसार तो ऐसा ही हो रहा है। केजरीवाल सरकार के पास विज्ञापनों पर खर्च करने के लिए राशि की उपलब्धता बहुत अधिक है। लेकिन ऑक्सीजन ट्रासपोर्ट करने के लिए पैसे नहीं है। वे विज्ञापनों के माध्यम से इस बात का रोना रो रहे है कि दिल्ली के हाॅस्पिटलों में ऑक्सीजन की कमी है। उसी से लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार केंद्र सरकार ने पीएम केयर्स फंड से दिसंबर 2020 में ही केजरीवाल सरकार को ऑक्सीजन के लिए राशि मुहैया कराई थी। केंद्र सरकार द्वारा यह राशि दिल्ली में 8 ऑक्सीजन प्लांट स्थापित करने के लिए दी गई थी। केजरीवाल सरकार ने पैसा तो ले लिया लेकिन अब तक मात्र 1 ही ऑक्सीजन प्लांट स्थापित किया।

दिल्ली स्थित जयपुर गोल्डन हॉस्पिटल ने दिल्ली में ऑक्सीजन की कमी को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की थी। वरिष्ठ वकील सचिन दत्ता ने दिल्ली की केजरीवाल सरकार की अक्षमता पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि दिल्ली सरकार के अधिकारी उस समय नदारद रहे, जब अस्पताल में मरीज ऑक्सीजन की कमी से मरते रहे। उन्होंने बताया कि शुक्रवार (23 अप्रैल) को पूरा दिन दिल्ली सरकार के अधिकारियों से संपर्क करने का प्रयत्न किया लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इस जानकारी के बाद दिल्ली हाई कोर्ट के जज ने कहा “कोई भी अधिकारी ऑक्सीजन की आपूर्ति में बाधा डालेगा तो हम फाँसी पर चढ़ा देंगे।” यह केजरीवाल के किस प्रशासनिक कौशल को दर्शाता है।

कोरोना के चलते जनसाधारण के सामने जो भी समस्याएं आ रही हैं, वे हर लिहाज से चिन्ताजनक हैं। ऐसे में सवाल भी उठता है कि आखिर चूक कहां हुई। भारतीय संविधान के मुताबिक, स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय है। फिर भी, कोरोना के बढ़ते मामलों को लेकर चैतरफा सवालों के घेरे में केंद्र की मोदी सरकार है। पूछा जा रहा है कि कोरोना की दूसरी लहर के लिए केंद्रीय स्तर पर तैयारी क्यों नहीं की गई। राज्यों से भी सवाल पूछे जाने चाहिए, लेकिन ऐसा शायद ही हो रहा है। जानकार लोगों का कहना है कि पिछली बार केन्द्र की मोदी सरकार ने लाॅकडाउन लगाया था। उस समय भाजपा शासित राज्यों को छोड़कर सभी ने विरोध करते हुए कहा था कि स्वास्थ्य राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है। मोदी सरकार इस पर अनाधिकृत अतिक्रमण कर रही है। ऐसे में इस बार मोदी सरकार ने कोरोना काल में लाॅकडाउन लगाने तथा इस आपदा से निपटने के बारे में राज्यों से ही कह दिया कि वे अपने स्तर पर ही जनहितार्थ कदम उठायें। अब चुकि हमने सारी ताकत विरोध को नये नये रूप में सजाने संवारने में लगा रखी है, तो इस आपदा में रूआंसा मुंह लेकर उपस्थित होने के अलावा कर भी क्या सकते हैं।

देश ने इसे राष्ट्रीय संकट की घड़ी मान लिया है। इसमें एक दूसरे की कमियां निकालने, काम में बाधा उत्पन्न करने से ज्यादा जरूरत युद्ध स्तर पर एक साथ मिलकर जनता को राहत पहुंचाने की है। यह काम अकेले न तो केंद्र सरकार कर सकती है और ना ही कोई राज्य सरकार। यह दौर राजनीति के माध्यम से जनता में पैनिक या अफवाह बढाने का नहीं है। संयम रखते हुए जनता के साथ खड़े होने का है। चाहे पक्ष हो या विपक्ष, आम हो या खास, अभी संकट मानवता पर है और इस संकट को टालने के लिए हर पक्ष को आगे आना होगा। तभी हम इस महामारी से जीत सकते है।

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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