यह समय राजनीतिक आचरण को गिराने का नहीं, उठाने का है।

यह समय राजनीतिक आचरण को गिराने का नहीं, उठाने का है।

Ramswaroop Rawatsare
रामस्वरूप रावतसरे 
लेखक

सोसल मीडिया पर किसी शोधार्थी सुमित कुमार ने लिख रखा है कि देश की जनता को गुमराह कर इस महामारी को बढाने में देश विदेश के नामी समाचार पत्र तथा कथित रूप से कुछ वेबसाइट है जिन्होने वैक्सीन विरोधी लेख छाप कर प्रचारित प्रसारित किये। इस बात का बतंगड़ भी बनाया कि वेक्सीन लगाने से क्या होगा। इनके द्वारा लिखे गये लेखों को आधार मान कर कांग्रेस ने 58 बार , समाजवादी पार्टी ने 17 बार , शिव सेना ने 27 बार डीएम के ने 13 बार, टीएम सी ने 12 बार तथा भाजपा की ओर से 7 बार विरोध स्वरूप सार्वजनिक रूप से बोला गया ।

सुमित कुमार ने अपनी वाल पर आगे लिखा है कि वेक्सीन को लेकर 265 एनजीओं के संस्थापकों कर्मचारियों ने भी यह कहा बताया कि वैक्सीन जीवन के लिए खतरा है। जब हिन्दी और अग्रेजी के समाचार पत्रों में 1519 बार लेख सम्पादकीय पृष्ट पर छपे तो देश का प्रबुद्ध वर्ग कैसे पीछे रहता। वैक्सीन को लेकर 172 रिटायर्ड आईएएस, आईपीएस, जज और अन्य सरकारी अधिकारियों ने भी विरोध में अपनी आवाज को जनता तक पहुचाने का सार्थक प्रयास किया बताया। जब प्रतिष्ठित समाचार पत्र, राजनीतिक दल और प्रबुद्धवर्ग वैक्सीन को लेकर तिल का ताड़ बना रहा हो तो कार्टूनिस्ट अपनी अभिव्यक्ति को प्रदर्शित करने से कैसे पीछे रहते। इस दौरान 342 कार्टून भी वैक्सीन के विरोध में इस खेमे के कार्टूनिस्ट्स ने बनाये जिन्होंने जनता के दर्शनार्थ समाचार पत्रों वेवसाईडों में उचित स्थान प्राप्त किया।

covid 19 vaccine india

इन राष्ट्रीय स्तर के प्रबुद्धों द्वारा ऐसा करके लोगों में एक भ्रम पैदा किया गया कि वैक्सीन नहीं चाहिए। आज जब वायरस से पूरे देश में हाहाकर मच रहा है तो ये ही लोग चुपचाप जाकर वैक्सीन लगवा रहे हैं। यही नहीं, यह भी कह रहे है कि सरकार ने समय रहते उचित कदम नहीं उठाये। जिसके कारण देश के लोगों की जान पर बन आई है। पहले वैक्सीन के विरोध में जनता को भड़का रहे थे । जिससे सरकार जो कुछ भी व्यवस्थात्मक दृष्टि से कर रही है वह सफल नहीं हो। हुआ भी ऐसा ही यदि समय रहते वैक्सीन का उपयोग हो जाता तो हालात आज की तरह बदतर नहीं होते। लेकिन इन्हें इससे क्या लेना देना इनका काम किसी भी प्रकार की व्यवस्था में सहयोग देना नहीं है। उसमें व्यवधान डालना है जो इन्होने कर दिया है। कोरोना की भयवहता सामने आने पर भी लोग वैक्सीन लगवाने से घबरा रहे है।

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जानकार लोगों का कहना है कि राज्य सरकारों ने भी वैक्सीन को लेकर समय पर कोई उचित कदम नहीं उठाये। यदि कुछ किया तो यही कि वैक्सीन लाने में देरी की, उसको उचित संरक्षण नहीं दिया। इस कारण से लाखों डोज बर्बाद हो गई। कैसा गडबड़झाला, केन्द्र कह रहा है वैक्सीन सभी को बिना पैसे के लगेगी। लेकिन राज्य सरकारे कह रही है कि हमारे पास पैसे नहीं है। इस कारण केन्द्र वैक्सीन मुफ्त में ही दे। जिससे उसे अधिक से अधिक बरबाद किया जा सके और कमी बताकर केन्द्र को कटघरे में खड़ा किया जाता रहे। फिर अपनी नाकामी पर पर्दा डालने के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटा दो और टीवी पर बार बार रोनी सुरत दिखा कर जनता को सड़को पर ले आओं । यह कैसा खेल है। जो जनता की मौत को आधार बना कर खेला जा रहा है। दिल्ली में कुछ स्थानों पर पुलिस ने छापे डाले आक्सीजन सिलेंडर की कमी एक ही दिन में पूरी हो गई । कारोना मरीजों की संख्या कम होने के साथ साथ हाॅिस्पटलों में बैड भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध बताए जाने लगे है। यह कैसी राजनीति है।

इस सम्बन्ध में मुंबई बीएमसी चीफ इकबाल सिंह चहल द्वारा ऑक्सीजन संकट के लिए राज्यों को जिम्मेदार ठहराए जाने के बाद एमिकस क्यूरी नियुक्त वरिष्ठ अधिवक्ता रुपिंदर खोसला ने भी पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अव्यवस्था के लिए राज्यों को ही जिम्मेदार बताया है। उन्होंने राज्यों के कुप्रबन्धन की ओर इशारा करते हुए कहा कि केन्द्र सरकार अपना काम कर रही है लेकिन राज्यों की व्यवस्थात्मक कमजोरी की बजह से कोरोना इतना विकराल हुआ है। दिल्ली में ऑक्सीजन कोटा को लेकर प्रबंधन तथा निगरानी पर भी सवाल करते हुए कहा कि इनकी नाकामी की वजह से ऑक्सीजन की ब्लैक मार्केटिंग की आशंका भी अधिक बढ जाती है।

पहली लहर खत्म होने के बाद सिस्टम का बेपरवाह हो जाने का परिणाम रहा कि दूसरी लहर ने जोरदार प्रहार किया है। आज राज्यों के पास वेंटिलेटर, और बेड और अन्य बुनियादी ढाँचे की कमी है जो कोविड के साथ लड़ने के लिए आवश्यक है। सबसे बड़ी बात यह है कि राज्यों के पास वेंटिलेटर के लिए प्रशिक्षित कर्मचारी नहीं हैं, जिनका होना अत्यधिक आवश्यक है। कुछ स्थानों पर स्टाफ है, लेकिन वेंटिलेटर नहीं हैं, और जहाँ वेंटिलेटर हैं वहाँ कोई प्रशिक्षित कर्मचारी नहीं है। जब स्थिति अत्यधिक बिगड़ने लगी तो इन जिम्मेदारों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया। यह बताने के लिए कि वे तो जनहित में बहुत कुछ करना चाहते है पर केन्द्र सरकार उन्हें संसाधन उपलब्ध नहीं करा रही है।

ऐसे ही बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कोरोना वायरस के विरुद्ध मिलकर लड़ने की हिमायत की और फिर केंद्र के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट पहुँच गईं। सिर्फ यह बताने के लिए कि वे लगातार काम कर रही हैं पर केन्द्र उनका सहयोग नहीं कर रहा है। केन्द्र की भी मर्यादा है उचित होगा वही तो करेगा अनुचित को कैसे कर देगा। इन सबके पीछे कोरोना वायरस से मिल कर लड़़ना नहीं है। सिर्फ दिखावा करना है। वे चुनाव जीत गई है। अब पांच वर्षो तक वे जैसा चाहेगी वैसा ही बंगाल में होगा। यही स्थिति दिल्ली सहित कई राज्यों की बनी हुई है। केजरीवाल किसान आन्दोलन के लिए और अपनी पब्लिसीटी के लिए करोड़ों को पानी की तरह बहा सकते है। लेकिन महामारी से जूझ रही दिल्ली की जनता के लिए उचित संसाधन जुटाने के लिए उनके पास कुछ भी नहीं है।

आज हमारे देश के अधिकतर प्रदेशों का हाल ऐसा ही है जहाँ नेताओं को विभिन्न प्रकार के ब्यान जारी करने की जल्दी रहती है। वास्तविकता में निजी और सरकारी अस्पतालों की स्थिति किस प्रकार की है यह देखने का और समझने का वक्त ही नहीं है। हमारी सरकारों की प्राथमिकताएं महज राजनीतिक करने, चुनाव लड़ने, जैसे तैसे कर जीत हासिल करने के अलावा यदि कोई कमी को उजागर करता है तो किसी प्रकार की कमी को पूरा करने के बजाय कमी बताने वाले को ही गलत साबित करने का प्रयास होता है। कोरोना महामारी से कौन लड़े ये आपस में ही लड़कर पांच वर्ष पूरा करने में रहते है। आज जब देश के सामने महामारी का विकराल स्वरूप खड़ा तो हमें अपनी क्षमता से अधिक जनहित के कार्यो को करके दिखाना चाहिए ना कि चुनावी प्रतिद्वंदिता की तरह आरोप प्रत्यारोप लगा कर समस्याओं को बढाना चाहिये।

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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