वे सेवा भाव के अलावा कुछ भी नही जानते थे

वे सेवा भाव के अलावा कुछ भी नही जानते थे

Epaper Vashishtha Vani

Ramswaroop Rawatsare
लेखक रामस्वरूप रावतसरे

क दिन एक पादरी नाव लेकर समुन्द्र में कहीं जा रहा था। दिन छिपने को हुआ जान कर उसने अपनी नाव को किनारे लगा दिया। और वह जंगल में कोई उपयुक्त स्थान देखने लगा ,जहां रात बिताई जा सके। उसे थोडी दूरी पर धुंआ उठता हुआ दिखाई दिया। वह पादरी उसी ओर चल पडा। कुछ दूर चलने पर उसने देखा कि तीन साधू कुछ बनाने में लगे है। उसने अपना परिचय दिया और रात्री विश्राम के लिये कहा ,उन साधुओं ने पादरी को रात्री विश्राम के साथ उनके पास जो भी कुछ खाने पीने को था ,उसे भी दिया।

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पादरी ने कुछ खाने पीने के बाद उनसे पूछा कि वे यहां इस जंगल में किस प्रकार रहते है और अपने भगवान की किस प्रकार पूजा करते है। उन तीनों साधुओं ने उसेे बताया कि वे नित्य प्रति उठ कर अपने शारीरिक कार्यों से निवृत हो कर ,एक लाईन में खडे हो जाते है और दोनों हाथ उपर आसमान की ओर करके बोलते है, हे! बृह्मा, विष्णु ,महेश तुम तीन हम तीन हमारी रक्षा करना और उसके बाद अपने दिन भर के कामों को निपटाने में लग जाते है। पादरी के मन में आया कि ये बहुत ही भोले साधु है इन्हें कुछ भी नहीं आता । क्यों ना इन्हें अपने धर्म की शिक्षा दी जाये ।

पादरी ने कहा मैं तुमको अपने भगवान की प्रार्थना बताता हूॅ । पादरी ने बडे ही सुरीले स्वर में प्रार्थना को गाकर सुनाया। वह प्रार्थना तीनों साधुओं को बहुत अच्छी लगी । उन्होंने पादरी से कहा कि वह अपनी प्रार्थना को उन्हें भी सिखाये । पादरी ने अपनी प्रार्थना को दो तीन बार गाकर उन तीनों को याद करा दिया । इसके साथ साथ उसके भगवान की पूजा करने के भी नियम बताये । तीनों साधु बहुत खुश थे कि उन्हें आज एक नई प्रार्थना सीखने को मिली। वहीं पादरी उनसे भी ज्यादा खुश था कि उसने तीन साधुओं को इसाई धर्म की शिक्षा दी। सुबह हुई ओर पादरी अपने गन्तव्य की ओर रवाना हो गया। उसके जाने के कुछ समय बाद एक साधु ने कहा कि हम उस सज्जन द्वारा बताई गई प्रार्थना को भूल तो नहीं जाएंगे, इसलिये अभी से अभ्यास करते है। तीनों साधु पादरी द्वारा बताई गई प्रार्थना को गाने लगे, किन्तु पूरी नहीं गा सके । तीनों को बडा दुखः हुआ कि उस सच्चे इन्सान ने हमें कितनी अच्छी प्रार्थना सिखाई थी ओर हम भूल गये । तीनों ने विचार किया कि वह समुन्द्र में अधिक दूर नहीं गया होगा ,क्यों ना उसके पास चला जाय ओर प्रार्थना को पुनः सीखा जाय।

एक मत होकर तीनों समुन्द्र के किनारे आये ओर एक लाईन में खडे होकर हाथ उपर कर बोले हे! बृह्मा, विष्णु महेश तुम तीन हम तीन हमारी रक्षा करना और नगें पांव सरपट समुन्द्र के पानी पर दौडने लगे। पादरी ने देखा तीनों साधु बिना किसी नाव के पानी पर दौडे चले आ रहे है। उसे बडा आश्चर्य़ हुआ। उसकी आंखे फटी की फटी रह गई, कि आदमी कैसे पानी पर दौड सकता है। उसने अपनी नाव को रोका। कुछ क्षण बाद तीनों साधु उसके पास आ गये। उसने उन्हें अपनी नाव पर बैठाया। साधुओं ने उसे हाथ जोड कर कहा कि महोदय हमें क्षमा करना कि हमने आपको रोका। हमसे बडी गलती हो गई है । पादरी ने कहा कि बताओं क्या गलती हो गई है । उन्होंने कहा कि आपने जो प्रार्थना हमें सिखाई थी उसे हम भूल गये है। कृपया उसे पुनः हमें सिखाओं। पादरी अभी तक पानी में बिना किसी सहारे के उनके दौडने की बात को याद कर बहुत ही विस्मित था। उसने उन तीनों से कहा कि मैं अपनी प्रार्थना बाद में सिखाउंगा पहले तुम यह बताओं कि इस गहरे समुन्द्र में बिना किसी सहारे के किस प्रकार दौडते हुए आये हो। तीनों साधुओं ने सहज भाव से कहा कि कुछ नहीं बस, हमने रोजमर्रा की तरह समुद्र के किनारे आकर ,लाईन में खडे होकर, हाथ उपर करके यह कहा ’’ हे! बृह्मा, विष्णु, महेश तुम तीन हम तीन हमारी रक्षा करना, बस फिर समुन्द्र में दौड पडे । बस और कुछ नहीं ! आपकी प्रार्थना बहुत सुन्दर है। हमें पुनः सिखा दीजिये । आपकी बडी मेहरबानी होगी । पादरी ने उन तीनों को बडे गौर से देखा । फिर घुटनों के बल बैठकर हाथ जोड कर बोला ’’ तुम्हें किसी भी प्रार्थना की जरूरत नहीं है। जो कुछ करते रहे हो, उसे ही करते रहो। तुम्हारा जो भगवान के प्रति समर्पण है, उसमें जो विश्वास है वही सब कुछ है। मेरे पास तुम्हें सिखाने के लिये कुछ भी नहीं है और ना ही मेरी प्रार्थना तुम्हारे सच्चे भावों के आगे कोई महत्व रखती है । हां मुझे तुमसे सिखने की जरूरत है।

सही है ,भगवान कब कहते है कि किसी प्रकार के आडम्बर के साथ उनकी पूजा करो। भगवान भाव को चाहते है। जहां भगवान के प्रति सच्चा समर्पण का भाव है वहीं भगवान है। यह सब कुछ, जिसको कि हम अपना मान कर भगवान को अर्पण करते है, वह सब उस श्रेष्ठा का ही है। उसी के सब जड चेतन है। उसी के शब्द और उसी के अर्थ है। उस निराकार का निरन्तर अस्तित्व है हमारा कुछ भी नहीं, फिर भी हम उस परमपिता परमात्मा जिनकी अनुकम्पा से हम है, को आडम्बरों में बांधना चाहते है। किस लिये और क्यों? उन्हें किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं है। उन्हें जो चाहिये वह है सच्चा, बिना किसी लागलपेट का उनके प्रति समर्पण। मन से आराधना होनी चाहिये, जहां कि भगवान का रहना बताया जाता है। हम मन से कम और तन से आराधना का उपक्रम करते है ताकि ऐसा करते हुए लोग उन्हें देखें । तीनों साधूओं का भगवान के प्रति सच्चे मन से लगाव था। वे उनके भरोसे पर ही थे। वे सेवा भाव के अलावा कुछ भी नही जानते थे। लेकिन हम भगवान के भरोसे पर कम अपने साधनों के भरोसे पर अधिक रहते है। दूसरे के प्रति सेवा भाव हो, इसका तो मतलब ही नहीं। हम साधनों से ही भगवान को रिझाने की कोशिश करते है। यही हमारी भूल है।

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