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जासूसी मामले की सच्चाई सामने आ पाएगी?

pegasus spyware

-राजेश माहेश्वरी


पेगासस मामले का शोर संसद से लेकर सड़क तक पर दिखाई दे रहा है। विपक्ष पेगासस मामले में मोदी सरकार को घेरने का कोई मौका छोड़ नहीं रहा है। सरकार की तरफ से केंद्रीय आईटी मंत्री इस मामले में संसद में अपना बयान पेश कर चुके हैं। लेकिन विपक्ष इस मामले पर लगातार हमलावर मुद्रा में है। संसद में पेगासस मामले को लेकर गतिरोध के हालात बने हुए हैं। भारी शोर शराबे और हंगामे के चलते संसद की कार्यवाही बार-बार बाधित हो रही है। इन हालातों में संसद का बहुमूल्य समय तो नष्ट हो ही रहा है, वहीं देश के आम आदमी से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों को भी विपक्ष द्वारा नजरअंदाज किया जा रहा है। कोरोना काल में संसद का मानसून सत्र का आयोजन ही अपने में बड़ी बात है। लेकिन जिस तरह इस सत्र को बर्बाद किया जा रहा है, वो बड़ा अफसोसजनक है। ये चिंता का विषय भी है कि चंद लोगों की जासूसी के मामले को ज्यादा तूल देकर करोड़ों देशवासियों के उम्मीदों, आशाओं और सपनों पर पानी फेरने का काम हमारे माननीय कर रहे हैं। वहीं बड़ा सवाल यह भी है कि क्या कभी इस जासूसी मामले की सच्चाई सामने भी आ पाएगी। या फिर संसद का सत्र खत्म होते ही विपक्ष इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में रख देगा। जासूसी करवाने को सही नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन सच्चाई यह भी है कि आजाद भारत की राजनीति में तमाम ऐसे प्रकरण हैं जब विभिन्न सरकारों ने फोन टेप करवाए। सच्चाई यह भी है कि उन मामलों का नतीजा क्या हुआ। चंद दिनों के शोर-शराबे के बाद मामला रद्दी की टोकरी के हवाले हो गया।

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विपक्ष का आरोप है कि इजरायली स्पायवेयर पेगासस के जरिये सरकार द्वारा राजनेताओं, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और न्यायाधीशों सहित उनसे जुड़े करीबी लोगों की जासूसी करवाए जाने का खुलासा नया नहीं है। दो साल पहले भी इसे लेकर हंगामा हुआ था किन्तु बात आई-गई होकर रह गई। संसद के मानसून सत्र से पहले अचानक विदेशी माध्यमों से ये खुलासा हुआ कि उक्त स्पायवेयर का उपयोग भारत में भी हुआ। चूंकि स्पायवेयर की निर्माता कंपनी अतीत में ये स्वीकार कर चुकी है कि वह केवल सरकार को ही ये सुविधा प्रदान करती है इसलिए जैसे ही उक्त खबर आई वैसे ही विपक्ष के साथ समाचार माध्यमों एवं न्यायापालिका में भी हडकम्प मचा।

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चूंकि ताजा खुलासा क्योंकि संसद के मानसून अधिवेशन के ठीक पहले हुआ इसलिए पहले दिन ही विपक्ष ने सदन नहीं चलने दिया। हालांकि केंद्रीय आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने संसद में किसी भी प्रकार की जासूसी से साफ इंकार कर दिया लेकिन बाद में उनका नाम भी उस सूची में आ गया जिनकी जासूसी किये जाने की बात उछली है। केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ ही पूर्व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भी सरकार प्रायोजित जासूसी की खबरों को आधारहीन बताते हुए, संसद सत्र के ठीक पहले उसे उजागर किये जाने पर सवालिया निशान लगा दिए।

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सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में व्यक्तिगत जानकारी के अलावा आर्थिक लेनदेन, व्यापारिक वार्तालाप , राजनीतिक चर्चाएं आदि गोपनीय नहीं रह गई हैं। सोशल मीडिया पर लिखी या दिखाई गई किसी भी सामग्री का विश्लेषण करते हुए व्यक्ति के बारे में तैयार किया गया ब्यौरा (डेटा) आज की दुनिया में सबसे ज्यादा बिकने वाली चीज है। इंटरनेट पर किसी उपभोक्ता वस्तु के बारे में जानकारी हासिल करते ही उससे जुड़े विज्ञापन आपके सोशल मीडिया माध्यम पर आने शुरू हो जाते हैं जिससे ये बात साबित हो जाती है कि इंटेरनेट पर आपका हर व्यवहार सघन निगरानी में है और उसका व्यापारिक उपयोग भी धडल्ले से हो रहा है। लेकिन संदर्भित विवाद में जिस तरह की निगरानी की गई उसका उद्देश्य चूंकि व्यापारिक न होकर सरकारी जासूसी बताया गया है इसलिए विपक्ष को सरकार की घेराबंदी करने का अच्छा अवसर हाथ लग गया।

केंद्र सरकार और भाजपा तमाम आरोपों को झुठला रही है लेकिन जानकारी का स्रोत विदेशों में है इसलिए उसकी सफाई से विपक्ष का संतुष्ट नहीं होना स्वाभाविक है। हालाँकि वह भी जानता है कि ऐसे मामलों में सच्चाई कभी सामने नहीं आती किन्तु सरकार पर हमला करने का मौका वह भी नहीं छोड़ना चाहेगा। संसद में मुख्य विपक्ष विपक्षी दल कांग्रेस भी दशकों तक केन्द्रीय सत्ता में रही है इसलिये उसे पता है कि सरकार का खुफिया विभाग (इंटेलीजेंस ब्यूरो) न सिर्फ राजनीतिक व्यक्तियों वरन उनके स्टाफ और संपर्कों के बारे में जानकारी एकत्र करता रहता है।

जजों की नियुक्ति के पूर्व उनकी भी निगरानी खुफिया तौर पर करवाई जाती है। लेकिन मौजूदा विवाद में चूंकि विदेशी स्पायवेयर से जासूसी करवाने का आरोप है इसलिए वह सतही तौर पर तो गम्भीर लगता है। लेकिन उसका खुलासा भी विदेशी माध्यमों से हुआ है इसलिए पटाक्षेप भी विकीलीक्स प्रकरण जैसा ही होगा। इस सबके बावजूद भारत सरकार को इस बारे में स्पष्ट करना चाहिए कि उसके द्वारा पेगासस के जरिये जासूसी करवाई गई या नहीं? हालांकि ऐसे मामलों में हर सरकार गोपनीयता बनाए रखती है। सारे खुफिया विभाग गृह मंत्रालय के अधीन होने के बाद भी पुरानी सरकार के समय एकत्र की गई जानकारी इसीलिये सार्वजनिक नहीं होती।

ज्ञातव्य है कि वर्ष 2019 में भी व्हाट्सएप ने अपने उपयोगकर्ताओं को स्पाइवेयर से जुड़ी चिंताओं के बाबत अवगत कराया था। इतना ही नहीं, अपने प्लेटफॉर्म के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए इस्राइली फर्म के खिलाफ मामला भी दर्ज कराया था। ऐसा भी नहीं है कि सरकारों द्वारा अपने विरोधी राजनीतिक दलों के नेताओं की जासूसी करने के आरोप पहली बार सामने आये हों। जासूसी यूं भी शासन तंत्र का अभिन्न हिस्सा होता है। मनमोहन सिंह की सरकार के समय वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी की टेबिल पर जासूसी उपकरण लगाये जाने का मामला उठा था। स्व. मुखर्जी की शिकायत पर श्री सिंह ने खुफिया विभाग से जांच करवाकर ये सफाई भी दी थी कि वैसा कुछ भी नहीं हुआ। उस कारण गृहमंत्री पी. चिदम्बरम और स्व. मुखर्जी के बीच तनातनी भी हुई थी। रही बात आरोप-प्रत्यारोप की तो राजस्थान में पायलट समर्थक विधायक भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर उनके फोन टेप करवाने का आरोप लगा चुके हैं।

इस बीच ट्विटर पर छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद कांग्रेस की सरकार बनते ही सामने आया अवैध फोन टेपिंग का मामला वायरल होने लगा है। एक यूजर आलोक भट्ट ने वर्ष, 2019 में विवादों में आए छत्तीसगढ़ के फोन टेपिंग मामले पर ट्विट करते हुए सोनिया और राहुल गांधी पर तंज कसा है। छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद कांग्रेस सरकार ने नागरिक आपूर्ति निगम में हुए करोड़ों के घोटाले में जांच के आदेश दिए थे। इसकी जांच ईओडब्ल्यू कर रहा था। तब आरोप लगे थे कि आईपीएस मुकेश गुप्ता यानी तत्कालीन डीजी ईओडब्ल्यू आरोपियों के फोन टेप करा रहे हैं। इस मामले में उनके खिलाफ जांच शुरू हो गई थी। तब गुप्ता ने तर्क दिया था कि फोन टेपिंग सीएस और एसीएस के आदेश पर हुई, इसलिए उसे गलत नहीं ठहराया जा सकता है। गुप्ता पर आरोप था कि उन्होंने महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए गैर कानूनी तरीके से आम लोगों के फोन टेप करवाए। अपने निजी स्वार्थ के लिए मोबाइल पर होने वाली बातें सुनी। चूंकि अभी संसद चल रही है इसलिए विपक्ष भी सरकार पर हावी होने का अवसर नहीं गंवाना चाहेगा परन्तु जैसा होता आया है इस मामले पर भी कुछ दिन के हल्ले के बाद परदा पड़ जाए तो आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि जासूसी करने और करवाने वाले अक्सर सबूत नहीं छोड़ते। तमाम दूसरे मामलों की तरह इस मामले की सच्चाई सामने नहीं पाएगी। हां इस बीच संसद का मूल्यवान समय जरूर नष्ट हो जाएगा।


-लेखक राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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