टीकाकरण और सर्तकता से ही सुधरेंगे हालात

टीकाकरण और सर्तकता से ही सुधरेंगे हालात

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राजेश माहेश्वरी

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर देश में कोरोना वैक्सीनेशन का नया रिकार्ड बना। एक दिन में देश में 86 लाख से ज्यादा लोगों का टीका लगाया गया। असल में टीकाकरण और सतर्कता ही ऐसे दो उपाय हैं, जो हमें काफी हद तक घातक कोरोना वायरस से बचा सकते हैं। चिकित्सा जगत से जो खबरें आ रही हैं, या फिर जिस ओर स्वास्थय विशेषज्ञ इशारा कर रहे हैं वो चिंता बढ़ाने वाला है। विशेषज्ञों के अनुसार देश में कोरोना वायरस की तीसरी लहर आने की संभावना प्रबल है। ऐसे में टीकाकरण एक प्रभावी हथियार के तौर पर कोरोना से लड़ाई लड़ने में हमारी मदद कर सकता है। वहीं कोविड प्रोटोकाल का पालन और सर्तक व्यवहार हमें इस घातक वायरस से बचा सकता है। कोरोना की दूसरी लहर का जानलेवा कहर देश और देशवासियों ने भोगा है। अब सरकार का पूरा जोर ज्यादा से ज्यादा आबादी का टीके का कवच पहनाना है।

एम्स दिल्ली के निदेशक डा. रणदीप गुलेरिया ने भी आगाह कर दिया कि यदि कोरोना संबंधी अनुशासन का पालन नहीं किया गया तो तीसरी लहर महीने भर में ही आ धमकेगी और और पहले से ज्यादा घातक होगी। इससे बचाव के लिए ज्यादा से ज्यादा टीकाकरण तो ज्ररूरी है ही किन्तु उनकी सीमित उपलब्धता के अलावा इतनी बड़ी आबादी का टीकाकरण हंसी खेल नहीं है। जैसी कि जानकारी है अब तक कुल 28 करोड़ लोगों को एक और 5 करोड़ से ज्यादा आबादी को दोनों टीके लगाये जा सके हैं। इस प्रकार मात्र लगभग तीन फीसदी जनता को ही टीके की दोनों डोज मिल पाई है। इसलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन और डा. गुलेरिया ने जो चेतावनी दी है उसे गम्भीरता से लेने की सख्त जरूरत है। अध्ययन से पता चलता है कि आम लोगों को टीकाकरण के बावजूद सतर्कता की जरूरत है। तीसरी लहर आने की चेतावनी विशेषज्ञ दे रहे हैं, जिसके लिए हमें अभी से ही तैयार रहने की जरूरत है।

कोरोना की दूसरी लहर के संक्रमण के घटते मामलों के मद्देनजर कई राज्यों में अनलॉक की प्रक्रिया शुरू हुई है। अभी पहली लहर के अनलॉक के बाद स्कूल-कॉलेज खुल भी नहीं पाए थे कि अपनी घोर लापरवाहियों के कारण हम दूसरी लहर में फंसते चले गए। अब पहली लहर के बाद अनलॉक होने पर बरती गई लापरवाही से सबक सीखकर घर-दफ्तर और केवल जरूरी कामों तक ही सीमित रहने की जरूरत है। कोरोना के साथ इस लड़ाई में टीके के साथ मास्क और सामाजिक-देह दूरी वह अमोघ अस्त्र हैं जो कोरोना वायरस से हमें मुक्ति दिला सकते हैं। लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष यह है कि अनलॉक की प्रक्रिया के साथ ही उसी तरह की बेफिक्री और लापरवाही सामने आने लगी है जैसे इस साल के आरंभ में पहली लहर के उतार के वक्त देखी गई थी। कोरोना संक्रमण से बचाव की गाइडलाइन्स फिर किनारे की जाने लगी हैं। बाजारों के खुलते ही सोशल डिस्टेंसिंग की जरूरत को नजरअंदाज किया जा रहा है। बाजारों में फेस मास्क नाक से उतरकर ठोड़ी तक आ चुके हैं। सैर-सपाटे पर निकलने को आतुर लोगों की कारों के काफिले हिल स्टेशनों की तरफ कूच करने लगे हैं।

अनलॉक की स्थिति में कोरोना से बचाव के लिये उचित वातावरण बनाने की हमारी जिम्मेदारी बढ़ जाती है। बहुत आवश्यक होने पर ही घर से बाहर निकलना चाहिए। कम व अधिक आयु के लोगों को और गर्भवती स्त्रियों को तो केवल आवश्यकता को देखते हुए बाहर निकलना चाहिए। अनलॉक की प्रक्रिया लोगों की रोटी-रोजी की व्यवस्था को बनाए रखने के लिये एक शासकीय उपक्रम है, जिसे हम सबको समझना होगा। रोग की उग्रता से बचने के लिए हमें स्वयं ही सावधान रहना होगा। कोरोना की दूसरी लहर की भयावहता के बाद जो धैर्य लोगों में भय से नजर आ रहा था, उसे दरकिनार करने की होड़ जैसी लगी है। हम न भूलें कि कोरोना संकट अभी खत्म नहीं हुआ है।

कोरोना की दूसरी लहर के कमजोर पड़ने के बाद अब जनजीवन सामान्य होने लगा है। अब आम जनता के साथ-साथ सरकार को कठोरता का परिचय देना होगा। अनलॉक होने की स्थिति का सबसे ज्यादा दुरुपयोग बाजारों और सार्वजनिक स्थानों में दिखाई देता है। रैली, प्रदर्शन, उद्घाटन, धार्मिक और पारिवारिक उत्सव जैसे आस्था के नाम पर जुटने वाले लोगों की भीड़ पर सख्ती दिखानी होगी। प्रशासन को भी भीड़ जुटने वाले राजनीतिक और धार्मिक आयोजनों के मामले में सख्ती दिखानी पड़ेगी।

हमने कोरोना महामारी की पहली लहर की लापरवाही का खमियाजा दूसरी सुनामी के रूप में भुगता। अब ऐसा न हो कि कहीं दूसरी सुनामी के बाद अपनी लापरवाही व अनदेखी से तीसरी सुनामी को न्योता दे दें।

वैसे कोरोना के दो हमले झेलने के बाद हर किसी में दायित्वबोध स्वाभाविक रूप से आ जाना चाहिए। इसके बाद भी जो लोग गैर जिम्मेदाराना रवैया रखते हैं तो ये कहना गलत न होगा कि उन्हें न अपनी चिंता है और न अपनों की। हम न भूलें कि दूसरी मारक लहर के दौरान एक अप्रैल के बाद से दो लाख से अधिक लोगों को महामारी ने लीला। निस्संदेह संक्रमण के मामलों में गिरावट आई है लेकिन इतने कम मामले भी नहीं हैं कि हम लापरवाही के रास्ते चल पड़ें। किसी भी तरह की लापरवाही तीसरी लहर को आमंत्रित करेगी, जिसके आने को चिकित्सा विज्ञानी अपरिहार्य मान रहे हैं।

अनलॉक में बरती सतर्कता ही हमें तीसरी लहर से बचाएगी। वहीं रोजी-रोटी के साथ-साथ टीकाकरण और कोरोना प्रोटोकॉल का पूरा ध्यान रखना होगा। छूट मिलने पर भी हम विवाह और मृत्यु आडम्बर रहित रहें। जब तक संभव हो घर से काम करें, डिजिटल भुगतान करें, भीड़-भाड़ से बचें, बेवजह न घूमें, इत्यादि-इत्यादि। कोरोना संक्रमण के मामले बढ़े तो हमने हर बार सरकार व प्रशासन को ही जिम्मेदार ठहराया, जो सही नहीं कहा जा सकता। देश के जिम्मेदार नागरिक होते हुए हमारा कर्तव्य बनता है कि हम कोविड प्रोटोकॉल का ईमानदारी से पालन करें। स्वास्थ्य समेत समस्त जिम्मेदारियां सरकार व प्रशासन की ही नहीं हैं।

सरकार के साथ-साथ हम यदि अपने कर्तव्यों का निर्वहन भली प्रकार से करेंगे तो कोई दो राय नहीं कि कोरोना महामारी पर नियंत्रण न पा सकें। कोरोना पर विजय पाने के लिए सरकार के कदमों के साथ कदमताल करना होगा। सरकार को उसकी जिम्मेदारियों का अहसास कराने के साथ-साथ हमें अपने कर्तव्यों का पालन भी ईमानदारी से करना होगा। हमारी गैर-जिम्मेदाराना हरकत ही कोरोना की तीसरी लहर को भयावह बनाएगी। ऐसे में हम अवश्य जान लें कि खतरा अभी टला नहीं है। इसलिए इसे चुनौती के रूप में लें व देश के सच्चे, सजग नागरिक बनकर अपनी जिम्मेदारियों को समझें। सभी नागरिक लापरवाही छोड़ अपने कर्तव्य का पालन करते हुए वैक्सीन अवश्य लें। हम सब की लापरवाही की वजह से अप्रैल माह में देश में स्थिति बहुत ही भयंकर हो गयी थी लेकिन लॉकडाउन और कफ्र्यू के बाद महामारी काबू में आयी है। इसलिए सभी लोग एकजुट होकर इस वैश्विक महामारी से अपना-अपना बेहतर देकर छुटकारा पायें।

-लेखक राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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