उठना जनता को ही होगा

उठना जनता को ही होगा

Ramswaroop Rawatsare
रामस्वरूप रावतसरे
लेखक

नसुख हमेशा की तरह अपनी मूंज की खाट पर बैठा अखबारको पलट रहा था । अखबार में समाचार रोजमर्रा की तरह थे। कि फलां संगठन ने विधान सभा के सामने धरना दिया। या फलां संगठन के आन्दोलनकारियों के उग्र प्रर्दशन के कारण पुलिस को लाठी चार्ज करना पडा। या विपक्ष के नेता ने सत्ता पक्ष के नेता पर भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप लगाये या यहां तक कि एक दूसरे ने ऐसे शब्दों का भी प्रयोग किया जो उन्हें किसी भी प्रकार से शोभा नही देता था।

तनसुख की समझ में यह नहीं आ रहा था कि ऊंचाई पर होने के बाद आदमी नीचे गिरने की क्यों सोचता है। खैर तनसुख का दिमाग इतने बादाम क्या मूंगफली भी नहीं खाये हुए था कि इस हाई प्रोफाईल ड्रामें के बारे में विचार कर सकता। तभी चितवन ने घर में कदम रखा। तनसुख को खामोश देखकर चितवन ने कहा ’’क्या बात है तनसुख घर में तो खैरियत है!’’ तनसुख बोला ’’चचा घर, घर ही नही रह पा रहा है, घर के जो मुखिया कहलाने की हुकार भर रहे है। उनके सार्वजनिक ब्यान देखिये, कि कहते हुऐ ही शर्म महसुस हो रही है। क्या इनके पास ऐसा कुछ बताने के लिये ही नही है कि उन्होने जन कल्याण के लिये ऐसा काम किया था और ये अब इतना ही कर पाये है। या हमारे पास इतनी जन कल्याणकारी योजनाए है जिनके पूरा होने पर जनता को इतना लाभ मिलेगा।

चितवन खिं खिं करके हंसा फिर कुछ देर बाद बोला ’’तनसुख लगता है तुम इस धरती के वासिन्दे नही हो ! ये नेता जनता की ही भाषा बोल रहे है, ये अपनी तरफ से कुछ भी नहीं कह रहे। जो जनता को पसन्द है वही कर रहे हैं। जनता क्यों नही इनसे यह पूछती कि तुमने अब तक क्या किया है! और तुम्हारी भावी योजना क्या है? यह जनता को पूछना चाहिये । वो क्यों इनके इस प्रकार के बेतुके भाषणों पर खिलखिलाकर हंसती है और क्यों इनका उत्साह बढाने के लिये तालियां बजाकर नारे लगाती है। तनसुख जिस दिन जनता इनसे ऐसे सवाल करने लगेगी उस दिन से ये नेता भी ऐसे ब्यानों के साथ उपस्थित नहीं होगें और ना हीं पार्टियां ऐसे अधकचरे नेताओं को आगे करेगी। जबतक जनता प्रबुद्ध नही होगी और सकारात्मक सोच के साथ प्रशन लेकर खडी नहीं होगी तब तक नेताओं से प्रबुद्धता की अपेक्षा करना गलत है।

जनता को चाहिये कि इन नेताओं से इनके काम काज के बारे में बोलने के लिये कहे। पर जब ये आते है तो जनता इनकी ही सुनती है। इनसे कुछ पूछती नही। यदि कोई प्रशन पूछता है तो वह मिडिया है जो इनका नमक खा कर चलता है। इस कारण से तनसुख पहले तुम खुद इतने सक्षम तो बनों, जिससे ये नेता जनता के मध्य में जाने के लिये घर से चलने से पहले पूरी तैयारी के साथ आये। अब ये तैयारी के साथ इतने ही आते है कि कैसे जनता से ताली बजवाई जावे और ये कुछ ना कुछ ऐसी बात कहते है जिस तक जनता की पहुच नही हो सकती। उसे जनता के मध्य में छोड कर चल देते है। जब तक जनता उसके बारे में विचार करती है तब तक बहुत सा समय निकल जाता है। इनके पांच वर्ष पूरे हो जाते है।

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चितवन उठा और तनसुख से बोला ’’नेता जनता में से ही आते है। समझे। बाहर चला गया। तनसुख ने उसे जाते हुए देखा। तनसुख विचार करने लगा कि उठना तो जनता को ही होगा। पर ये उठने देगें तब ना, क्यों कि इनकी सुविधा भोगी योजनाओं के चलते हर आदमी हाथ फैलाऐ खडा है। उसको बिना काम किये ही सारी सुख सुविधा चाहिये। वह कैसे उठेगा। किस बात के प्रशन खडे करेगा । प्रशन तो वह तब खडे करेगा जब उसमें स्वयं की कर्मठता और लक्ष्य को प्राप्त करने का आत्म विश्वास होगा । जीवन के प्रति , समाज के प्रति देश के प्रति श्रेष्ठता का जज्बा होगा ।

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