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खोखली ब्यानबाजी से जनता अब ऊब चुकी है।

HEALTH CORONAVIRUS INDIA CASES
Ramswaroop Rawatsare
लेखक 
रामस्वरूप रावतसरे

ज कल राजनेताओं के इस प्रकार के ब्यान आ रहे है जिनसे देष या देश की जनता को किसी भी रूप में सरोकार नही है । ऐसे ब्यान उनकी राजनेतिक परिपक्वता पर भी प्रशनचिन्ह खडा करते है। उन ब्यानों में अपनी ओर से मसाला मिला कर कुछ नेता तो उसे हाथों हाथ लेते है और कई दिनों तक अलग अलग शब्दों को उस तथाकथित ब्यान से जोड कर दण्ड पेल व्याख्या करते है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया भी उसका शाब्दिक चीर हरण हर कोण से करने की हर सम्भव कोशिश करता है, ताकि किसी प्रकार का संशय नही रहे। ऐसे गली के नुक्कड़ पर ही ही करने वाले शब्दों पर बडे़ बडे़ लोगों की बहस देख कर लगता है कि क्या हम 21वीं सदी में है या उससे भी आगे निकल गये है ।

खैर, शिखर पर बैठा व्यक्ति कितनी भी गलत बात करे उसके समर्थन में कई लोग आ ही जाते है । लेकिन इस बात पर ताज्जुब हो रहा है कि जब भी चुनावों का समय आता है इस प्रकार की ब्यानबाजी क्यों चैराहों पर आ खडी होती है। जिसका आम जनता के जीवन से कोई सरोकार नहीं होता है। क्या ऐसे शब्दों के पक्ष और विपक्ष में रहने से देश का विकास रूक गया या अधिक गति पकड गया ? या जनता को रोजमर्रा की समस्याओ से दो चार नहीं होना पडेगा या अधिक होना पडेगा। इस प्रकार की बहस देख कर लगता है कि इन लोगों को देश या देश के नागरिकों से कोई लेना देना नहीं है। उन्हें किसी बात की चिन्ता है तो सिर्फ यह कि जिस स्थान पर वे बैठे है वह कोई ओर ना हथियाले । उन्होंने जो आवरण अपनी सुरक्षा और सुविधा के लिये बना रखा है। उस तक और कोई ना पहुच जाय।

किसी नेता का गलत ब्यान देकर या शब्दों का इस्तेमाल करने के पीछे कोई कारण रहा हो या उक्त नेता द्वारा प्रयोग किये गये शब्दों का विरोध करने वालों का भी कुछ मतलब हो सकता है। किन्तु अपने आपको सशक्त मानने वाला इलेक्ट्रोनिक मीडिया क्यों इस प्रकार की बहसों को आयोजित करता है जिसमें आम जनता नही होकर मात्र वो लोग होते है जिनका उद्देष्य किसी ना किसी रूप में मूल समस्याओं से जनता का ध्यान हटाना होता है। और वे बडी चतुराई से ऐसा करते भी है ।

आज देश में किस प्रकार की स्थिति है। आम जनता किन कारणों से परेशान है । हमारा राजनैतिक नेतृत्व क्यों चैराहे पर खडा है । उसको एक दूसरे पर छीटाकसी करने के अलावा और कोई बात क्यों नही सूझ रही है। विपक्ष चाहता है पक्ष सत्ता छोडे। लेकिन किन उपायों से जनता की परेशानी को दूर किया जा सकता है। इस पर वह भी मौन साध लेता है ।

हमारे यहां निकृष्ठता की भरमार है, लेकिन बहुत से ऐसे लोग है जो जनहित के कमों में लगे है । जिन्हें आगे लाने से दूसरों को भी प्रेरणा मिल सकती है इस पर शायद ही कोई बहस करने व कराने को तैयार हो । यदि किसी ने ऐसा कर दिया तो सबसे पहले वह सत्ता पक्ष का विरोधी होगा और उसके बाद विपक्ष का। अन्ना हजारे के लोकपाल आन्दोलन में भ्रष्टाचार का मुद्दा काफी गहरा गया थां । उस समय वरिष्ठ लोगों के ऐसे ब्यान आने शुरू हो गये थे कि ’’ऐसे आन्दोलन करने से विदेशों में देश की छवी गिर रही है।’’ शायद ऐसा होता होगा। लेकिन जिन कारणों से या कामों से देश की छवी सुधर सकती है, उन्हें हम किसी भी सूरत में अपनाना नही चाहते। हमारा उद्देश्य यही रहता है कि जब तक बस चले सामने वाले (जनता) को भ्रमित रखों चाहे हम उसी के बल पर शिखर पर आये हो ।

आज पक्ष और विपक्ष इस बात पर ही मंथन करने मे लगे है कि किस प्र्रकार आगामी चुनावों में जीत हासिल की जावे। उसके लिये समस्याओं के काल्पनिक तूफान लाकर ऐसा माहोल तैयार कर दिया गया है कि इनके सम्पर्क में रहने वाला व्यक्ति इनके लिये मरने मारने के लिये खडा हो जाय। लेकिन अब जनता सब कुछ समझने लगी है। उसने अपनी सोच को सियासी पैतरेबाजी जैसे शब्दों से आगे निकाल लिया है। वह धरातल पर विकास चाहती है। वह बेरोजगारी ,मंहगाई ,भ्रष्टाचार , आतंकवाद तथा राजनैतिक निकम्मेपन से निजात पाना चाहती है। उसे वह कर्मठता और श्रेष्ठता चाहिये जो उसकी समस्याओं का समाधान करने के साथ साथ उसका सिर भी ऊंचा कर सके। ऐसा नहीं होने पर उसे भी करवट लेना आता है, जिस प्रकार प्रकृति करवट लेती है। कारोना काल में जनता ने हजारों हजार कष्ट उठा कर भी जिस संयम का परिचय दिया है। इस संयम का प्रति उत्तर सरकारों की ओर से सार्थक एवं श्रेष्ठ समाधान के रूप में होना चाहिये। ना कि राजनीतिक गुणा भाग के अनुसार। जो लाखों हाथ अब तक किसी ना किसी रूप में विकास का हिस्सा थे ,वे अब भी विकास में सहभागी बन सकते है। इन से सम्बन्धित जिम्मेदारों को चाहिये कि इनके नियोजन की कार्यवाही जल्द से जल्द करें। अन्यथा बिना काम के हाथ और दिमाग खुराफात की ओर जल्दी बढते है। यह समय कोरोना वायरस से लड़ने के साथ साथ लाखों लोगों को काम पर लगाने का भी है। समय को समझ कर ही समाधान की ओर बढना श्रेयकर रहता है । शायद जनता से अपेक्षा रखने वाले समय की आवश्यकता और उसकी भाव भगिंमा को भी समझेगें।

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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