दूसरे की नहीं, अपनी थाली देखने से सपने पूरे होंगे

दूसरे की नहीं, अपनी थाली देखने से सपने पूरे होंगे

लेखक रामस्वरूप रावतसरे: सैलेन्द्र के घर पर प्रातःकाल चार बजे एक अखवार वाला अखबार देने आता था। जिस समय वह आता था, सैलेन्द्र अपने मकान की गेलरी में टहलता होता था। वह उनके आवास में अखबार फेंकता और ’’नमस्ते बाबू जी’’ कहता हुआ फर्राटे से आगे निकल जाता। कुछ समय बाद सैलेन्द्र के सोकर उठने का समय प्रातः पांच बजे का हो गया। जब कई दिनों तक सैलेन्द्र अखबार वाले को गैलरी में टहलते नहीं दिखाई दिये तो एक दिन रविवार को वह उनके घर पर कुषल-क्षेम पूछने के लिए चला आया। जब उसे ज्ञात हुआ कि वे कुषल मंगल है। बस यूं ही देर से उठने लगे थे। अखबार वाला हाथ जोड़कर बोला बाबू जी एक बात कहॅू। सैलेन्द्र ने कहा- कहो।

वह बोला – आप सुबह तड़के सोकर उठने की अपनी अच्छी आदत को क्यों बदल रहे है। आपके लिए ही मैं सुबह तड़के विधान सभा मार्ग से अखबार उठाकर और फिर बहुत तेजी से साइकिल चला कर अपना पहला अखबार देने आता हॅू। इस आषा के साथ कि आप प्रतीक्षा कर रहे होगें। आपने अपना सिडयूल ही बदल लिया। वह फिर बोला – बाबू जी इतनी अच्छी आदत को क्यों बदल रहे है।

सैलेन्द्र ने हाॅकर से पूछा – तुम कितने बजे उठते हो? वह बोला ढाई बजे लगभग साढ़े तीन बजे अखबार लेता हॅू। और सीघा आपके पास आता हॅू कि आप मेरा इंतजार कर रहे होगें। सात बजे तक अखबार बांटकर घर जाता हूूॅ और तीन धण्टे सोता हूूॅ। उसके बाद कार्यालय जाता हॅू। आप जानते हैं बच्चों को बड़ा करने के लिए ये सब तो करना ही होता है।

सैलेन्द्र ने हाॅकर से कहा कि तुम्हारा बहुमुल्य सुझाव ध्यान में रखूंगा। हाॅकर मुस्कराता हुआ नमस्कार कर चला गया।

लगभग पन्द्रह साल बाद एक दिन वह हाॅकर सैलेन्द्र के घर आया और एक निमन्त्रण-पत्र देते हुए बोला -बाबू जी! बिटिया का विवाह है। आप को सपरिवार आना है।

सैलेन्द्र ने निमन्त्रण-पत्र को सरसरी निगाह से देखा उस पर लिखा था किसी डाॅक्टर लड़की का किसी डाॅक्टर लड़के से परिणय। यह देख कर उसके मुह से निकल गया क्या यह तुम्हारी लड़की है।

वह विस्मय के साथ बोला – कैसी बात कर रहे है बाबू जी ये मेरी ही बेटी है।
सैलेन्द्र बोला मेरा तात्पर्य कि अपनी लड़की को तुम डाॅक्टर बना सके इसी प्रसन्नता में कहा था।

वह बोला – बाबू जी लड़की ने केजीएमसी से एमबीबीएस किया है और उसका होने वाला पति भी वहीं से एम डी है। बाबू जी मेरा लड़का इंजीनियरिंग के अन्तिम वर्ष का छात्र है।

सैलेन्द्र किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा कुछ कहने की सोच रहा था कि वह बोला – अच्छा बाबू जी अब चलता हॅू।

इस घटना के दो वर्ष के बाद वह हाॅकर सैलेन्द्र के घर आया तो जानकारी मिली कि उसका लड़का जर्मनी में कार्यरत है। सैलेन्द्र ने उत्सुकतावष उससे पूछ ही लिया कि आखिर उसने अपनी सीमित आय में रहकर अपने बच्चों को इतनी उच्च षिक्षा कैसे दिला सके!

हाॅकर बोला – बाबू जी यह लम्बी कहानी है। अखबार बांटने तथा नौकरी करने के अतिरिक्त भी खाली समय में कुछ ना कुछ कमा लेता हॅू। साथ ही अपने दैनिक खर्च पर इतना कड़ा अंकुष कि भोजन में सब्जी के नाम पर बाजार में सबसे सस्ती सब्जी खरीद कर ले जाता था। एक दिन मेरा लड़का परोसी गयी थाली की सामग्री को देखकर रोने लगा और अपनी माॅं से बोला ’’ये क्या रोज़ रोज कद्दू, बैंगन, लौकी, तोरई जैसी नीरस सब्जी रूखा सूखा खाना खाते खाते ऊब गया हूं। अपने मित्रों के घर जाता हॅू तो वहां मटर-चनीर, कोफ्ते, दम आलू बनते है। यहां कि बस क्या कहूँ। मैं सब सुन रहा था तो रहा नहीं गया और बड़े उदास मन से उसके पास जाकर बड़े प्यार से उसकी ओर देखा और फिर बोला’’ पहले आँसू पोछ फिर मैं आगे कुछ कहॅू, मेरे कहने पर उसने अपने आँसू पोंछ लिये।

फिर मैं बोला बेटा! सिर्फ अपनी थाली देख। दूसरे की थाली देखेगा तो अपनी थाली भी चली जायेगी। सिर्फ अपनी ही थाली देखेगा जो क्या पता कि तेरी थाली किस स्तर तक अच्छी होती चली जायेगी। इस रूखी – सूखी थाली में मैं तेरा भविष्य देख रहा हॅू। इसका अनादर मत कर। इसमें जो कुछ भी परोसा गया है उसे मुस्करा कर खा ले। उसने फिर मुस्कराते हुए मेरी ओर देखा और जो कुछ भी परोसा गया था खा लिया। उसके बाद से मेरे किसी बच्चे ने मुझसे खाने के मामले में किसी भी प्रकार की कोई माॅंग नहीं रखी। वह बोला बाबू जी! आज का दिन बच्चों के उसी त्याग का परिणाम है।

आम तोर पर हमारे यहां क्या होता है। हम ओर हमारे बच्चे अपनी हैसियत को देखकर नहीं आस पड़ोस को देखकर चलते है। यदि पड़ोस में या अपने मिलने वालों के पास कुछ खास है तो आवश्यकता नहीं होने पर भी वह हमारे घर आयेगा। हम इसी देखा देखी में अपनी औकात को भूल जाते है। क्षमता से अधिक खर्च करते है और परिवार आर्थिक रूप से डगमगाने लगता है। यदि हम दूसरे की देखा देखी नहीं करें तो हम और हमारे बच्चे भी बहुत कुछ करने में सक्षम हो सकते है।

लेकिन हम बच्चों को अनुशासित और कर्मठ बनाने के अलावा सब कुछ करते है। जिसका परिणाम यह रहता है कि ना ही तो बच्चे कुछ अच्छा करने में सफल होते है और ना ही हम उनकी सभी प्रकार की इच्छाओं को, जो कि देखा देखी में पनपती हैं, उन्हें पूरा कर पाते है। हालात ये हो जाते है कि हम और हमारे बच्चे इसी देखा देखी में पनपती इच्छाओं पूरा करने में ही अपना समय और श्रम लगा देते है। हमारे असली सपने सपने बन कर ही रह जाते है। इसलिए दूसरों की थाली से अपनी थाली की किसी प्रकार से तुलना नहीं करें। ना ही इस प्रकार की देखा देखी में अपना समय और श्रम बर्बाद करें। तभी हम अपने और अपने माता पिता के सपनों को पूरा कर सकते है।

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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