त्याग फलता है और लोभ छलता है

त्याग फलता है और लोभ छलता है

Ramsawaroop Rawatsare 1

न्नाराम के पास बहुत सारी सम्पत्ति थी, फिर भी वह हमेशा लालच मे रहता था । उसकी सोच थी कि खर्च कुछ नहीं हो पर रोज कुछ ना कुछ कमाई होती रहे। धन्नाराम की पत्नि बडी ही दयालु प्रकृति की महिला थी। वह साधुओं को या गरीबों को दान देती या कुछ खाने को भी दे देती, तो धन्नाराम नाराज होता और उसे ऐसा करने से मना करता। वह उसे समझाती कि दान देने से या किसी गरीब की मदद करने से उसके मन से दुआ निकलेगी उससे तुम्हारा खजाना घटेगा नहीं उल्टा बढेगा। लेकिन धन्नराम को पत्नि की बातें हजम नहीं होती थी। जब भी किसी मांगने वाले को अपने दरवाजे पर खडा देखता तो वह उसे डांट फटकार कर भगा देता।

एक दिन धन्नाराम के दरवाजे पर एक साधू ने आवाज लगाई । साधू की आवाज में ऐसा जादू था कि धन्नाराम ने उससे प्रभावित होकर उसकी झोली में एक पैसा डाल दिया।

साधू ने उसे दुआऐं दी ओर भगवान का प्रसाद देकर चला गया। शाम को धन्नाराम ने उस प्रसाद की पुडिया को खोल कर देखा तो उसमें प्रसाद के स्थान पर सोने की मोहर थी। धन्नाराम की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। एक पैसे के बदले एक सोने की मोहर। वह इस बात का अफसोस करने लगा कि उसने साधू को एक पैसा ही क्यों दिया एक मोहर देता तो ना जाने कितनी मोहरे मिलती। खैर धन्नाराम उसी साधू के फिर से आने की प्रतिक्षा करने लगा । साधू ने अगले दिन फिर आकर उसके दरवाजे पर आवाज लगाई।

धन्नाराम ने अपने लालच के अनुसार उसकी झोली में एक मोहर डाल दी । साधू ने प्रसाद की पुडिया निकाली और धन्नाराम के हाथ में रख कर चला गया। शाम को धन्नाराम ने प्रसाद की पुडिया को खोला तो देख कर माथा पीट लिया। उसमें सिर्फ प्रसाद ही था और कुछ नही। अब वह हाथ में आई एक मोहर के निकल जाने का दुख मनाने लगा। उसकी पत्नि ने समझाया ’’त्याग फलता है और लोभ छलता है। तुमने पहले जो एक पैसा साधू को दिया था वह त्याग था। वह फला और दूसरे दिन लोभ के वसीभूत होकर तुमने जो एक सोने की मोहर दान स्वरूप साधू को दी। वह दान नही होकर लोभ था जिसने तुम्हें छला। दान वही फलता फूलता है जो निस्वार्थ भाव से दिया जावे।’’ धन्नाराम को अपनी गलती का ज्ञान हुआ। इसके बाद उसने अपनी सोच में बदलाव किया और सुखी रहने लगा।

हमारी सोच भी धन्नाराम जैसी ही है, हम भी दान करते समय या किसी गरीब की मदद करते समय प्रतिफल का भाव रखते है। प्रतिफल के भाव से किया गया दान कभी भी मन में सन्तोष नहीं आने देता। जबकि निःस्वार्थ भाव से दिया गया दान सुख, सन्तोष व शान्ति को लाता है। हमें चाहिये कि दान करते समय हम किसी भी प्रकार का लालच या प्रतिफल का भाव मन में नहीं रखे। किसी को कुछ दे या किसी का कोई काम भी करें तो भी मन में निःस्वार्थ भाव रहना चाहिये । यही भाव श्रेष्ठता का भाव है जो श्रेष्ठजनों का साथ दिलाता है। प्रभु के प्रति आस्ता जगाता है।

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