बढ़ती महंगाई और घटती लोकप्रियता

बढ़ती महंगाई और घटती लोकप्रियता

Editor Anil Kumar Mishra
  अनिल कुमार मिश्रा 
(चेयरमैन एवं प्रधान संपादक) 
"वशिष्ठ वाणी व संसद वाणी" 
दैनिक समाचार पत्र
 

कोरोना महामारी का दंश झेल रहे लोगों के सामने और विकट समस्या महंगाई मुंह बाए खड़ी है। सभी वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे हैं, उसे (महंगाई) खाद पानी कालाबाजारी और मुनाफाखोर धड़ल्ले से दे रहे हैं और सिस्टम की तरफ से इन कालाबाजारियों और मुनाफाखोरों की सेहत के लिए दवाए, ऑक्सीजन की अच्छे से व्यवस्था की जाती है क्योंकि इन्हें पता है कि हमारा कुछ बिगड़ने वाला है नहीं। अगर सरकार कुछ कड़े कदम उठाती भी है तो कार्यवाही हमें ही करनी है और हम थोड़ा बहुत सख्ती दिखाकर पल्ला झाड़ कर निकल लेंगे। हमें क्या? समझे पब्लिक और सरकार। इतने सालों में सिस्टम ने अपनी व्यवस्था ठीक छूछंदर की तरह बना ली है कि सरकार ने हमें छेड़ा तो मर जाएंगी और छोड़ा तो अंधी हो जाएगी। अब इतना बड़ा कलेजा सरकार दिखाए भी तो कैसे? उन्हें भी सत्ता में बने जो रहना है।

यह भी पढ़े: कर्मफल की कसौटी पर श्री योगी!

घुट घुट कर मरे जनता तो मेरी बला से। जब कि महंगाई का आलम यह है कि सरकार का बाजार पर कोई नियंत्रण ही नहीं है। व्यापारी किसी भी वस्तु का कोई भी मूल्य निर्धारित कर बेच रहे हैं सरकार को अपने टैक्स से मतलब है जबकि जनता फिर भी धैर्य के साथ मोदी जी के कार्यक्रमों को अपना समर्थन दिए जा रहीं हैं। जनता देश हित में किए गए मोदी जी के कार्यों को मुक्त कंठ से प्रशंसा कर रही है लेकिन देश हित के साथ ही अपने परिवार और समाज को भी देखना है, जबकि देश में कुछ लोग विपत्ति काल में भी मददगार बनने की कौन कहे संकट काल में भी व्यवसाय तलाश ले रहे हैं।

विगत सत्तर साल से महंगाई हटाने का नारा लगाने वाले आज सत्ता से बाहर हो गए फिर भी महंगाई के लिए धरना प्रदर्शन का दिखावा जारी है, जबकि असलियत में चिंता सत्ता में आने और अपनी कमाई का है।

आज जनता के पास कोई विकल्प नहीं है यही कारण है कि सरकार भी निश्चिंत है जबकि सच्चाई यह है कि इससे सरकार की लोकप्रियता में गिरावट आई है । बाजार तो बाजार ही है जबकि सरकारी उपक्रमों में मनमानी लूट मची है। ज्यादा कुछ नहीं बस इतने से ही समझ लिजिए कि पेट्रोलियम कंपनियां और राष्ट्रीयकृत बैंकों की मनमानी इस कदर जारी है कि जैसे “कांग्रेस की सरकार गिराने पर जनता से बदला लेने की ठान ली है”। अब मध्यम वर्गीय परिवार और आम जनता तो कहीं की नहीं रही, एक तरफ कुंआ तो दुसरी तरफ खांई। यही कारण है कि सरकार भी मस्त है कि लोग जायेंगे कहां। जबकि सरकारी उपक्रमों और सिस्टम पर सिकंजा कसते ही बाजार अपने आप सुधर जाएंगे। लेकिन बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे। सरकार में दृढ़ संकल्प की विरक्तता तो विपक्ष की नीयत में ही खोट।

सरकार के दो उपक्रम पेट्रोलियम और बैंक जिनका जुड़ाव सीधे तौर पर जनता से है लेकिन यह दोनों ही विभाग जनता-जनार्दन के प्रति जागरूक नहीं है इनको सिर्फ अपना फायदा नजर आता है। मुद्रा लोन जैसे सरकार के और कार्यक्रमों को सरकार की हिदायत के बावजूद बैंकों ने खूब अपनी मनमानी की, जरुरतमंदों के लिए तमाम तरह की बंदिशें घोटाले बाजों को आवभगत के साथ घर बैठे ऋण की व्यवस्था। सरकार के राष्ट्रहित कार्यक्रम “नोटबंदी” में भी इन्होंने खूब मनमानी की, जो कि सरकार के संज्ञान में भी है। भ्रष्टाचार मुक्त सरकार के संकल्प को भी सिस्टम ने खूब पलीता लगाया। आज कोई भी ऐसा विभाग नहीं हैं जो भ्रष्टाचार मुक्त हो। जब तक हर विभाग की जिम्मेदारी तय नहीं होगी और उसे समय-सीमा में बांधकर दंड विधान तय नहीं होगा वो भी ईमानदारी और पारदर्शिता से। तब तक ना सिस्टम सुधरेगा ना ही भ्रष्टाचार समाप्त होगा। कहने को तो लोकतंत्र में आमजन ही मालिक है लेकिन जनता के हर क्रियाकलाप को एक दायरे में दंड विधान के तहत प्रतिबंधित कर दिया गया जबकि जनता पैसों से ऐश करने वालोें पर कोई प्रतिबंध नहीं वो काम करें ना करें कोई पूछने वाला नहीं, कोई समय सीमा नहीं, कोई जवाबदेही तय नहीं। जबकि हम भारतीयों के स्वभाव में ही है कि “बिन भय होत न प्रीति”

हमारे देश की यह अजीब विडंबना है कि जो जनता अपने वोट से सरकार बनाती है उसी सरकार की बागडोर सिस्टम के हाथों में होती है। फिर वही जनता अपनी ही बनाई गई सरकार के शासन में तिल तिल कर मरने पर मजबूर हो जाती है क्योंकि सिस्टम जनता के प्रति जवाबदेह है नहीं, और सरकार बिना सिस्टम के कुछ कर सकती नहीं।

यह भी पढ़े: सिस्टम में सुधार की जरूरत

आज देश का करदाता ही सबसे ज़्यादा परेशान हैं क्योंकि उसके टैक्स के पैसे का सार्थक उपयोग कम और राजनीति में सस्ती लोकप्रियता, वोटों के तुष्टिकरण और खैरात बांटने में दुरपयोग ज्यादा है। विकास के नाम पर वसूला गया धन खैरात बांटने में दिल खोलकर लूटाया जा रहा है। अपने पैसे से भिखारी को भीख नहीं देने वाले भी जनता के पैसों को खैरात बांटने में दिल खोलकर लूटाते है ताकि जनता-जनार्दन पंगु, लाचार और गूंगी बनीं रहे। ज्यादा गरीब और ज्यादा अमीर की तो बल्ले-बल्ले है केवल मध्यम वर्ग आहत और दुविधा में है “ना खुल कर जी रहा है ना कुछ बोल पा रहा है” क्योंकि आज के राजनीतिक परिवेश में सभी दलों के लिए यह कहावत चरितार्थ हो रही है कि “अपना काम बनता तो भाड़ में जाए जनता”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *