निर्मल और शांत मन ही भगवान का घर है

निर्मल और शांत मन ही भगवान का घर है

Ramswaroop Rawatsare
रामस्वरूप रावतसरे 
लेखक

संत ब्रह्मदेव वर्षो से तप साधना व ईश्वर भक्ति में रमे हुए थे। इस तप साधना के कारण वे ऐसी उच्च आध्यात्मिक स्थिति को प्राप्त कर चुके थे। जिसमें साधक ’’सदेह’’ होते हुए भी ’’विदेह’’ हो जाता है। कर्म करते हुए भी वह कर्माशक्ति से मुक्त हो जाता है। वह भौतिक संसार में रहते हुए भी हर पल अभौतिक व आत्मिक मनोदशा में ही स्थित रहता है। उसकी मानसिक दीनता, हीनता व दासता सर्वथा समाप्त होती है। वह आलसी व प्रमादी नहीं, बल्कि कर्मठ व पुरूषार्थी हो जाता है। संत ब्रह्मदेव हमेश ईश्वरीय भाव में रहते हुए लोगों को भगवान के सानिघ्य में रहने की प्रेरणा दिया करते थे।

एक बार संत ब्रह्मदेव जी अपने पास आए हुए शिष्यों व अनुयायियों को ईश्वर भक्ति का ज्ञान दे रहे थे। तभी एक शिष्य ने पूछा- गुरूवर! हमें बताया जाता है कि भगवान हर जगह मौजूद हैं। यदि ऐसा है तो वे हमें कभी दिखाई क्यों नहीं देते? फिर हम कैसे मान लें कि भगवान सचमुच में हैं? और यदि वे हैं तो हम उन्हें कैसे प्राप्त कर सकते हैं।

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संत ब्रह्मदेव मुस्कुराए और उन शिष्यों को गोदावरी नदी के पास ले गए। उन्होंने उन शिष्यों को नदी के किनारे जल में उतरने के लिए कहा। जब शिष्य नदी किनारे जल में उतर गए, तो संत ने कहा कि पानी में नीचे बैठे किचड़ को निकालकर जल की बहती धारा पर छोड़ो। सभी शिष्य ऐसा ही करने लगे।

फिर संत ब्रह्मदेव बोले- ’’अब तुम लोग इस किचड़ मिले जल में अपनी परछाई देखो।’’ शिष्यों ने ऐसा ही किया, गंदे पानी व पानी की तेज उठती लहरों में उनकी परछाई ठीक- ठीक नहीं दीख रही थी। उन सब ने कहा गुरूवर गंदे पानी व पानी में उठती तेज लहरों के कारण हमारी परछाई न तो ठीक से दीख पा रही है, न ही स्थिर हो रही है। तब संत बोले- ’’वत्स! तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर यही है। जैसे गंदे जल में तुम्हें अपनी प्रतिच्छाया दिखाई नहीं दे रही है। वैसे ही मलयुक्त व चंचल मन में उठ रही विकारों की लहरों के कारण तुम्हें तुम्हारे अतंस् में बैठे भगवान दिखाई नहीं दे रहे है।

उसके बाद संतप्रवर उन शिष्यों को नदी में बहते शांत व निर्मल जल के पास ले गए और उसमें अपनी परछाई देखने को कहा। सभी शिष्यों ने ऐसा ही किया और उन सब ने उस शांत व निर्मल जल में अपनी परछाई को स्पष्ट रूप से देखा। संत ब्रह्मदेव ने कहा-’’ इस शांत व निर्मल जल की भाॅंति जब तुम्हारा मन भी शांत व निर्मल हो जाएगा, तब तुम्हारे अंदर ही तुम्हें स्वयं के वास्तविक स्वरूप व ईश्वर के दर्शन होने लगेंगे, क्योंकि जब नियमित तप -साधना से मन शांत व निर्मल हो जाता है। मन में उठ रही विकारों, वासनाओं, संस्कारों की लहरें शांत हो जाती है या समाप्त हो जाती है। तब साधक को अपने आत्मस्वरूप का दर्शन होने लगता है। तब उसे अपनी आत्मा में ही ईश्वर दिखाई पड़ने लगते है। इसलिए यदि तुम सब सचमुच ईश्वर को देखना चाहते हो तो अपने मन को विकारो से मुक्त कर निर्मल बना लो, क्योंकि ईश्वर को निर्मल मन ही प्रिय है। जिसका मन पूर्णतः निर्मल होता हैं, उसे ईश्वर की प्राप्ति अवश्य ही होती हैं। जैसा कि भगवान स्वयं कहते हैः-

  • निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
  • मोहि कपट छल -छिद्र न भावा।।

हम भी उस शिष्य की तरह है। भगवान को जानने, उन्हें प्राप्त करने के लिए ना जाने कितने उपक्रम करते है। व्रत, तीर्थयात्राएं और भी ना जाने क्या क्या लेकिन जो काम हमें सबसे पहले करना चाहिये उसे अन्त तक नहीं करते। हम अपने अन्दर विकारों का, छल छिद्र का, कपट का, लोभ का, अपने पराए का और भी ना जाने क्या? जिनसे हमारा किसी भी प्रकार का सम्बन्ध नहीं है और शायद कभी हो भी नहीं उसे भी मन दिमाग में बसाये रखते है। यहां तक कि हम जब भगवान की पूजा करने बैठते है तब भी हमारा मन सांसारिक आपा धापी की दौड़ लगाता रहता है। इस संसार में आने वाला प्रत्येक जीव अपने कर्मफल के अनुसार जन्म लेता है और जीवन जीता है। हम इसको स्वीकार नहीं करते हुए उस रास्ते पर दौड़ लगाने लगते है, जिसका कोई अन्त नहीं हैं।

इस कभी ना खत्म होने वाली दौड़ में हम प्राप्त कुछ नहीं करते लेकिन अपना संजोया हुआ ही नष्ट करते जाते है। इसलिए जैसा भगवान स्वयं कहते है उन्हें निर्मल मन वाले, जिसमें कपट छल छिद्र नहीं हो, अधिक पसंद है। हमें अन्य सब बातों को छोड़ते हुए अपने मन दिमाग को निर्मल और शांत करने के अधिक प्रयास करना चाहिये। यह तभी संभव है, जब हम निरंतर सात्विक भावों के साथ अपना कर्म करते हुए, प्रभु स्मरण में लगे रहेंगे।

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