प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय सांस्कृतिक पर कराया है गर्व : अखिलेश मिश्र

प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय सांस्कृतिक पर कराया है गर्व : अखिलेश मिश्र

हम पश्चिमी सभ्यता की ओर भागे और पश्चिमी सभ्यता के लोग भारतीय संस्कृति को अपनाया: प्रो. अरविंद जोशी

महेश पाण्डेय ब्यूरो चीफ

वाराणसी: यह भारत का सौभाग्य है कि कई शताब्दियों बाद भारत को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे नेता का नेतृत्व मिला है। जिन्होंने एक भारत-श्रेष्ठ भारत की सोच के साथ सभी को एक मार्केट में जोड़ने का प्रयास किया है। उन्होंने न केवल इंफ्रास्ट्रक्चर बल्कि भावनात्मक एकता के साथ पूरे भारत को इस अभियान से जोड़ कर यहां की सांस्कृतिक दृढ़ता पर गर्व महसूस कराया है। उक्त बातें काशी हिंदू विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान संकाय के सम्बोधि सभागार में आयोजित भारत विश्वगुरु विषय पर व्याख्यान के दौरान बतौर मुख्य अतिथि विदेश मंत्रालय के अपर सचिव अखिलेश मिश्र ने कही।

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अखिलेश मिश्र ने आगे कहा कि देश को न केवल 30 वर्षों बल्कि शताब्दियों बाद ऐसे प्रधनमंत्री का नेतृत्व मिला है जिसने भारतीय भाषाओं को भी विदेशों में उतनी ही वरियता दी है जितनी कि भारतीय भाषाओं को। भारतीय शिक्षा नीति को पहली बार ऐसी नीति मिली है जिसमें भारतीय भाषाओं को वरियता दी गई है।


अपर सचिव ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ऐसे नेता हैं जिन्होंने जितनी भी अब तक नीतियां बनाई हैं जन सब के पीछे एक दूरगामी दृष्टि है। उन्होंने अपनी नीतियों के माध्यम से भारतीय जनता को अपनी ही अस्मिता के प्रति गर्व का बोध कराया है। उन्होंने भारतीय संस्कृति को भारतीय विदेश नीति में एक केंद्रित स्थान प्रदान किया है।

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अपने अध्यक्षीय सम्बोधन में समाजशास्त्र विभाग के प्रो. ए के जोशी ने कहा कि भारत दुनिया के लिए हमेशा से भाग्यविधाता रहा है और आगे भी रहेगा बशर्ते हम अपनी संस्कृति और सभ्यता को न छोड़ें। सच्चाई यह है कि हमारे अंदर हीन भावना तब से उत्पन्न हुई जब से भारत इंडिया बना दिया गया। पश्चिमी सभ्यता को अपनाने की ऐसी होड़ मची की हम अपने संस्कार को ही भूलते चले गए।

उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान जो कि संस्कृत भाषा में है उसे भारतीयों न पढ़कर विदेशियों ने पढ़ा और उस ज्ञान को चुरा लिया और भारतीयों को ही अपनी ही संस्कृति और सभ्यता का ज्ञान देने लगे। यह भी कहा जा सकता है कि जितनी भारत से सम्बंधित खोजें हुई हैं आज तक वह सभी पहले से ही भारत मे मौजूद थीं, जिसे विदेशियों ने सिर्फ पढ़कर अपना नाम दे दिया।

जिसका नतीजा यह हुआ कि पश्चिमी सभ्यता के लोग भारतीयता को अपनाकर हमें ही शिक्षा देने लगे हैं। हमारे यहां जन्म से मृत्यु तक पग-पग पर सभ्यता के साथ संस्कार है। भारतीय सभ्यता में विवाह केवल यौन इच्छा की पूर्ति के लिए नहीं बल्कि अपने दायित्वो और कर्तव्यों को निभाने के लिए किया जाता है। जबकि यही पार्श्व सभ्यता में शादी महज यौन इच्छा की पूर्ति है।


अतिथियों का स्वागत व कार्यक्रम का संचालन ख्यात न्यूरोलॉजिस्ट प्रो. विजयनाथ मिश्र ने किया। कार्यक्रम का शुभारंभ महामना मदनमोहन मालवीय की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर किया गया। इस दौरान प्रो. आर के सिंह, कविता गोंड, प्रो. ए पी सिंह, काशियाना फाउंडेशन से सुमित सिंह, प्रो. एम आर पाठक, पिलग्रिम्स बुक सेंटर से रामानंद तिवारी, डॉ ए के पांडेय, शैलेश तिवारी, डॉ राजीव दुबे, रोटी बैंक से किशोरकान्त तिवारी और रौशन पटेल, डॉ रंजना उपाध्याय, वेस इंडिया के राजेश श्रीवास्तव, अष्टभुजा मिश्रा सहित अन्य विशिष्टजन उपस्थित रहे।

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