सतकर्मो से कंकड़-पत्थर  भी अनमोल रत्न बन जाते है

सतकर्मो से कंकड़-पत्थर भी अनमोल रत्न बन जाते है

Ramswaroop Rawatsare
रामस्वरूप रावतसरे
लेखक

व्यापारी हरी प्रसाद जितना अमीर था उतना ही दान-पुण्य करने वाला भी था। वह सदैव यज्ञ-पूजा आदि कराता रहता था। एक यज्ञ में उसने अपना सबकुछ दान कर दिया। अब उसके पास परिवार चलाने लायक भी पैसे नहीं बचे थे। व्यापारी की पत्नी ने सुझाव दिया कि पड़ोस के नगर में एक बड़े सेठ रहते हैं। वह दूसरों के पुण्य खरीदते हैं। आप उनके पास जाइए और अपने कुछ पुण्य बेचकर थोड़े पैसे ले आइए, जिससे फिर से काम-धंधा शुरू हो सके।

हरी प्रसाद की पुण्य बेचने की बिलकुल इच्छा नहीं थी। लेकिन पत्नी के दबाव और बच्चों की चिंता में वह पुण्य बेचने को तैयार हो गया। पत्नी ने रास्ते में खाने के लिए चार रोटियां बनाकर दे दीं। हरी प्रसाद चलता-चलता उस नगर के पास पहुंचा जहां पुण्य के खरीदार सेठ रहते थे। उसे भूख लगी थी। नगर में प्रवेश करने से पहले उसने सोचा भोजन कर लिया जाए। उसने जैसे ही रोटियां निकालीं एक कुतिया अपने तीन छोटे छोटे बच्चों के साथ सामने आ खड़ी हुई। कुतिया ने बच्चे जंगल में जन्म दिए थे। बारिश के दिन थे और बच्चे छोटे थे, इसलिए वह उन्हें छोड़कर नगर में नहीं जा सकती थी।

हरी प्रसाद को दया आ गई। उसने एक रोटी कुतिया को खाने के लिए दी। कुतिया पलक झपकते ही रोटी चट कर गई, लेकिन वह अब भी भूख से हांफ रही थी। हरी प्रसाद ने दूसरी रोटी, फिर तीसरी और फिर चैथी रोटी भी कुतिया को खिला दीं। खुद केवल पानी पीकर सेठ के पास पहुंचा। हरी प्रसाद ने सेठ से कहा कि वह अपना पुण्य बेचने आया है। सेठ काम में व्यस्त था। उसने कहा कि शाम को आओ। दोपहर में सेठ भोजन के लिए घर गया और उसने अपनी पत्नी को बताया कि एक व्यक्ति अपने पुण्य बेचने आया है। उसका कौन सा पुण्य खरीदूं। सेठ की पत्नी बहुत पतिव्रता और सिद्ध महिला थी। उसने ध्यान लगाकर देख लिया कि आज व्यापारी ने कुतिया को रोटी खिलाई है। उसने अपने पति से कहा कि उसका आज का पुण्य खरीदना जो उसने एक जानवर को रोटी खिलाकर कमाया है। वह उसका अब तक का सर्वश्रेष्ठ पुण्य है।

हरी प्रसाद शाम को फिर अपना पुण्य बेचने आया। सेठ ने कहा- आज आपने जो यज्ञ किया है, मैं उसका पुण्य लेना चाहता हूं। हरी प्रसाद मंद सा मुस्कराया फिर बोला – अगर मेरे पास यज्ञ के लिए पैसे होते तो क्या मैं आपके पास पुण्य बेचने आता! सेठ ने कहा कि आज आपने किसी भूखे जानवर को भोजन कराकर उसके और उसके बच्चों के प्राणों की रक्षा की है। मुझे वही पुण्य चाहिए। हरी प्रसाद वह पुण्य बेचने को तैयार हो गया। सेठ ने कहा कि उस पुण्य के बदले वह उसे चार रोटियों के वजन के बराबर हीरे-मोती देगा।

चार रोटियां बनाई गईं और उसे तराजू के एक पलड़े में रखा गया। दूसरे पलड़े में सेठ ने एक पोटली में भरकर हीरे-जवाहरात रखे। रोटी वाला पलड़ा हिला तक नहीं। दूसरी पोटली मंगाई गई। फिर भी पलड़ा नहीं हिला। कई पोटलियों के रखने पर भी जब पलड़ा नहीं हिला तो हरी प्रसाद ने कहा- सेठजी, मैंने विचार बदल दिया है. मैं अब पुण्य नहीं बेचना चाहता।

हरी प्रसाद खाली हाथ अपने घर की ओर चल पड़ा। उसे डर हुआ कि कहीं घर में घुसते ही पत्नी के साथ कलह न शुरू हो जाए। जहां उसने कुतिया को रोटियां डाली थी, वहां से कुछ कंकड़-पत्थर उठाए और थैले में रखकर गांठ बांध दी। घर पहुंचने पर पत्नी ने पूछा कि पुण्य बेचकर कितने पैसे मिले! हरी प्रसाद ने उसे थैला दिखाया और कहा इसे भोजन के बाद रात को ही खोलेंगे। इसके बाद वह गांव में कुछ उधार मांगने चला गया। इधर उसकी पत्नी ने जबसे थैला देखा था उसे सब्र नहीं हो रहा था।

हरी प्रसाद के बाहर जाते ही उसने थैले की गांठ खोली। उसकी आंखे फटी की फटी रह गईं। थैला हीरे-जवाहरातों से भरा था। उसने झटपट थैले की गांठ बांधी और पति के आने का इंतजार करने लगी। हरी प्रसाद कुछ उधार के पैसे लेकर घर लौटा तो उसकी पत्नी ने पूछा कि पुण्यों का इतना अच्छा मोल किसने दिया ? इतने हीरे-जवाहरात कहां से आए ? हरी प्रसाद को अंदेशा हुआ कि पत्नी सारा भेद जानकर ताने तो नहीं मार रही। उसने ने कहा- दिखाओ कहां हैं हीरे-जवाहरात! पत्नी ने थैला लाकर उसके सामने उलट दिया। आंगन में बेशकीमती रत्न बिखरे पड़े थे। वह हैरान रह गया। फिर उसने पत्नी को सारी बात बता दी। पत्नी को पछतावा हुआ कि उसने अपने पति को विपत्ति में पुण्य बेचने को विवश किया। फिर दोनों ने तय किया कि वह इसमें से कुछ अंश निकालकर पुनः व्यापार शुरू करेंगे। व्यापार से प्राप्त धन को इसमें मिलाकर जनकल्याण में लगा देंगे।

ईश्वर हमारी परीक्षा लेते है। परीक्षा में वह सबसे ज्यादा हमारे उसी गुण को परखते है जिस पर हमको गर्व होता है। अगर हम विकट परिस्थितियों में भी श्रेष्ठता और सेवा भाव को बनाए रखते है तो ईश्वर वह गुण हमें हमेशा के लिए वरदान स्वरूप दे देते हैं। अगर हम किसी परेशानी या कमी के करण अपने सिद्धान्तों से या सेवाभाव से डगमगाते है, तो हमारे द्वारा किये गये पुन्य के कार्य सार्थक परिणाम की ओर नहीं बढ पाते। इसलिए हालात कैसे भी हो, भगवान पर भरोषे के साथ अपने परहित धर्म को करते रहीये। पर हितार्थ किये गये कामों का परिणाम आता है। शास्त्रों के अनुसार सतकर्म कंकड़ – पत्थर को भी अनमोल रत्नों में बदले की क्षमता रखते है।

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