स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की जरूरत

स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की जरूरत

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लेखक राजेश माहेश्वरी

कोरोना की पहली लहर ने आम आदमी के जीवन और अर्थव्यवस्था पर उतना व्यापक असर नहीं डाला था, जितना दूसरी लहर ने डाला है। दूसरी लहर ने आम आदमी को हिला कर रख दिया है। स्वास्थ्य सेवाओं की सारी पोल पट्टी भी दूसरी लहर में खुलकर सामने आ गई। कोरोना की दूसरी लहर के चरम में दैनिक संक्रमितों का अधिकतम आंकड़ा 4.5 लाख से भी ऊपर चला गया था। अस्पतालों में बिस्तरों की कमी के साथ ही ऑक्सीजन आपूर्ति और वेंटीलेटरों की किल्लत भी देखने मिली जिस कारण बड़ी संख्या में लोग मारे गये। पिछले एक महीने का घटनाक्रम याद करते ही शरीर में सिरहन सी दौड़ जाती है। जब कोविड से बचने के लिए दवाओं, इंजेक्शन और आक्सीजन की मारामारी देशभर में मची थी। शमशान में दाह संस्कार करने के लिए परिजनों को घंटों ही नहीं अपितु कई दिनों तक इन्तजार करना पड़ा। निश्चित रूप से वह एक अप्रत्याशित और अभूतपूर्व संकट था। इस लहर में सरकारी और प्राईवेट सभी स्वास्थ्य सेवाएं बुरी तरह हिल गई। ये बात साफ हो गई कि पिछले सत्तर सालों में स्वास्थ्य के क्षेत्र में जो कुछ होना चाहिए था, वो नहीं हुआ। सभी सरकारों ने अपनी जिम्मेदारी से मुंह चुराया।

मोदी सरकार ने पिछले सात साल के कार्यकाल में स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई सुधारात्मक कदम उठाये हैं लेकिन विशाल आबादी के सामने वर्तमान व्यवस्थाएं काफी कम और कमजोर हैं। वर्ष 2020 में कोविड का प्रभाव झेलने के बाद इस वर्ष के बजट में मोदी सरकार ने स्वास्थ्य के बजट को बढ़ाया था। केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट 2021-22 पेश करते हुए कहा था कि देश के स्वास्थ्य क्षेत्र में कोविड-19 वैश्विक महामारी का गहरा प्रभाव साफ तौर पर दिखाई दिया। कोविड-19 के खिलाफ देश की लड़ाई और केन्द्र सरकार द्वारा समय पर उचित कदम उठाने के नारे के साथ अपना बजट भाषण शुरू करते हुए वित्त मंत्री ने जोर देकर कहा कि आत्मनिर्भर भारत के 6 प्रमुख स्तंभों में स्वास्थ्य और देखभाल प्रमुख स्तंभ है। अन्य क्षेत्रों के साथ स्वस्थ भारत राष्ट्र प्रथम के संकल्प को और मजबूत करेगा। स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र का देश् में महत्वपूर्ण स्थान है। इस क्षेत्र के लिए पिछले वर्ष के 94,452 करोड़ रुपये की अपेक्षा 2021-22 के बजट अनुमान में 2,23,846 करोड़ रुपये की वृद्धि की गई है। इस क्षेत्र में 137 प्रतिशत की यह वृद्धि है। इस वित्त वर्ष के बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण 3 क्षेत्रों में विशेष ध्यान दिया गया हैः रोकथाम, उपचार और देखभाल।

नेशनल हेल्थप्रोफाइल-2019 द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद (2017-18) का केवल 1.28ः स्वास्थ्य पर सार्वजनिक रूप से खर्च करता है. प्रति व्यक्ति के हिसाब से स्वास्थ सेवाओं पर मात्र 1,657 रुपये खर्च करता है। एनएचपी में उपलब्ध तुलनात्मक आंकड़ों के अनुसार दक्षिण पूर्व एशिया क्षेत्र के 10 देशों में से भारत केवल बांग्लादेश से ऊपर है। भारत के पड़ोसी देश, जैसे श्रीलंका, इंडोनेशिया, नेपाल और म्यांमार स्वास्थ्य सेवाओं पर भारत की तुलना में कहीं अधिक खर्च कर रहे हैं। ओईसीडी देशों और विकसित राष्ट्रों जैसे अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस या जापान से भारत की तो तुलना ही नहीं की जा सकती।

डब्ल्यूएचओ द्वारा अनुशंसित प्रत्येक 1,000 लोगों के लिए एक डॉक्टर के विपरीत भारत में 11,500 से अधिक लोगों के लिए केवल एक सरकारी डॉक्टर है। निजी क्षेत्र में अधिक बेड और अधिक डॉक्टर (कर्मचारी) हो सकते हैं परंतु सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति उनका कोई उत्तरदायित्व नहीं है और भारत की ज्यादातर आबादी इन स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लेने के लिए भी आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है। इसके अतिरिक्त, स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं के संबंध में ग्रामीण-शहरी विभाजन बहुत महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए- 73 फीसदी ‘पब्लिक हॉस्पिटल बेड्स’ शहरी क्षेत्रों में विद्यमान हैं, जबकि भारत की 69 फीसदी जनसंख्या ग्रामीण इलाकों में निवास करती है।

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि सरकार के सारे साधन-संसाधन झोंकने के बाद भी 138 करोड़ की आबादी के हिसाब से हमारे देश में चिकित्सा प्रबंध बहुत ही नगण्य हैं। देश के बहुत बड़े हिस्से में चिकित्सा नाम की कोई व्यवस्था ही नहीं है। गत दिवस प्रधानमन्त्री ने मन की बात में ये जानकारी दी कि कोरोना की दूसरी लहर में ऑक्सीजन की कमी देखते हुए अस्पतालों में प्रयुक्त होने वाली ऑक्सीजन का उत्पादन दस गुना बढ़ा। निश्चित रूप से ये संतोष का विषय है। कोरोना देखभाल केन्द्रों की शक्ल में साधारण संक्रमण वाले मरीजों के इलाज की भी काफी व्यवस्था सरकार और निजी सेवाभावी संस्थाओं द्वारा की गई है। लेकिन ये सब होते-होते कोरोना की दूसरी लहर ढलान पर आ गई और 1 जून से देश के बड़े हिस्से में तालाबंदी वापिस लेकर व्यापारिक संस्थान और कार्यालय कतिपय बंदिशों के साथ खुलने जा रहे हैं। उद्देश्य व्यापार और उद्योग को गति देकर अर्थव्यवस्था को संबल देना है।

कोविड की दूसरी लहर जब उफान पर थी तब देशभर में मरीजों की संख्या में भारी इजाफा हुआ। लेकिन देश में डॉक्टरों की संख्या सीमित ही है, ऐसी स्थिति में टेलीमेडिसिन ही एक कारगर उपाय बन कर सामने आई। जिसे ग्रामीण स्तर तक ले जाने की जरूरत है। पिछले दिनों ही भारत सरकार की राष्ट्रीय टेलीमेडिसिन सेवा ई-संजीवनी ने 30 लाख से अधिक परामर्श उपलब्ध कराकर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। मौजूदा समय में, राष्ट्रीय टेलीमेडिसिन सेवा 31 राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों में संचालित है और प्रतिदिन देश के 35 हजार से भी अधिक मरीज स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त करने के लिए इस नवाचारी डिजिटल माध्यम का उपयोग कर रहे हैं। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर 31 हजार से अधिक डॉक्टरों और पैरामेडिक्स को प्रशिक्षित करके ई-संजीवनी में शामिल किया गया है। ई-संजीवनी को शीघ्र और व्यापक तौर पर अपनाना यह दर्शाता है कि कोरोना काल में रोगियों को दूर से ही प्रभावी ढंग से नैदानिक प्रबंध किया जा सकता है। जिन रोगियों को अत्यावश्यक चिकित्सा की जरूरत नहीं है, वे अधिक से अधिक टेलीमेडिसिन का उपयोग कर रहे हैं और चिकित्सा की गुणवत्ता से समझौता किए बगैर ही कोरोना से संक्रमित होने के जोखिम से भी अपना बचाव कर पा रहे हैं। पिछले लॉकडाउन के दौरान विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी अधिक से अधिक टेलीमेडिसिन मॉडल को अपनाने की ही सलाह दी थी। कोरोना वायरस लंबे समय तक बना रहेगा। ऐसे में टेलीमेडिसिन कारगर साबित होगी।

चिकित्सा जगत इस बात को लेकर आशंकित है कि कोरोना अथवा इस जैसी दूसरी संक्रामक बीमारी का हमला भविष्य में हो सकता है। ब्रिटेन और वियतनाम से जो खबरें आ रही हैं उनके अनुसार कोरोना से मिलता-जुलता नया संक्रमण देखने मिला है। छोटे देशों में जनसंख्या कम होने से अस्पताल, चिकित्सक और दवाओं की जरूरत भी कम होती है लेकिन भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश की जरूरत तो अमेरिका और यूरोप के अनेक बड़े देशों को मिलाकर भी ज्यादा है। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि वे कोरोना की दोनों लहरों से मिले सबक को भुलाने की बजाय चिकित्सा तंत्र को इतना मजबूत करें जिससे किसी को अस्पताल में बिस्तर और ऑक्सीजन के लिए भटकना न पड़े। इसके अलावा देश में दवा उत्पादन के क्षेत्र में भी बड़े सुधार की जरूरत है। विकसित और समृद्ध राष्ट्र बनने के लिए आर्थिक विकास के साथ-साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य को उच्च प्राथमिकता देना आवश्यक है। भारत को भी विकसित और समृद्ध राष्ट्र बनने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ सेवाओं पर न केवल सकल घरेलू उत्पाद का बड़ा हिस्सा खर्च करने की आवश्यकता है बल्कि दूरगामी नीति निर्धारण करने और उनका पारदर्शिता के साथ उत्तरदायित्वपूर्ण क्रियान्वयन कर उनके सकारात्मक परिणाम सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।

-लेखक राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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