पानी बिच मीन प्यासी, मोहि देखत आवे हांसी!

पानी बिच मीन प्यासी, मोहि देखत आवे हांसी!

Ramswaroop Rawatsare
लेखक
रामस्वरूप रावतसरे

रिया ने देखा अखबार में दो अफसर और एक वकील के भ्रष्टाचार में पकड़े जाने का समाचार बड़े बड़े अक्षरों में छपा था। रोज रोज आ रही भ्रष्टाचार की खबरों को लेकर वह सोच रहा था कि सरकारी नौकरी में आते ही लोगों की भूख क्यों बढ जाती है। जितना बड़ा अधिकारी उतनी ही बड़ी भूख।

खैर, हरिया को आज की चिन्ता सता रही थी कि कहीं काम नहीं मिला तो भूखा रहना पड़ सकता है। उसी समय तनसुख आया बोला ’’ अखबार में क्या देख रहे हो हरिया!’’ हरिया बोला ’’कुछ नहीं, यही देख रहा था कि सरकारी नौकरी लगते ही लोगों की भूख सुरसा का रूप क्यों धारण कर लेती है।’’

तनसुख ने कहा ’’हरिया सरकारी नौकरी ऐसा सुरक्षा चक्कर हैं जिसमें आने के बाद उसे सरकारी संरक्षण के साथ साथ सारी सुविधाएं तो मिलती ही है। पूरी सैलरी पाकर भी काम नहीं करने, टरकाने, काम के बदले आवेदक से पारितोषिक की अपेक्षा रखने , बेवजह चक्कर लगवाने का अधिकार भी मिलता है। जब इन सब जानकारियों से वह वाकिफ हो जाता है तो उसकी सारी दबी हुई इच्छाएं, अपेक्षाएं, हवा में चहल कदमी करती कामनाएं हिलोरे मारने लगती है।

उसे जो मासिक वेतन मिलता है। वह उसे बहुत कम लगने लगता है। (मासिक वेतन से और अधिक चाहिये ) नौकरी से पहले वह पैदल चलता था। बसों में सफर करता था। कम से कम किराये के एक ही कमरे में रह कर, फर्श पर सोता था।

लेकिन नौकरी लगने के बाद उसका स्टैंडर्ड बढ गया है। अब उसे तत्काल बहुत कुछ चाहिये । उसके पास गाड़ी हो, शहर में मकान हो, वह भी हाई सोसायटी के ऐरिये में, उसमें सभी प्रकार की आधुनिक कही जाने वाली सुविधा हो । यह सब तन्खवाह में तो हो नहीं सकता। इसलिए तन्खवाह से अलग मिले, वह भी थोड़ नहीं बहुत सारा मिले। जिससे सब कुछ एक साथ ही प्राप्त किया जा सके।

तनसुख ने कहा – हरिया इन भ्रष्टाचारियों को सिर्फ और सिर्फ अपना सुविधा शुल्क चाहिए। कैसे आएगा, कहां से आयेगा, वह दे पायेगा या नही। इसकी इन्हें कोई चिन्ता नहीं रहती है, जो कहा है वह पूरा हो। यही कारण है देश में कोई सी भी जनहित की योजना समय पर पूरा नहीं होती। सालों तक इनके कार्यालय की तारीखों में ही उलझी पड़ी रहती है। तथाकथित फैसले भी नोटों के पहियों पर बैठ कर पिछले दरवाजे से या रात के अंधेरे में रसूकदारों के यहां चले जाते है। (अजमेर रेवन्यु बोर्ड की तरह ) मुख्य दरवाजे पर बैठा भूखा प्यासा आचक न्याय की बाट जोहता जोहता पुजारी की गति पाता है। जिसे जीते जी न्याय नहीं मिला और मरने के बाद भी उसका पार्थिव शरीर अन्तिम क्रिया के इंतजार में आधुनिक राजाओं की चैखट पर पड़ा रहा। ऐसे कई लोग होगें जिनके हक में सब कुछ था, लेकिन इन न्याय करने वालों को देने के लिए पैसा नहीं था। वे आज लुटे पिटे कागजों का पुलन्दा हाथ में लिए दर दर की खाक छान रहे है।

हरिया बोला ’’ईमानदारी तो कहीं रही ही नहीं’’। तनसुख ने कहा ’’ईमानदार अफसर भी है लेकिन सुंविधा शुल्क की चमक ऐसी होती है कि ईमानदार अधिकारी / कर्मचारी चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते है। यदि वे कुछ हिम्मत करते भी है तो उन्हें किसी अंधेरे कोने में बैठा दिया जाता है। फिर नेताओं की भी अपनी पसंद होती है। महाराष्ट्र के गृहमंत्री की तरह, उनका भी टारगेट होता होगा। खैर, छोड़ो हरिया आज ये रिश्वत लेते पकड़े गये। कुछ समय बाद रिश्वत देकर छूट जायेंगे । लेकिन इन्होंने पैसों के लालच में जो गलत फैसले दे दिये या बरसों तक प्रकरण को अटका कर रखा, उनका क्या होगा?

उसी समय तनसुख को किसी ने आवाज दी। वह उस ओर चला गया। हरिया की सोचने की सामथ्र्य दिन भर की मजदूरी भर थी। उसने एक लम्बा श्वास लिया और अखबार को ऐसे छोड़ा जैसे भ्रष्टाचार के समाचार के शब्द कीड़ों की तरह कुलबुलाने लगे हों।

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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