मांमु हल्ला बोल

मांमु हल्ला बोल

Ramswaroop Rawatsare
लेखक
रामस्वरूप रावतसरे

रिया सुबह का अखवार देख रहा था । उसमें ऐसे कई समाचार थे जिसमें अपने ही अपनों को पछाडने में लगे थे। कल तक साथ थे क्यों कि, उस समय उनका कोई नाम लेवा नहीं था। अब जब उन्हें विश्वास हो गया कि आगामी पांच वर्षो तक उनका कुछ भी नहीं होने वाला है तो उन्होंने सबसे पहले उनके खिलाफ हल्ला बोला है जो उनके आन्तरिक कपडों की वास्तविक स्थिति के बारे में जानते हैं। खैर ’’राजनीति कब स्वार्थ नीति’’ में बदल जाती है, पता ही नही चलता और जब पता चलता है तब तक मांमु हल्ला बोल चुका होता है।

यही सब तरफ हो रहा है। दिल्ली का दिल जीतने वाले आम आदमी जब खास बन गये , तो उन्होनें योगेन्द्र यादव तथा प्रषान्त भूषण के खिलाफ ऐसा हल्ला बोला कि दोनों के दोनों बन्द कमरों से निकल कर सार्वजनिक रूप से मिमियाने लग गये। सड़क पर आते ही उन्हें समझ आया कि उन्होंने मामुओं को मंच पर बैठा कर बहुत बड़ी गलती कर दी हैं। मध्य प्रदेष में तो मांमु ने कमाल ही कर दिया।

कमलनाथ को ऐसी पटकनी दी कि उन्हें घर का दरवाजा भी भूलना पड़ गया। लेकिन चतुर मांमु के आंगन में भी मांमु पैदा हो गये हैं जो येनकेन प्रकारेण लाठी हथियाने के चक्कर में मामुं को सोने तक नहीं दे रहे है। यहां जिसके हाथ में मजबूत लाठी है भैसं पर भी उसी का अधिकार मान लिया जाता है। इसलिए हर सक्षम इसी लाईन में खड़ा नजर आ रहा है।

इधर राजस्थान में प्रदेश कांग्रेस केन्द्र सरकार के खिलाफ हल्ला बोलने का कोई ना कोई तिकडम निकाल कर सडक पर आती है, कि हल्ला हुडदंग हो जाता है और फिर पिट कर बैठ जाते है। इस घटना क्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस के बडे नेता कहते सुने गये कि ’’किसने कही थी इतना गला फाडों। चुपचाप फेरी लगा कर आ जाते।’’ लेकिन जब मांमुओ की संख्या ज्यादा हो जाती है तो हल्ला हुए बिना रह ही नहीं सकता। यही कुछ अति उत्साही कांग्रेसियों के साथ हुआ। इन्हीं के साथी लोग खिसियानी हसीं हंस कर कहते है। समय पर ही इलाज हो गया नही तो ये अपन को भी चैन से नहीं रहने देते। कहीं ना कहीं फटे को ओर फाडते रहते। वैसे भी यहां के मामुंओं का गणित अजीब सा है वे तबतक चुप बैठे रहेगें जबतक कि सारा सामान तैयार होकर परोसने की स्थिति में नहीं आ जाता। फिर वे ऐसी कला दिखाएंगे कि मलाई वाले कटोरे के मालिक बन बैठेंगे। पांच साल तक पसीने बहाने वाला आगामी पांच वर्ष तक आंसू ही बहाता रहता है।

खैर , मांमु हर युग में थे, इस युग में भी है और शायद आगे भी रहेगें। मांमुओ की स्थिति बड़ी विकट है। इनका इतिहास आज तक कोई भी नहीं लिख पाया है। ये तब आते है जब सब कुछ पक जाता है। फिर ऐसा वायरस फैलाते है कि सब को स्वाइन फ्लू होते ही दिखता है। और ये अपना काम करने में सफल हो जाते है। इनकी मनोदशा को आसानी से नहीं जाना जा सकता, ये हमेशा दो कदम आगे चलकर तीन कदम पीछे चलते है। जिससे आगे और पीछे चलने वाले इनके साथ को लेकर भ्रम में पड़े रहते है। ये उस अमर बेल की तरह है। जिसका खाते है, उसे ही बजा डालते है।

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

प्रिय मित्रों: 
अगर आप एक अच्छे लेखक है तो आप हमें संपादकीय लिख कर या किसी भी मुद्दे से संबधित अपनी राय, सुझाव और प्रतिक्रियाएं हमारे ई-मेल पर भेज सकते हैं । अगर हमारें संपादक को अपका लेख या मुद्दा सही लगा तो हम आपके मुद्दे को अपने समाचार पत्र एवं वेबसाइटपर प्रकाशित किया जाएगा। आप अपना पूरा नाम,फोटो व स्थान का नाम जरुर लिखकर भेजें। 

Website: https://www.vanimedia.in/

Epaper: www.epaper.vanimedia.in

Email: vashishthavani.news@gmail.com

वशिष्ठ वाणी भारत का प्रमुख दैनिक समाचार पत्र हैं, जिसमें हर प्रकार के समसामायिक-राजनीति, कानून-व्यवस्था न्याय-व्यवस्था, अपराध, व्यापार, मनोरंजन, ज्ञान-विज्ञान, खेल-जगत, धर्म, स्वास्थ्य व समाज से जुडे हुये हर मुद्दों को निष्पक्ष रुप से प्रकाशित किया जाता हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *