प्रश्न खड़े करने के बजाय, साधनों एवं सहयोग का समुचित उपयोग करें।

प्रश्न खड़े करने के बजाय, साधनों एवं सहयोग का समुचित उपयोग करें।

Ramswaroop Rawatsare
रामस्वरूप रावतसरे
लेखक

कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने केन्द्र सरकार और प्रधानमंत्री को लेकर कहा कि ’’हम शुरू से ही कहते आए हैं कि केंद्र में बैठे लोगों, भाजपा के नेताओं का लोकतांत्रिक मूल्यों परंपराओं में कतई विश्वास नहीं है। प्रधानमंत्री से सवाल पूछना ही गुनाह हो गया क्या? प्रधानमंत्री से इतना सा ही तो पूछा है कि हमारे बच्चों की वैक्सीन बाहर क्यों भेज दी? इतनी सी बात पर दिल्ली में ताबड़तोड़ गिरफ्तारियां शुरू हो गईं। इतना अहंकार ठीक नहीं है। मोदीजी और भाजपा याद रखे, जिस जनता ने आपको सर्वाेच्च पद पर बैठाया है और अब यही जनता आपको जमीन दिखाएगी। इसके लक्षण दिखने शुरू हो गए हैं। जो सरकार सवालों से ही डर जाए समझ लो उसकी उलटी गिनती शुरू हो चुकी है।

वैक्सीन के मामले में केंद्र सरकार से चूक हुई है। उसे मान लेना चाहिए। दुनिया के देश दूसरी लहर से निपटने की तैयारी कर रहे थे और हम उस वक्त भविष्य की परवाह किए बिना करोड़ों डोज विदेश भेज रहे थे। इस चूक पर माफी मांगने के बजाय सवाल पूछने वालों को ही गिरफ्तार करना शुरू कर दिया। हिम्मत है तो हमें भी गिरफ्तार करके दिखाएं।’’ डटोसरा जी की बात में दम है। प्रधान मंत्री या निर्वाचित सरकार से कुछ भी पूछने का संवैधानिक अधिकार है। शायद राजस्थान के निर्वाचित सदस्य भी उसी संविधान की धारा के तहत आते होगें! यहां की जनता को भी प्रश्न पूछने का अधिकार होगा। या यों कहा जाय कि जिस जनता ने राजस्थान की सरकार को सत्तासीन किया है। उनकी भी सरकार से अपेक्षाएं होगी! वों भी इस संकट के समय में रहत के बयान सुनने के लिए लालाइत होगी!

मीडिया रिर्पोट के अनुसार राजस्थान में कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए वैक्सीनेशन अभियान चलाया जा रहा है। लेकिन, कई जगहों में वैक्सीन की बर्बादी भी हो रही है। रिर्पोट के अनुसार राजस्थान में कुल 11.5 लाख (करीब 7 फीसदी) वैक्सीन के डोज खराब हो गए हैं। चुरू जिले में सबसे ज्यादा 39.7 प्रतिशत वैक्सीन बर्बाद होना बताया जा रहा है। हनुमानगढ़ में 24.60 फीसदी वैक्सीन बर्बाद होने की रिर्पोट है। भरतपुर में 17.13 प्रतिशत वैक्सीन बेकार हो गई है। कोटा में 16.71 फीसदी वैक्सीन का बर्बाद होना बताया जा रहा है। यदि ऐसा हुआ है तो राजस्थान की जनता के साथ कितना बड़ा खिलवाड़ किया गया है।

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वैक्सीन की बर्बादी पर केंद्रीय मंत्री और जोधपुर के सांसद गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा है कि राज्य सरकार की लापरवाही के कारण राज्य में कोरोना का संकट घटने की बजाय बढ़ा है। उन्होंने राज्य सरकार से सवाल किया है कि आखिर वैक्सीन की बर्बादी के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए? राज्य सरकार की जनता के प्रति कुछ तो जवाबदेही बनती है।

जयपुर के एक नीजि चिकित्सालय को लेकर पीड़ित युवक हेमंत रावत निवासी प्रताप नगर के अनुसार उसके पिता मोहन सिंह (53) को कोविड होने के बाद 7 मई को भानू अस्पताल में भर्ती करवाया। भर्ती होते ही डॉक्टर ने स्थिति गंभीर बताते हुए आईसीयू में शिफ्ट करने की बात कही और ऑक्सीजन का बंदोबस्त करने के लिए कह दिया। आईसीयू का चार्ज 6 हजार रुपए प्रतिदिन और डॉक्टर की फीस एक हजार रुपए प्रतिदिन के हिसाब से तय हुई, जबकि दवाइयों और जांचों का अलग से चार्ज देने की बात कही गई। 6 दिन भर्ती रहने के बाद अस्पताल संचालक ने मरीज को 1,83,782 रूप्ये का बिल देते हुए दूसरे अस्पताल ले जाने की बात कही और बकाया 65 हजार रुपए जमा करवाने के लिए कह दिया। इस दौरान जब बिल मांगे तो बिल बाद में देने की बात कही। पैसे नहीं देने पर अस्पताल संचालक ने स्कूटी को जब्त कर लिया।

कारोना के बढ़ रहे मर्ज के बीच बाजार में जीवनरक्षक इंजेक्शन लाइपोसोमल एम्पोटेरिसिन-बी बाजार में मिल नहीं रहा। वहीं, दवा कंपनियों ने भी इंजेक्शन के दाम एक माह में ही 70प्रतिशत तक बढ़ा दिए बताए जा रहे हैं। एंटी वायरल इंजेक्शन रेमडेसिविर और टोसिलीजुमैब के बाद अब एंटी फंगल इंजेक्शन की कालाबाजारी की खबरें आ रही हैं। इस सम्बन्ध में जानकार लोगों का कहना है कि इतना हो हल्ला होने पर भी ड्रग डिपार्टमेंट की चुप्पी दवा कंपनियों की लूट में सहभागिता को साबित कर रही है। क्या सरकार को समय रहते जनहित में इस पर उचित कदम नहीं उठाना चाहिए?

हमारे माननीय नेता जब विपक्ष को संवैधानिक अधिकारों का एवं कर्तव्यों का ज्ञान करा सकते है तो उनका यह नैतिक कर्तव्य भी बनता है कि जनता में फैल रही अफवाहों से कोरोना के टीके के भ्रम को दूर करें। बताया जा रहा है कि उदयपुर-प्रतापगढ़ में कोरोना से लड़ाई भोपों और झाड़-फूंक करने वालों के भरोसे है। उदयपुर जिले के वल्लभनगर उपखंड के हर गांव में लगभग 75 प्रतिशत आबादी को खांसी-बुखार है। कोरोना को भूत समझकर भोपों से झाड़-फूंक कराकर लोग अपनी जिंदगी को खतरे में डाल रहे हैं। यह भी जानकारी में आया है कि स्वास्थ्य विभाग की टीमें गांवों में नहीं आती। यहां शनिवार-रविवार को हर गांव में देवरे और मंदिरों में भीड़ रहती है। लोग कोरोना को भूत समझकर झाड़-फूंक से उतरवाने यहां पहुंचते हैं।

मीडिया रिर्पोटों के अनुसार बांसवाड़ा और पाली जिलों के इन आदिवासी क्षेत्रों में सामने आया कि कम उम्र के लोग कोरोना वैक्सीन लगाने से बच रहे हैं या उन्हें घर वाले वैक्सीन नहीं लगवाने दे रहे। उनका कहना है कि नई पीढ़ी है टीका लगाने के बाद अगर बच्चे नहीं हुए तो क्या होगा? इसके अलावा कई सवाल उन्होंने खड़े करते हुए कहा कि अगर वैक्सीन लगवाने के बाद हम विकलांग हो गए या मर गए तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? कुशलगढ़ के बीसीएमओओ डाॅ. राजेंद्र उज्जैनिया ने कहा कि लोगों में ऐसी भ्रांति है यहां अंधविश्वास बहुत है, इसलिए टीकाकरण कम हो रहा है।

भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया ने कोरोना के इलाज में निजी अस्पतालों की मनमानी और सरकारी अव्यवस्थाओं को लेकर कहा है कि मुख्यमंत्री और मंत्रियों को चाहिऐ कि वे दुराग्रह की राजनीति छोड़े, आंखों से पर्दा हटाइए, सियासी बयानबाजी से मरीजों का भला नहीं हो सकता। पूनिया ने कहा, मुख्यमंत्री को निजी अस्पतालों में मरीजों से लिए जा रहे मनमाने चार्ज मामलों पर संज्ञान लेते हुए सुविधाजनक दरें तय करनी चाहिए। जिससे पीड़ित लुटे नहीं।

ऑक्सीजन, बेड्स, रेमेडसिविर इंजेक्शन की कालाबाजारी पर रोक लगाने, चिरंजीवी योजना का लाभ निजी अस्पतालों में भी आमजन को मिले, इन सब कामों के लिए इच्छाशक्ति के साथ सरकार को ठोस कार्ययोजना पर काम करने की जरूरत है। प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में सीएचएसी-पीएचसी की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की ढाचांगत स्थिति अत्यधिक खराब है। इनकी मजबूती पर विशेष ध्यान देने की तत्काल जरूरत है। ग्रामीण अस्पतालों में दवाइयां, डॉक्टर सहित सभी जरूरी स्टाफ को लगाने पर भी गंभीरता से ध्यान देने की आवष्यकता है। जिससे गांवों में समय पर इलाज के साथ साथ संक्रमण फैलने से रोका जा सके।

राजस्थान में फैल रही कोरोना महामारी के सामने हमारे चिकित्सा संसाधन बहुत बोने साबित हो रहे है। यह भी माना जा सकता है कि सरकार बहुत कुछ कर रही है। लेकिन वह सब कुछ नहीं कर सकती। इसके लिए जन सहयोग अत्यधिक जरूरी है। ऐसे में जनप्रतिनिधियों की छोटी से छोटी पहले भी बहुत बड़ा कर सकती है। जहां ऐसा किया गया वहां जनता भी उनके साथ जुड़ी है और परिणाम भी सकारात्मक आये है। यह समय एक दूसरे के प्रति राजनीतिक जुमले उछालने के बजाय सबको साथ मिलकर चलने का एवं संसाधनों का समुचित उपयोग करने का है।

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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