स्वास्थ्य सिस्टम में साधन ही नहीं संवेदना भी जरूरी है।

स्वास्थ्य सिस्टम में साधन ही नहीं संवेदना भी जरूरी है।

Epaper Vashishtha Vani

Ramswaroop Rawatsare
लेखक रामस्वरूप रावतसरे

राजस्थान में कोरोना महामारी से निबटने के लिए एक उच्चस्तरीय ग्रुप का गठन किया गया है. इस ग्रुप का गठन ऑक्सीजन कंस्ट्रेन्ट्रेटर, ऑक्सीजन रेगुलेटर आदि की खरीद के लिए किया गया है। इस उच्चस्तरीय ग्रुप में अतिरिक्त मुख्य सचिव खान सुबोध अग्रवाल, आयुक्त विभागीय जांच प्रीतम यशवंत और संयुक्त शासन सचिव वित्त टीना डाबी को शामिल किया गया है। इसके अलावा भी प्रशासनिक अमले को लगाया गया है। जिससे राजस्थान की जनता को इस महामारी से बचाया जा सके।

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मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रधान मंत्री से भी बात की हैं जिससे ऑक्सीजन एवं अन्य प्रकार की कमियों को समय रहते दूर कर कोरोना संक्रमितों को राहत पहुचाई जा सके। यह समयोचित सराहनीय कदम है। यदि मीडिया रिर्पोटों को सही माने तो यह भी जानकारी में आया है कि साल भर पहले केंद्र से पीएम केयर फंड से 1500 वेंटिलेटर मिले थे ज्यादातर डिब्बों में पैक है उनमें 230 खराब बताए जा रहे है। 12 माह बाद भी राज्य सरकार इन्हें दुरुस्त नहीं करवा पाई।

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जानकारी के अनुसार जोधपुर में पीएम केयर फंड के 100 वेंटीलेटर में से एक वेंटिलेटर को चालू नहीं किया गया। कोरोना से होने वाली मौतों के मामले में जयपुर के बाद जोधपुर दूसरे स्थान पर है। यहां के एसएन मेडिकल कॉलेज को पिछले जून में 100 वेंटिलेटर मिले। सभी खराब बताए जा रहे हैं। इनमें ऑक्सीजन सेंसर काम नहीं करते, 15 मिनट में खुद बंद हो जाते हैं।

जयपुर में 33 वेंटिलेटर खराब है। एसएमएस में फरवरी माह 50 वेंटिलेटर वाला आईसीयू बनाया गया था लेकिन उसे शुरू अप्रेल के अन्त में किया गया । यहां पर भी 18 वेंटिलेटर 6 माह से खराब पड़े हैं। जयपुरिया हाॅस्पिटल में एक साल से 7 वेंटिलेटर, कांवटिया में 2, गणगौरी में 6 वेंटिलेटर खराब बताए जा रहे हैं। ईएसआई को 5 वेंटिलेटर दान में मिले, पर इन्हें शुरू नहीं किया। चिकित्सालय के स्टाफ को अब पता चला कि ये खराब हैं। अस्पताल कोविड सेंटर है, इसलिए मैकेनिक वेंटिलेटर सही करने नहीं आ रहा है।

प्रदेश के अस्पतालों के लिए पहले से खरीद कर लगाए गए 164 वेंटिलेटर भी काम नहीं कर रहे बताए जा रहे है। कोटा मेडिकल कॉलेज को 138 वेंटिलेटर मिले थे। जिनमें से 65 या तो इंस्टाल नहीं किए या इनमें कमी बताकर हटा दिए। इसी प्रकार उदयपुर के आरएनटी मेडिकल कॉलेज को 95 वेंटिलेटर मिले थे। बताया जा रहा है ये सालभर से स्टोर की शोभा बढाते रहे। अब इनमें से 22 को ईएसआईसी हॉस्पिटल में लगाया गया है। इनमें यह शिकायत आ रही है कि ये बार-बार बंद हो जाते है। कोटा में कोरोना ने भयावह स्वरूप दिखाना शुरू किया जब जाकर 5 अप्रैल के बाद 32 वेंटिलेटर्स अपडेट किए गये हैं।

राजस्थान में कई गुना तेजी से बढ़ रही संक्रमण की रफ्तार में स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा गई हैं। यहां कोरोना पेंशेंट्स के लिए बेड और ऑक्सीजन की किल्लत इतनी हो गई है कि अस्पतालों के गेट बंद कर दिए गए हैं। नए पेशेंट को भर्ती करने के लिए जगह नहीं बची है। लिहाजा अब लोग ऑक्सीजन के लिए तड़पते हुए अस्पतालों के गेट पर ही दम तोड़ने लगे हैं।

ऐसा ही दर्दनाक वाकया राजधानी जयपुर में देखने को मिला। प्रदेश के सबसे बड़े एस एम एस अस्पताल में शनिवार 1 मई शाम 6 बजे 25 साल की एक महिला ने अपने भाई और आसपास लाचार खड़े लोगों की आंखों के सामने तड़पते हुए दम तोड़ दिया। वह हॉस्पिटल के गेट पर एक बैंच पर बैठे-बैठे हाथ जोड़कर कहती रही कि मेरा दम घुट रहा है, मैं मर जाऊंगी, मुझे बचा लो। लेकिन उसे भर्ती करने के लिए इमरजेंसी के गेट नहीं खुले और उसकी करीब 15 मिनट के भीतर मौत हो गई।

इस घटना को देख परेशान हुए लोगों में आक्रोश पैदा हो गया। इनमें कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर इसका लाइव वीडियो चला दिया। इस मामले में एस एम एस अस्पताल के अधीक्षक डॉ. राजेश शर्मा का कहना है कि इस घटना की सत्यता की जांच करवाएंगे। 25 वर्षीया मृतका टोंक जिले में निवाई कस्बे में गुंसी गांव की रहने वाली थी। शनिवार को अचानक महिला की तबीयत बिगड़ गई। उसे सांस लेने में काफी दिक्कत होने लगी। दम घुटने लगा। बहन की नाजुक हालत देखकर उसका भाई उसे निवाई और फिर टोंक लेकर पहुंचा। यहां उसे कोई मदद नहीं मिली।

इसके बाद एंबुलेंस से वह अपनी बहन को लेकर 90 किलोमीटर दूर जयपुर के लिए रवाना हुआ। भाई पूरे रास्ते में बहन को किसी तरह हौसला देता रहा। यहां जयपुर में मालवीय नगर, जगतपुरा, प्रताप नगर में एक ऑटोरिक्शा में बैठाकर पांच अस्पतालों के चक्कर लगाए। मृतका के भाई ने बहन को भर्ती करने की गुहार की, लेकिन कहीं बेड और ऑक्सीजन की कमी बता कर भर्ती नहीं किया गया ।

आखिरकार ऑटोरिक्शा चालक दोनों भाई बहन को लेकर एस एम एस अस्पताल पहुंचा। यहां भी इमरजेंसी गेट पर दरवाजा बंद मिला। यहां बार बार गुहार करने पर जवाब मिला कि सिर्फ रैफर मरीज से भर्ती किए जा रहे हैं। इस बीच बहन की सांसें उखड़ती रही। वह हॉस्पिटल के मुख्य गेट पर एक बैंच पर बैठ गई। वहां महिला हाथ जोड़कर आसपास मौजूद लोगों से गुहार करती रही कि मेरा दम घुट रहा है। मुझे बचा लो। मैं मर जाऊंगी। आखिरकार उसने बैंच पर दम तोड़ दिया और निढ़ाल होकर गिर पड़ी। भाई फूट फूट कर रोने लगा। इन हालातों को देखते हुए तो लगता है कि चिकित्सा सुविधाओं के नाम पर जो कुछ भी बताया जा रहा है वह सिर्फ जनता को गुमराह करने के लिए ही है। कहां है चिकित्सा सुविधाएं।

इस महिला का इलाज करना तो दूर किसी चिकित्सालय ने उसे प्रवेश तक नहीं दिया। यह माना जा सकता है कि प्राईवेट चिकित्सालय किसी ना किसी बात को लेकर मना भी कर सकते हैं। लेकिन इस कोरोना काल में सरकारी चिकित्सालयों द्वारा ऐसा करना किस संवेदनहीन मानवीय दृष्टिकोण को दर्शाता है। हमारा सारा सिस्टम साधनों की कमी को लेकर हाय तोबा मचाये हुए है। सरकारें सिस्टम को दुरूस्त करने के बजाय एक दूसरे की कमी निकालने में लगी है। चिकित्सालयों में संवेदना युक्त मावनीय चेहरा कहीं भी नजर नहीं आता। यदि ऐसा होता तो शायद उस बदनसीब भाई को अपनी बहन के इलाज के लिए कोटा निवाई से जयपुर नहीं आना पड़ता। सुविधा की चाह में यहां आकर भी उसे दुविधा ही मिली । यह सिस्टम की नेगेटेविटी है जो मरीज में बिमारी की पाॅजिटीविटी को हजार गुना बढा देता है। सिस्टम का चेहरा सकारात्मक ( पाॅजिटिव) हो तो मरीज और उसके परिजनों को बिना इलाज के ही गम्भीर हालातों से भी बाहर ला सकता है। चिकित्सकीय पाॅजिटिविटी ही बिमारी की नेगेटिविटी का आधार बनता है।

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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