सिद्धांत और मूल्यहीन सत्ता की राजनीति कब तक?

सिद्धांत और मूल्यहीन सत्ता की राजनीति कब तक?

laaliit garg
लेखक ललित गर्ग

लेख: भारतीय राजनीति में चुनाव का मौसम सबसे ज्यादा ठगाई, गुमराह एवं सपने दिखाने का मौसम होता है, भले ही उस समय असल में कोई भी मौसम क्यों न चल रहा हो। बिन मौसम राजनेता अपनी निष्ठा बदलने की वर्षा करते हैं तो राजनीतिक दल चुनावी वायदों के जरिये स्वर्ग को ही धरती पर उतार लाने के ओले बरसाते हैं। यह खेल हर चुनाव से पहले खेला जाता है, फिर भी मतदाता खुद को भरमाने से नहीं बचा पाते। हर बार ठगा जाता है। कहने को चुनाव लोकतंत्र का महाकुंभ होता है, लेकिन इसी महाकुंभ में सर्वाधिक लोकतंत्र के हनन की घटनाएं होती है, जो चिन्ता का कारण बननी चाहिए।

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चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश पुड्डुचेरी में वर्तमान चुनाव में आज जो राजनीतिक माहौल बन रहा है, जिस तरह रोज नए समीकरण बन या बिगड़ रहे हैं और जिस तरह सत्ता के खेल में आदर्शों पर आधारित सारे नियम ताक पर रखे जा रहे हैं, उसको देखते हुए किसी भी दल के किसी भी राजनेता की कथनी पर विश्वास करना मुश्किल हो गया है। वैसे अपने आप में यह बहुत अच्छी बात है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रहित की अपनी परिभाषाओं पर टिके रहने का साहस दिखाया है। इस साहस की प्रशंसा होनी चाहिए। पश्चिम बंगाल के चुनावी महासंग्राम में जो कुछ हो रहा है, जिस तरह सत्ता को केंद्र बनाकर समीकरण बनाए जा रहे हैं एवं येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतने के षडयंत्र रचे जा रहे हैं, उससे देश के समझदार तबके को चिंतित होना ही चाहिए। यह सही है कि मूल्य आधारित राजनीति की बात करना आज थोथा आदर्शवाद माना जाता है, लेकिन कहीं-न-कहीं तो हमें यह स्वीकारना ही होगा कि जिस तरह की अवसरवादी राजनीति हमारे लोकतंत्र पर हावी होती जा रही है, उससे देश के वास्तविक और व्यापक हितों पर विपरीत असर ही पड़ सकता है। पश्चिम बंगाल में हो रहे राजनीतिक तमाशे और राजनेताओं के बदलते चेहरे में हमें इस अवसर के बारे में भी जागरूक रहना होगा।

mamata banerjee

पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव इस बार जिस युद्धस्तर पर लड़ा जा रहा है

पश्चिम बंगाल के चुनाव ने जिस तरह के भयावह परिवेश को निर्मित किया है, उसमें आम मतदाता उलझन में है, एक बड़ा सवाल है कि न केवल मतदाता बल्कि राजनेता को भी अचानक ही किसी दल में घुटन क्यों महसूस होने लगी? या फलां दल अचानक ही क्यों भाने लगा?

आज जो शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल में जंगल राज का आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को नंदीग्राम में चुनौती दे रहे हैं, वह कल तक उन्हीं के विश्वासपात्र हुआ करते थे। पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव इस बार जिस युद्धस्तर पर लड़ा जा रहा है, उसमें युद्ध से ऐन पहले पाला बदलने वाले शुभेंदु पहले राजनेता नहीं हैं। ऐसे दलबदलु अवसरवादियों की फेहरिस्त बहुत लंबी बन सकती है, जो कल तक किसी और दल व नेता के प्रति निष्ठा की कसमें खाते थे, पर अब किसी दूसरे दल-नेता के विश्वासी बनने का दम भर रहे हैं। ऐसे में यह स्वाभाविक सवाल अनुत्तरित ही है कि जो उनके विश्वासी नहीं हुए, वे इनके विश्वासी कैसे होंगे? महाराष्ट्र में सुदृढ़ निष्ठाएं भी धराशायी होती हुई हमने देखी है। राजनीति के बड़े खिलाड़ी माने जाने वाले शरद पवार के अपने भतीजे अजित पवार ने रात के अंधेरे में भाजपा से सत्ता की सौदेबाजी कर राकांपा तोड़ने की साजिश रची थी।

यह अलग बात है कि उस सरकार की वैसी ही बेआबरू विदाई हुई, जैसी होनी चाहिए थी। आश्चर्यजनक यह भी रहा कि अजित पवार फिर अपनी निष्ठा बदल कर राकांपा में लौट आये और शिवसेना-कांग्रेस के साथ मिल कर बनी नयी सरकार में भी बिना शर्मिंदगी के उपमुख्यमंत्री बन गये। वैसे भारतीय राजनीति का अब शर्म से कोई रिश्ता रह नहीं गया है। कोई भी राजनीतिक दुर्भावना एवं विकृति शर्मसार क्यों नहीं करती?

लोकतंत्र की बुनियाद इसलिये भी खोखली होती जा रही है कि राजनीतिक दल अपनी कथनी-करनी का औचित्य साबित करने की चिंता ही नहीं करते। उन्हें इस बात की चिंता होती ही नहीं कि आज जो वे कह या कर रहे हैं, उसे यदि उनके बीते हुए कल की कथनी-करनी से तौला जाएगा तो उनकी क्या स्थिति होगी? वे यह भी नहीं सोचना चाहते कि आम लोग उनकी बात पर विश्वास क्यों करें? क्यों वे आम जनता को बेवकूफ समझते है? जनता के विश्वास से खेलना कब तक जारी रहेगी? लम्बे इंतजार करने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कमल थाम लिया, जिसकी परिणति मध्यप्रदेश में कांग्रेस सरकार के पतन और शिवराज सिंह चैहान के नेतृत्व में भाजपा सरकार के गठन के रूप में हुई। जमीनी एवं जीवनदानी भाजपा कार्यकर्ताओं की कीमत पर सिंधिया समर्थकों को शिवराज सरकार में हिस्सेदारी मिल चुकी है। खुद ज्योतिरादित्य कोे नरेंद्र मोदी सरकार में प्रवेश का इंतजार है। पिछले साल ही राजस्थान में भी मध्य प्रदेश प्रकरण की पुनरावृत्ति के आसार नजर आये थे, पर अंतिम क्षणों में कांग्रेस आलाकमान सचिन पायलट को मनाने में सफल हो गया और अशोक गहलोत सरकार बच गयी। अभी भी राजस्थान में सत्ता परिवर्तन का खेल कभी भी हो सकता है। ऐसी मिसालें कम नहीं हैं, जब हमारे राजनेताओं के रातोंरात हुए हृदय परिवर्तन ने सरकार गिरायी और बनायी हैं। विडम्बना तो यह है कि हृदय परिवर्तन अक्सर सत्ता परिवर्तन के लिए ही होता है, लोकतंत्र के लिये कोई आदर्श उदाहरण बनने के लिये नहीं।

राजनीति असंभव साधने की कला है

इन त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण राजनीतिक स्थितियों को लेकर ढेरों मुहावरे एवं कहावतें बन चुकी हैं- राजनीति बदमाशों की अंतिम शरणस्थली है, प्यार, युद्ध और राजनीति में सब कुछ जायज है, राजनीति में कोई स्थायी मित्र या कोई स्थायी शत्रु नहीं होता, राजनीति अवसर भुनाने की कला है, राजनीति असंभव साधने की कला है आदि-आदि। और यह एक रोचक स्थिति है कि पिछले कुछ ही दिनों में देश ने इन और ऐसे सारे मुहावरों की हकीकत की बानगी किसी न किसी रूप में देख ली है। पश्चिम बंगाल चुनावों में जिस तरह के राजनीतिक समीकरण बन-बिगड़ रहे हैं, जिस तरह की बयानबाजी हो रही है, उस सबसे हमारी राजनीति का अवसरवादी एवं विद्रूप चेहरा जरूर अलग-अलग रूपों में सामने आ रहा है। ऐसा नहीं कि पहले हमारी राजनीति के विरोधाभासी समीकरण कभी सामने नहीं आए, लेकिन जिस रूप में अब सामने आ रहे हैं, वह अपने आप में हमारी राजनीति को परिभाषित कर रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस के तेवर पर देश में काफी चर्चा हो चुकी है, हो रही है, लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जिस तरह समीकरण बनाए-बिगाड़े जा रहे हैं, उसे देखकर यह चिंता उभरनी ही चाहिए कि सिद्धांत और मूल्यहीन सत्ता की राजनीति हमें कहां पहुंचाएगी।

राजनीति और चुनाव सुधारों के लिए काम करने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2016 से 2020 के बीच हुए चुनावों में लड़ने वाले 405 में से 182 विधायक दल बदल कर भाजपा में शामिल हुए जबकि 38 विधायक कांग्रेस में और 25 विधायक टीआरएस में शामिल हुए। जिन नेताओं और दलों की निष्ठा और वफादारी का यह आलम है, उनके चुनावी वायदों के वफा होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? राजनीति की दूषित हवाओं ने लोकतंत्र की चेतना को प्रदूषित कर दिया है। जबकि लोकतंत्र की बुनियाद है राजनीति, जिसकी जनता की आंखों में पारदर्शिता होनी चाहिए। मगर आज राजनीति ने इतने मुखौटे पहन लिये हैं, छलनाओं के मकड़ जाल बुन लिये हैं कि उसका सही चेहरा एवं चरित्र पहचानना आम मतदाता के लिये बहुत कठिन हो गया है। कैसे राजनीति के प्रति मन श्रद्धा से झुके? क्योंकि वहां किसी मौलिक मुद्दे पर स्थिरता नहीं और जहां स्थिरता नहीं वहां विश्वास और आस्था कैसे संभव होगी?

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