खाली दिमाग में ही सद् विचार प्रवेश करते है

खाली दिमाग में ही सद् विचार प्रवेश करते है

Ramswaroop Rawatsare
रामस्वरूप रावतसरे
लेखक

क सन्यासी का अपने साधना स्थल पर मन नहीं लगा, तो वे बाहर घूमने निकल पड़े। उनके मन में तरह तरह के विचार आ रहे थे। वे मन – दिमाग को अपने इष्ट देव की साधना में लगाते पर, अन्दर दूसरे विचारों – भावों के जमावड़े के कारण सफल नहीं हो पा रहे थे। इस परेशनी का उन्हें कोई समाधान भी नहीं सूझ रहा था। अनमने मन से घूमते-फिरते एक दुकान पर आये, दुकान मे अनेक छोटे-बड़े डिब्बे थे। सन्यासी के मन में जिज्ञासा उत्पन्न हुई! एक डिब्बे की ओर इशारा करते हुए सन्यासी ने दुकानदार से पूछा, इसमे क्या है ? दुकानदार ने कहा – इसमे नमक है ! सन्यासी ने फिर पूछा, इसके पास वाले में क्या है ? दुकानदार ने कहा, इसमे हल्दी है ! इसी प्रकार सन्यासी पूछ्ते गए और दुकानदार बतलाता रहा, अंत मे डिब्बों के पीछे रखे डिब्बे का नंबर आया, सन्यासी ने पूछा उस अंतिम डिब्बे मे क्या है?

दुकानदार बोला, उसमें राम-राम है ! सन्यासी ने हैरान होते हुये पूछा राम राम?? भला यह राम-राम किस वस्तु का नाम है भाई? मैंने तो इस नाम के किसी समान के बारे में कभी नहीं सुना।

दुकानदार सन्यासी के भोलेपन पर हंस कर बोला – महात्मन ! और डिब्बों मे तो भिन्न-भिन्न वस्तुएं हैं, पर यह डिब्बा खाली है। हम खाली को खाली नहीं कहकर राम-राम कहते हैं। संन्यासी की आंखें खुली की खुली रह गई। जिस बात के लिये मैं दर-दर भटक रहा था। वो बात मुझे आज एक व्यापारी से समझ में आ रही है। वो सन्यासी उस छोटे से किराने के दुकानदार के चरणों में गिर पड़े और विशमय से बोले ओह, तो खाली मे राम रहते है। सन्यासी पर दुकानदार की बात का इतना असर हुआ कि उन्होंने अपने मन दिमाग से सांसारिक भावों, विचारों को झटका देते ही उनके शरीर की रोमांवली खड़ी हो गई । मन प्रभु के प्रकाश की ओर बढ चला।

सत्य भी है, भरे हुए में राम को स्थान कहाँ ? काम, क्रोध, लोभ, मोह, लालच, अभिमान, ईष्र्या, द्वेश और भली-बुरी, सुख दुख, साधन सुविधा की बातों से जब दिल-दिमाग भरा रहेगा तो उसमें ईश्वर का वास कैसे होगा ? राम यानी ईश्वर तो खाली याने साफ-सुथरे मन मे ही निवास करते है। एक छोटी सी दुकान वाले ने सन्यासी को बहुत बड़ी बात समझा दी थी। आज सन्यासी अपने आनंद में था।

हम अपनी जिज्ञासा की शान्ति के लिये अपने गुरू के पास मन्दिरों में जाते है। लेकिन इस बात पर कभी भी ध्यान नहीं देते, कि जिस जिज्ञासा को लेकर जा रहे हैं। उसके समाधान को लेकर हमारे दिल दिमाग में कुछ स्थान खाली भी है या नहीं । गुरू जो कुछ बतायेगें उसे रखने के लिये कुछ मन दिमाग का स्थान खाली भी होना चाहिये ,पर होता नहीं है। उसमें पहले से ही इतना कुछ भरा होता है कि हम जिस बात के लिये भटक रहे है और जो हमारे लिये बहुत ही जरूरी है। उसके लिये स्थान ही नहीं होता है। दिलों दिमाग खाली नहीं होने की वजह से बहुत सा किमती परामर्श अन्दर आने से रह जाता है और हम उस कचरे को जिससे हमें कोई लाभ भी नहीं मिलता औा ना ही कभी मिलने वाला है, उसे जिन्दगी भर ढोते रहते है। इस पर हमें गहनता से विचार करना चाहिये कि जो बातें या विचार हमारे किसी काम के नहीं है, वे हमारे दिलों दिमाग में नहीं रहे। साथ ही हमें इस बात का भी स्मरण रखना चाहिये कि जो बात हमारे वष में नहीं है। उसको कल्पना के आधार पर हम क्यों ढो रहे है।’’होई वही जो राम रची राखा ’’तो फिर क्यों दिलों दिमाग को अनावश्यक विचारों से भरा हुआ रखें । इन्हें खाली रखें जिससे सद्विचारों का प्रवेष आसानी से होता रहे।

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