भगवान ने कहा ’’तुम्हारे 98 रूपये मिल गये है’’

भगवान ने कहा ’’तुम्हारे 98 रूपये मिल गये है’’

  • लेखक रामस्वरूप रावतसरे

सेठ धनसुख के पास नोकर के रूप में रामरख काम करता था। सेठ रामरख पर बहुत विश्वास करता था। जो भी जरुरी काम हो सेठ हमेशा उसी से कहता था। रामरख भगवान का भक्त था, वह सदा भगवान के चिंतन, भजन, कीर्तन, स्मरण, सत्संग आदि का लाभ लेता रहता था।

 एक दिन रामरख ने सेठ से श्री जगन्नाथ धाम यात्रा करने के लिए कुछ दिन की छुट्टी मांगी । सेठ ने उसे छुट्टी देते हुए कहा- भाई ! ’’मैं तो हूं संसारी आदमी हमेशा व्यापार के काम में व्यस्त रहता हूं जिसके कारण कभी तीर्थ यात्रा का लाभ नहीं ले पाता। तुम जा ही रहे हो तो यह लो 100 रुपए , मेरी ओर से श्री जगन्नाथ प्रभु के चरणों में समर्पित कर देना।

रामरख सेठ से सौ रुपए लेकर श्री जगन्नाथ धाम यात्रा पर निकल गया।
कई दिन की पैदल यात्रा करने के बाद वह श्री जगन्नाथ पुरी पहुंचा। मंदिर की ओर प्रस्थान करते समय उसने रास्ते में देखा कि बहुत सारे संत, भक्त जन, वैष्णव जन, हरि नाम संकीर्तन बड़ी मस्ती में कर रहे हैं। सभी की आंखों से अश्रु धारा बह रही है। जोर-जोर से हरि बोल, हरि बोल गूंज रहा है। रामरख को संकीर्तन में बहुत आनंद आ रहा था। वह भी वहीं रुक कर हरिनाम संकीर्तन का आनंद लेने लगा। फिर उसने देखा कि संकीर्तन करने वाले भक्तजन इतनी देर से संकीर्तन करने के कारण उनके होंठ सूखे हुए हैं। वह दिखने में कुछ भूखे भी प्रतीत हो रहे हैं। उसने सोचा क्यों ना सेठ के सौ रुपए से इन भक्तों को भोजन करा दूँ। उसने उन सभी के लिये भोजन की व्यवस्था कर दी। सबको भोजन कराने में उसे कुल 98 रुपए खर्च करने पड़े। उसके पास दो रुपए बच गए। उसने सोचा चलो अच्छा हुआ दो रुपए जगन्नाथ जी के चरणों में सेठ के नाम से चढ़ा दूंगा।

     रामरख ने अपने आप से कहा कि सेठ यह तो पूछेगा नहीं कि पैसे खर्च किये या भगवान को चढाये। वह यही पूछेगें कि पैसे चढ़ा दिए तो कह दूंगा कि पैसे भगवान जगन्नाथ के श्री चरणों में चढा दिये। झूठ भी नहीं होगा और काम भी हो जाएगा।

रामरख ने श्री जगन्नाथ जी के दर्शनों के लिए मंदिर में प्रवेश किया श्री जगन्नाथ जी की छवि को निहारते हुए अपने हृदय में उनको विराजमान कराया। अंत में उसने सेठ के दो रुपए श्री जगन्नाथ जी के चरणो में चढ़ा दिए। और बोला ’’यह दो रुपए सेठ धनसुख ने भेजे हैं’’।

  उसी रात सेठ को स्वप्न में श्री जगन्नाथ जी के दर्षन हुए, उन्होंने आशीर्वाद दिया और बोले ’’सेठ तुम्हारे 98 रुपए मुझे मिल गए हैं’’ यह कहकर श्री जगन्नाथ जी अंतध्र्यान हो गए। सेठ हड़बड़ा कर उठा, सोचने लगा ’’भगवान कह रहे है कि उसके 98 रूपये मिल गये है। पर मैंने तो रामरख के हाथ 100 रूपये भिजवाये थे। भगवान को 98 ही कैसे मिले। मेरा नौकर तो बड़ा ईमानदार है। पर अचानक उसे क्या जरुरत पड़ गई थी कि उसने भगवान को दो रुपए कम चढ़ाए , उसने दो रुपए का क्या किया? जब मैंने उसे जाते समय पैसों के बारे में पूछा था तो उसने कहा था कि उसके पास पैसों की पर्याप्त व्यवस्था है। उसे ऐसी क्या जरूरत पड़ी कि दो रूपये अपने किसी काम में खर्च कर लिये। ऐसा विचार सेठ करता रहा। काफी दिन बीतने के बाद रामरख वापस आया और सेठ के पास पहुंचा। 
  • सेठ ने कहा कि ’’मेरे पैसे जगन्नाथ जी को चढ़ा दिए थे’’ ?
  • रामरख बोला ’’हां मैंने आपके दिये पैसे जगन्नाथ जी को चढ़ा दिए।
  • सेठ ने कहा ’’पर तुमने 98 रुपए क्यों चढ़ाए दो रुपए किस काम में ले लिए।

सेठ के मुख से 98 रूपये की बात सुन कर, रामसुख ने सारी बात बताई कि उसने 98 रुपए का संतो को भोजन करा दिया था और षेष दो रुपए ठाकुरजी को चढ़ाये थे। सेठ सारी बात समझ गया। बड़ा खुश हुआ उसकी आंखों से अश्रुधारा बहने लगी, वह भगत रामरख के चरणों में गिर पड़ा। बोला- ’’आप धन्य हो आपकी वजह से मुझे श्री जगन्नाथ जी के दर्शन यहीं बैठे-बैठे हो गए’’

भगवान को हमारे किसी धन धान्य की कोई आवश्यकता नहीं है। भगवान को वह 98 रुपए स्वीकार है जो जीव मात्र की सेवा में खर्च किए गए और उस दो रुपए का कोई महत्व नहीं जो उनके चरणों में नगद चढ़ाए गए। भगवान को चढ़ावे की जरूरत नही होती। सच्चे मन से किसी जरूरतमंद की जरूरत को पूरा कर देना भी भगवान को भेंट चढ़ाने से भी कहीं ज्यादा अच्छा होता है। हम उस परमात्मा को क्या दे सकते है, जिसके दर पर हम ही भिखारी हैं। प्राणी मात्र के प्रति सेवा भाव ही भगवान के श्री चरणों में सबसे बड़ा चढावा है ,समर्पण है ।

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