क्या हमारे बच्चे कर्मयोगी की बजाय सुविधा भोगी बन रहे है?

क्या हमारे बच्चे कर्मयोगी की बजाय सुविधा भोगी बन रहे है?

Ramswaroop Rawatsare
रामस्वरूप रावतसरे
लेखक

क साधन सम्पन्न व्यक्ति अपने बच्चे को लेकर महाविधालय के निदेशक के पास गया। उसने कहा कि हमारा बच्चा इस बात के लिये जिद कर रहा है कि यहां (भारत) में पढाई अच्छी नहीं होती इसलिये उसे विदेश में पढने जाना है। आप इसे समझाइये, कि यह विदेश में जाने की जिद छोड दे और यहीं पढे। विधालय के निदेशक ने माता पिता की बात सुन कर। उनके बच्चे को बुलाया। देखा उसकी उम्र लगभग 15 वर्ष की रही होगी। उन्होने उसे अपने पास बैठाया। पूछा वह यहां क्यों नहीं पढना चाहता। लडके ने तपाक से उत्तर दिया कि यहां पढाई अच्छी नहीं होती। यहां के विधालयों में किसी प्रकार की सुविधा ही नहीं है। इस कारण से वह विदेश में जाकर पढना चाहता है। उसकी यह बात सुन कर महाविधालय के निदेशक को भी आश्चर्य हुआ। इस बालक को इस उम्र में ही इतना ज्ञान कैसे हो गया कि यहां हमारे देश में पढाई अच्छी नहीं होती। जबकि उनके अनुसार हमारे यहां जो शिक्षा का स्तर है वह काफी हद तक अच्छा है। हां, यह माना जा सकता है कि यदि उच्च शिक्षा प्राप्त करनी हो तो विदेश में जाया जाय। उन्होंने उस बालक के ज्ञान को टटोला। उसे शिक्षा या शिक्षा के स्तर का कोई ज्ञान नही था। ज्ञान था तो इस बात का कि यहां के विधालयों में सुविधायें नहीं है। खुला पन नहीं है। जबकि विदेशों में सब कुछ है। जब उसे यह पुछा गया कि उसे कैसे मालूम कि जहां सुविधायें होती है वहां का शिक्षा का स्तर भी अच्छा होता है। फिर विधार्थी के लिये जो सुविधाए विधालयों में होनी चाहिये वे सब यहां है। उसने कोई जबाब नही दिया ।

निदेशक ने उससे ओर भी कई प्रकार की जानकारी ली और वे इस नतीजे पर पहुचे कि यह बालक इतनी सी उम्र में सभी प्रकार के साधानों को देख चुका है। भारत में उपलब्ध सुविधाओं के साधन फीके लगने लगे है। क्योंकि पिता के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी माता पिता ने भी बच्चे को अपनी धन सम्पति के बल पर ही खुश रखा, क्योंकि वह इकलोता ही था।

जो दुलार या ममत्व का स्पर्श उसे माता पिता से मिलना चाहिये था। वहां नोकरानी या नौकारों से मिला। उन्हें मालिक मालकिन से जिस प्रकार की पगार तथा सम्मान मिलता था उसी के अनुरूप वे दुलार का स्पर्श उस बच्चे तक पहुचाते थे। उनका बच्चे से भावात्मक लगाव नहीं था। बस स्वार्थवस वे मजबूरी में उससे स्नेह तथा दुलार रखते थे। इसमें सबसे ज्यादा रोल होता है बच्चे को खुश रखना अब वह खिला कर या खेलने के साधन देकर किया जा सकता है। जिसे नौकर करते थे।

जब बच्चे के दिमाग पर साधनों का असर हो तो वहां संवेदनाएं कुछ भी काम नहीं करती। जिस समय माता पिता को बच्चे को सम्भालना चाहिये था उस समय उनके पास समय नहीं था। अब चुकि बच्चा साधनों और सुविधाओं के आधार पर आगे बढा, तो वहां माता पिता का क्या। वे हो ना हो, उनका प्यार, उनकी संवेदनाए किस प्रकार की होती है उनका असर कितना होता है। बच्चे को इससे क्या मतलब। बच्चे को इस बात का इल्म है कि उसके माता पिता के पास पैसा है और वे उसकी हर बात को पूरा कर सकते है।

हम अपने बच्चों को साधनों के आधार पर आगे बढाना चाहते है। संस्कारों के आधार पर नहीं। बच्चे को जिन साधनों का ज्ञान 15 से 20 वर्ष की उम्र में होना चाहिये। वह ज्ञान हम उसे 5 वर्ष की उम्र में ही दे देते है। जबकि इस उम्र में बच्चे को माता पिता का प्यार तथा संस्कारों का आधार मिलना चाहिये। बच्चे को जितना जमीन से जोड कर रखेगे, बच्चा उतना ही आपकी कद्र करेगा। बच्चे को साधनों से नहीं श्रेष्ठता से आगे बढने का सलिका दें।

तभी हम इस बात को कह सकते है कि –
पूत कपूत तो क्यों धन संचय,
पूत सपूत तो क्यों धन संचय।

हमारी औलाद यदि निकम्मी है तो कितना भी धन इक्कठा कर लों वह उसे बढायेगा नही, बरबाद करके ही रहेगा और यदि औलाद संस्कारवान, श्रेष्ठ है तो वही सबसे बडा धन है। वह उन बातों को पूरा करेगा जो कि उसका अपने माता पिता तथा परिवार के प्रति फर्ज बनता है। वह समाज को देगा, समाज से लेगा नहीं । इस बात को हमें समझना चाहिये कि हम अपने बच्चों को साधनों के मोह से दूर ही रखे। उन्हें वास्तविकता में सांस लेने दें। कल्पना की उडान हो लेकिन बच्चे की क्षमता के अनुसार। अधिक सुख सुविधा भी परेशानी ही पैदा करती है। बच्चे की उन्नति का आधार उसकी कर्मठता, उसकी श्रेष्ठता होनी चाहिए।

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